
प्रातःस्मरणीय
पूज्यपाद संत
श्री
आसारामजी
बापू के
सत्संग-प्रवचन
सच्चा
सुख
हम धनवान होगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परंतु भैया ! हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका है? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परंतु इस जीवन की गाड़ी छूटने का कोई निश्चित समय है?
आज तक आपने जगत में जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है.... आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया ! वह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जायेगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।
अतः सावधान हो जाओ। अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शांति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो।
जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।
सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है। अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं। तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।
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पूज्यश्री के सरस सुबोध एवं श्रुति-मधुर वचनामृतों के इस अनुपम संकलन को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अपार प्रसन्नता हो रही है।
यह आत्मज्ञान की उच्च साधना विहंगमार्ग कहलाती है। आत्मज्ञान के प्यासे, विवेक-वैराग्यवान साधकों के लिए यह पुस्तक वायुयान का काम करेगी। पूज्यश्री की आत्मानुभूति से छलकते ये वचन देह की आसक्ति और मानसिक दुर्बलताएँ छुड़ाकर आत्म-सिंहासन पर बिठा देते हैं।
अतः इस पावन पुस्तक को अपने साथ रखें, बार-बार पढ़ें और धन्य-धन्य हो जाएँ.....।
विनीत
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति
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चैतन्यस्वरूप परमात्मा की सत्ता से हमारी चित्तकला स्फुरित होती है। वह चित्तकला या संवित्, वृत्ति, स्फुरणा या धारा हिता नाम की नाड़ी में जाकर स्वप्न का संसार बना लेती है। वह संवित् सुन्नता की अवस्था में गहरी नींद में बदल जाती है। उस संवित् के उदगम स्थान अन्तर्यामी आत्मा-परमात्मा की प्राप्ति, उसका बोध या ज्ञान अगर किसी को तीन मिनट के लिए भी प्राप्त हो जाय तो उसे दुबारा गर्भवास का दुःख नहीं भोगना पड़ेगा, माता के गर्भ में नहीं जाना पड़ेगा।, वह मुक्तात्मा हो जायगा।
चैतन्य सत्ता से स्फुरित संवित् जगत की आसक्ति करती है और राग सहित हो जाती है। नश्वर पदार्थों का राग, नश्वर देह की आस्था अगर शाश्वत के संगीत को सुनकर, शाश्वत के ध्यान को पाकर, शाश्वत की मधुरता का एहसास कर ले, साधक रागरहित हो जाय तो भोग योग में बदल जाएगा, स्वार्थ सेवा में बदल जाएगा, चिन्ता निश्चिन्तता में बदल जायगी, मृत्यु अमरता बदल जाएगी, जीव ब्रह्म हो जायेगा। केवल रागरहित होने से यह लाभ हो जाएगा।
राग के कारण जीव जन्म मरण के चक्कर में पड़ता है, राग के कारण जीव पापाचर करता है, राग के कारण जीव नाना प्रकार की योनियों में भटकता है।
रागरहित हुए बिना भोग योग में नहीं बदलता, स्वार्थ सेवा में नहीं बदलता।
राग मिटाने के लिए जगत की नश्वरता का विचार करके, शरीर की क्षणभंगुरता का विचार करके चित्त में वैराग्य को उपजाना चाहिए।
दूसरा उपाय हैः भगवान में इतना राग करो, उस शाश्वत चैतन्य में इतना राग करो कि नश्वर का राग स्मरण में भी न आये। शाश्वत के रस में इतना सराबोर हो जाओ, राम के रस में इतना तन्मय हो जाओ कि कामनाओं का दहकता हुआ, चिंगारियाँ फेंकता हुआ काम का दुःखद बड़वानल हमारे चित्त को न तपा सके, न सता सके।
चित्त में चैतन्यस्वरूप परमात्मा हर समय हमेशा स्थित है लेकिन नश्वर राग के कारण उसी चैतन्यस्वरूप परमात्मा की सत्ता लेकर संवित् बहिर्मुख होती है और जाग्रत जगत की इच्छाओं में भटकती है। जब वह संवित् हिता नाम की नाड़ी में आती तब स्वप्न का जगत दिखाती है। वही संवित् जब कुण्ठित हो जाती है तब सुषुप्ति आती है।
अगर वह संवित् परम तत्त्व का चिन्तन करे, ध्यान करे, परम तत्त्व के जानकार सत्पुरूषों का सान्निध्य-सेवन करे तो वह संवित् क्रमशः अपने उदगम स्थान चैतन्यस्वरूप आत्मा-परमात्मा में अवस्थित हो जाए। इस प्रकार अपने मैं पने के उदगम स्थान में संवित् अगर तीन मिनट के लिए भी स्थित हो जाए तो फिर उसे जीव होकर जन्म लेना नहीं पड़ता, माता के गर्भ में आना नहीं पड़ता।
चन्द्रमा में अमृत बरसाने की सत्ता जहाँ से आती है वही चैतन्य तुम्हारे दिल को और तुम्हारी नस-नाड़ियों को, तुम्हारी आँखों को और मन-बुद्धि को स्फुरणा और शक्ति देता है। जो चैतन्य सत्ता सूर्य में प्रकाश और प्रभाव भरती है, चन्द्रमा में चाँदनी भरती है वही चैतन्य सत्ता तुम्हारे हाड़-मांस के शरीर में भी चेतना, प्रेम और आनन्द की धारा बहाती है।
जैसे पृथ्वी में रस है। उसमें जिस प्रकार के बीज बो दो उसी प्रकार के अंकुर, फल-फूल निकल आते हैं। उसी प्रकार वह चैतन्य राम रोम-रोम में बस रहा है। उसके प्रति जैसा भाव करके चिन्तन, स्मरण होता है वैसा प्रतिभाव अपने आप मिलता है। वह रोम-रोम में बसा है इसलिए उसका नाम राम है। उसका चिन्तन करने से वह ताप, पाप, संताप और थकान को हर लेता है इसलिए उसका नाम हरि है। सर्वत्र वह खुद ही खुद है इसलिए उनका नाम खुदा है। वह कल्याणस्वरूप है इसलिए उसका नाम शिव है।
हम उसी परम शिव का ध्यान करेंगे जो अर्धकलाधारी चन्द्रशेखर होकर चमकते हैं। हम उसी नारायण का चिन्तन करेंगे जो भगवान पुण्डरीकाक्ष वैकुण्ठाधिपति होकर वैकुण्ठ को प्रकाशमान करते हैं। हम उसी अन्तर्यामी प्रभु का स्मरण करेंगे जो चन्द्रमा के द्वारा तमाम औषधि-वनस्पतियों में अपनी करूणा-कृपा बरसाकर मानव जाति को निरोगता का वरदान देते हैं। उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा की, उस मधुर संवित् की उपासना करते-करते उसे प्यार करेंगे।
जो तुम्हारे दिल को चेतना देकर धड़कन दिलाता है, तुम्हारी आँखों को निहारने की शक्ति देता है, तुम्हारे कानों को सुनने की सत्ता देता है, तुम्हारी नासिका को सूँघने की सत्ता देता है और मन को संकल्प-विकल्प करने की स्फुरणा देता है उसे भरपूर स्नेह करो। तुम्हारी 'मैं....मैं...' जहाँ से स्फुरित होकर आ रही है उस उदगम स्थान को नहीं भी जानते हो फिर भी उसे धन्यवाद देते हुए स्नेह करो। ऐसा करने से तुम्हारी संवित् वहीं पहुँचेगी जहाँ योगियों की संवित् पहुँचती है, जहाँ भक्तों की भाव संवित विश्रान्ति पाती है, तपस्वियों का तप जहाँ फलता है, ध्यानियों का ध्यान जहाँ से सिद्ध होता है और कर्मयोगियों को कर्म करने की सत्ता जहाँ से मिलती है।
'योगवाशिष्ठ' एक ऐसा अदभुत ग्रन्थ है जिसको बार-बार विचारने से आदमी को यहीं मुक्ति का अनुभव हो जाता है। उसमें वक्ता भगवान वशिष्ठजी हैं और श्रोता भगवान रामचन्द्रजी हैं।
वशिष्ठजी महाराज हिमालय में अपनी संवित् को अन्तर्मुख किये हुए थे और भगवान चन्द्रशेखर माता पार्वती के साथ आकाश मार्ग से आये और वशिष्ठजी से मिले।
धन में, वैभव में और बाह्य वस्तुओं में एक आदमी दूसरे आदमी की पूरी बराबरी नहीं कर सकता। जो रूप, लावण्य, पुत्र, परिवार, पत्नी आदि एक व्यक्ति को है वैसे का वैसा, उतना ही दूसरे को नहीं मिल सकता। लेकिन परमात्मा जो वशिष्ठजी को मिले है, जो कबीर को मिले हैं, जो रामकृष्ण को मिले हैं, जो धन्ना जाट को मिले हैं, जो राजा जनक को मिले हैं वे ही परमात्मा सब व्यक्ति को मिल सकते हैं। शर्त यह है कि परमात्मा को पाने की इच्छा तीव्र होनी चाहिए।
परमात्म-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं। राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है। राग ही क्रोध को जन्म देता है। इच्छित वस्तु पाने में किसी ने विघ्न डाला और वह अपने से छोटा है तो उस पर क्रोध आयगा, वह अपनी बराबरी का है तो उससे द्वेष होगा और अपने से वह बड़ा है तो उससे भय होगा। राग से ही क्रोध, द्वेष और भय पैदा होते हैं। राग से ही मोह पैदा होता है और राग से ही काम पैदा होता है।
रागरहित हुए बिना कोई व्यक्ति परम पद को नहीं प्राप्त कर सकता। राग रहित होना है तो क्या करना चाहिए ?
नश्वर वस्तुओं का राग मिटाने के लिए शाश्वत में राग बढ़ा दो। शाश्वत में राग बढ़ाने से रागरहित अवस्था आ जाएगी। बिना रागरहित हुए भोगी योगी नहीं हो सकता, स्वार्थ सेवा में नहीं बदलता, भक्त भगवान को नहीं मिल पाता। रागरहित होने से भोगी योगी बन जाता है, स्वार्थी सात्त्विक सेवक बन जाता है और भक्त भगवान से मिल जाता है, जीव ब्रह्म से मिल जाता है।
केवल राग के कारण ही जीव की दुर्दशा है। जीव रागरहित हो गया तो वह योगी हो गया, वह भक्त हो गया, वह ज्ञानी हो गया, वह मुक्त हो गया।
राग की वस्तु मिलने से राग मिटता नहीं, राग गहरा होता है। राग मिटाया जाता है अन्तर्मुखता से। आपकी संवित् कहो, धारा कहो, स्फुरणा कहो, वृत्ति कहो, संकल्प कहो जो कुछ कहो, वह स्फुरणा जहाँ से उठती है उस चैतन्य-सागर में पुनः पहुँच जाय तो राग मिट जाय।
चैतन्य से जब स्फुरणा उठती है और इन्द्रियों के द्वारा बहिर्मुख होती है तब जाग्रत अवस्था आती है। वह स्फुरणा हिता नाम की नाड़ी में घूमती है तब स्वप्न की दुनिया दिखाती है। वही स्फुरणा जब कुण्ठित हो जाती है तब सुषुप्ति अवस्था आती है। वही स्फुरणा जब अपने उदगम स्थान चैतन्य में लीन होती है उस अवस्था को तुर्यावस्था कहते हैं। तुर्यावस्था साक्षात्कार की अवस्था है, ईश्वर-प्राप्ति की अवस्था है, मुक्ति की अवस्था है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ये संसार हैं और बदलने वाली अवस्थाएँ हैं, दुःखद अवस्थाएँ हैं। यहाँ का दुःख तो दुःख है लेकिन हम लोग जिसे सुख मानते हैं वह भी दुःख से भरा है। यहाँ का शत्रु तो शत्रु है ही लेकिन जिसे हम मित्र समझते हैं वह भी कभी न कभी शत्रुता से भरा हुआ दिखेगा। जितना मित्र में राग अधिक होगा उतना वह मित्र कभी न कभी जरूर ठोकर मारेगा। जितना धन में राग अधिक होगा उतना वह धनवान धन के कारण अधिक दुःखी रहेगा। जितना राग परिवार में अधिक होगा, परिवार के कारण ही वह अधिक दुःखी रहेगा। जितना राग देह में होगा उतना देह के कारण चिन्तित रहेगा।
राग जहाँ भी आपने लगाया वहाँ दुःख दिये बिना नहीं छोड़ेगा। भगवान में राग लगायें तो ?
देखना यह है भगवान में राग हम कैसे लगाते हैं। उपाय ठीक होना चाहिए। आदमी पैर के बल से ठीक चल सकता है, हाथों के बल से चलेगा तो गरदन में चोट लगेगी।
हम लोगों ने भगवान की जो कल्पना कर रखी है उस भगवान में यदि राग लगायें तो हो सकता है हमारा राग मनमाना राग हो। हम यदि किसी रूप में, किसी अवस्था में, किसी चित्र में राग करें तो सतत चित्र के आगे नहीं बैठ सकते, सतत उस अवस्था में नहीं रह सकते। इसलिए वह रागरहित अवस्था में नहीं ले जा सकेगा। जो लोग सतत भगवान के मंदिर में बैठते हैं, जैसे नौकरी करने पुजारी बैठता है उनका भी राग नहीं मिटता क्योंकि सचमुच में ईश्वर में उनका राग हुआ नहीं। हाँ, रामकृष्ण परमहंस ऐसे पुजारी थे जिनको ईश्वर में सचमुच राग था, अतः संसार में राग उनका मिट गया और वे ज्ञानी हो गये, मुक्त हो गये।
ईश्वर में राग होने का मतलब है कि किसी भी वस्तु या परिस्थिति में हमारा राग न टिके। वस्तु और परिस्थिति में राग टिका नहीं कि दुर्घटना घटी नहीं।
जब-जब भय आता है, दुःख आता है, चिन्ता आती है, कुछ भी कष्ट आता है, आपत्ति आती है तो समझना चाहिए कि हमारे राग को भय हुआ है, हमारे राग को चिन्ता हुई है, हमारे राग को क्रोध हुआ है, हमारे राग को द्वेष हुआ है, हमारे राग के कारण अशान्ति हुई है यह बात समझकर यदि आप उस राग से सम्बन्ध विच्छेद करें तो उसी समय आप राग रहित परमात्मा में पहुँच जाएँगे। लेकिन आदत पुरानी है। जीव कहेगा कि इतना तो चाहिए ही, इसके बिना काम कैसे चलेगा ? तब सावधान रहना चाहिए कि राग पुरानी आदत है उसे सुधारना है। तुम रागरहित हो जाओगे तो जो होना चाहिए वह तुम्हारी हाजरी मात्र से होकर रहेगा। जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होगा, रुक जायगा। तुम रागरहित होते ही समर्थ हो जाओगे। समर्थ के लिए फिर क्या असम्भव है ? सूर्य के उदय होने से ही फूल खिलने लगते है और बच्चे भी करवट लेने लगते हैं। हवाएँ विशेष आह्लादिनी बनने लगती है। प्रभात होते ही सचराचर में एक चेतना व्याप्त हो जाती है।
सूर्य के होने से जो होना चाहिए वह अपने आप होने लगता है, सूर्य को कुछ करना नहीं पड़ता। न्यायाधीश न्यायालय में अपनी कुर्सी पर आ जाय तो बाकी का काम अपने आप होने लगता है। अगर न्यायाधीश अपनी कुर्सी छोड़कर स्वयं झाड़ू लगाने लग जाय, पानी का मटका भरने लग जाय, वकील और मुवक्किल को पुकारने लग जाय तो अव्यवस्था हो जाएगी।
ऐसे ही तुम्हारे मन-इन्द्रियाँ आदि हैं। वे सब तुम्हारे नौकर-चाकर हैं। तुम अपने आप 'स्व' की गद्दी पर आ जाओ तो फिर जो होना चाहिए वह स्वाभाविक होने लगेगा। जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होगा। अभी क्या होता है ? जो होना चाहिए वह हो नहीं रहा, जो हो रहा है वह भी नहीं रहा, जो भा रहा है वह टिक नहीं रहा.... हम मुसीबत में चले जा रहे हैं।
रागरहित हुए बिना भोगी योगी नहीं हो सकता, भक्त भगवान को नहीं पा सकता, स्वार्थ सेवा में नहीं बदल सकता, जीव ब्रह्म में नहीं मिल सकता। इसलिए रागरहित होना यह जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।
रागरहित होने के लिए क्या करना चाहिए ?
राग सुख में ही तो होता है। अतः सुख लेने की अपेक्षा सुख देने के भाव से कार्य करो, भोग भोगनेकी अपेक्षा भोग का सदुपयोग करो। इससे राग क्षीण होता जाएगा। जितने अंश में राग क्षीण होता जाएगा उतने अंश में सामर्थ्य आता जाएगा। फिर चाहे मीरा कीर्तन करते-करते राग भूली और जहर अमृत हो गया, शबरी झाडू लगाते-लगाते राग भूली और रामजी द्वार पर आ गये, प्रह्लाद हरि को स्नेह करते-करते राग को भूले और नरसिंह अवतार प्रकट हो गया, ध्रुव पिता की गोद में बैठने का राग भूलने के लिए हरि का राग लगाकर हरिमय हो गये और हरि प्रकट हो गये।
रागरहित होना ब्रह्म होना है। रागरहित होना सिद्ध योगी होना है। रागरहित होना पूजनीय भक्त होना है। रागरहित होना सफल निष्काम कर्मयोगी होना है। जो सेवा के बहाने झण्डा लेकर चलते हैं वे अगर सचमुच में रागरहित होकर सेवा करें तो वे नेता भगवान के दर्शन कर सकते हैं, आत्म-साक्षात्कार कर सकते हैं। जो भजन करते हैं वे अगर रागरहित होकर भजन करें तो जब चाहें, जहाँ चाहे वहाँ भगवान उनके लिए साकार रूप धारण करने को तत्पर हैं।
एकनाथ जी महाराज रागरहित हुए। उन्होंने सोचाः मुझसे इतना सेवाकार्य होता नहीं है, कोई सहयोगी मिल जाय, कोई नौकर-चाकर मिल जाय।' कथा कहती है कि भगवान श्रीखण्ड्या का रूप धारण करके बारह साल तक उनकी चाकरी में रहे। धन्ना जाट के पास भगवान खेत में सहाय करने के लिए मजदूर होकर रहते थे।
रागरहित होते ही जो होना चाहिए वह होने लगेगा। जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होगा। तो फल क्या होगा ? तुम्हारे चित्त में बड़ी शान्ति रहेगी। अभी जो होना चाहिए वह नहीं होता है। जो नहीं होने चाहिए वे प्रोब्लम होते हैं, समस्याएँ होती हैं, अशान्ति होती है। अशान्ति होने से तुम्हारा अपना जो तुर्यावस्था का स्वभाव है वह बिखर जाता है। जैसे,पानी शान्त है लेकिन उसमें लकड़ी डालकर हिलाते रहो, डण्डे मारते रहो, पानी को कूटते रहो तो क्या होगा ? पानी बिखरता जाएगा और तुम्हारा श्रम व्यर्थ होता जाएगा।
एक आदमी नदी पर जाकर लाठी से पानी को कूटने लगा। कोई महात्मा वहाँ से गुजरे। उन्होंने पूछाः
"महाराज ! मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ। इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है।"
निष्काम कर्म करो लेकिन कर्म निष्प्रयोजन तो नहीं होना चाहिए। रागरहित होने के लिए स्वार्थरहित और सप्रयोजन, सार्थक कर्म होना चाहिए। तभी वह परहित का कार्य निष्काम सेवा बन सकेगा।
हम लोग जब सेवा करते हैं तब अपने राग को पोसने के चक्कर में चलते हैं इसलिए सेवा दुकानदारी बन जाती है। हम भक्ति करते हैं तो राग को पोसने के लिए करते हैं, योग करते हैं तो राग को पोसने के लिए करते हैं, भोजन करते हैं तो राग को पोसते हैं। ऐसा नहीं कि शरीर को पोसने के लिए भोजन करते हैं। जब शरीर को पोसने के लिए भोजन करेंगे तब वह भोजन भोजन नहीं रहेगा, भजन बन जाएगा। राग को पोसेंगे तो वह भोजन भोग हो जायेगा। रागरहित होकर भोजन करो तो भोजन योग हो जायगा। रागरहित होकर बात करो तो बात भक्ति हो जाएगी। रागरहित होकर संसार का व्यवहार करो तो वह कर्म योग हो जाएगा। हमारी तकलीफ यह है कि राग की पूँछ पकड़े बिना हमसे रहा नहीं जाता।
जब जब दुःख, मुसीबत, चिन्ता, भय घेर लें तब सावधान रहें और जान लें कि ये सब राग के ही परिवारजन हैं। उन चीजों में राग होने के कारण मुसीबत आयी है। राग तुम्हें कमजोर बना देता है। कमजोर आदमी को ही मुसीबत आती है। बलवान आदमी के पास मुसीबत आती है तो बलवान पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता। अगर प्रभाव पड़ गया तो वह मुसीबत की अपेक्षा कमजोर है।
जब दुःख मुसीबत आये तो क्या करें ?
जब दुःख आयें तब बड़ों की शरण लेनी चाहिए। किसी न किसी की शरण लिये बिना हम लोग जी नहीं सकते, टिक नहीं सकते। दुर्बल को बलवान की शरण लेनी चाहिए।
बलवान कौन है ? जो दण्ड-बैठक करता है वह बलवान है ? जिसके पास सारे विश्व की कुर्सियाँ अत्यंत छोटी पड़ जाती हैं वह सर्वेश्वर सर्वाधिक बलवान है। तुम उस बलवान की शरण चले जाओ। बलवान की शरण गाँधीनगर में नहीं, बलवान की शरण दिल्ली में नहीं, किसी नगर में नहीं बल्कि वह तुम्हारे दिल के नगर में सदा के लिए मौजूद है। सच्चे हृदय से उनकी शरण चले गये तो तुरन्त वहाँ से प्रेरणा, स्फूर्ति और सहारा मिल जाता है। वह सहारा कइयों को मिला है। हम लोग भी वह सहारा पाने के लिए तत्पर हैं इसीलिए सत्संग में आ पहुँचे हैं।
तुम कब तक बाहर के सहारे लेते रहोगे ? एक ही समर्थ का सहारा ले लो। वह परम समर्थ परमात्मा है। उससे प्रीति करने लग जाओ। उस पर तुम अपने जीवन की बागडोर छोड़ दो। तुम निश्चिन्त हो जाओगे तो तुम्हारे द्वारा अदभुत काम होने लगेंगे परन्तु राग तुम्हें निश्चिन्त नहीं होने देगा। जब राग तुम्हें निश्चिन्त नहीं होने दे तब सोचोः
'हमारी बात तो हमारे मित्र भी नहीं मानते तो शत्रु हमारी बात माने यह आग्रह क्यों ? सुख हमारी बात नहीं मानता, सदा नहीं टिकता तो दुःख हमारी बात बात कैसे मानेगा ? लेकिन सुख और दुःख जिसकी सत्ता से आ आकर चले जाते हैं वह प्रियतम तो सतत हमारी बात मानने को तत्पर है। अपनी बात मनवा-मनवाकर हम उलझ रहे हैं, अब तेरी बात पूरी हो... उसी में हम राजी हो जाएँ ऐसी तू कृपा कर, हे प्रभु !
हम दुःखी कब होते हैं ?
जब हम अपनी बात को, अपने राग को ईश्वर के द्वारा पूर्ण करवाना चाहते हैं तब हम दुःखी होते हैं। अपने राग को जब ईश्वर के द्वारा पूरा करवाना न चाहें तब ईश्वर जो करेगा वह बिल्कुल पर्याप्त होगा।
रबिया ने रोजा रखा। रोजा खोलने के लिए उसके पास आधा कटोरा रस का था। वह कटोरा लगी तो छुपी हुई बिल्ली ने जम्प मारा और रस ढुल गया। रबिया ने कहाः 'कोई बात नही। रस ढुल गया तो क्या हुआ ? मैं पानी से ही रोजा खोल लूँगी।'
चिराग लेकर वह पानी भरने को गई। पैर में ठोकर लगी और चिराग गिर पड़ा, बुझ गया। खुद अन्धेरे में पानी की मटकी पर गिर पड़ी। पीने के लिए पानी भी हाथ नहीं लगा। रबिया कहने लगीः
"मेरे मालिक ! रस का प्याला पीने की मैं अधिकारी नहीं थी लेकिन क्या पानी भी मेरे मुकद्दर में नहीं है ?"
भीतर से आवाज आयीः "रबिया ! अगर तुझे राग सहित रहना है तो ठहर। मुझे तेरे दिल से अपनी मुहब्बत निकाल लेने दे, फिर खूब संसार का राग और संसार का रस ले।"
रबिया छटपटा उठीः "नहीं मेरे मालिक ! मैं बिस्त को पाने के लिए तुझे प्यार नहीं करती, दोजख से बचने के लिए तुझे स्नेह नहीं करती और रस या पानी के लिए मैं तुझे नहीं पुकारूँगी। मैं तुझे तेरे लिए ही पुकारूँगी क्योंकि तू अपने आप में ही पूरा है।"
भगवान अपने आप में पूरे हैं। उनमें हमारी स्थिति हो जाय तो बस, सब कार्य सम्पन्न हो गये। रबिया ने कब चाहा था कि मोटेरा में आश्रम बने और हजारों लोगों के सामने मेरी प्रशंसा हो ? प्रशंसा के लिए तो लोग मारे-मारे फिरते हैं, उनकी प्रशंसा तो होती नहीं। रागरहित होने से तुम्हारी प्रसिद्धि और प्रशंसा स्वाभाविक हो जाएगी। रागरहित होने से तुम्हारी मुक्ति स्वाभाविक हो जाएगी। रागरहित होने से तुम्हारा योग स्वाभाविक हो जाएगा।
पतिव्रता स्त्री में सामर्थ्य कहाँ से आता है ? वह अपनी इच्छा नहीं रखती, अपना राग नहीं रखती। पति के राग में अपना राग मिला देती है। भक्त भगवान के राग में अपना राग मिला देता है। शिष्य गुरू के राग में अपना राग मिला देता है।
पति का राग कैसा भी हो लेकिन पतिव्रता पत्नी अपना राग उसमें मिटा देती है तो उसमें सामर्थ्य आ जाता है।
भगवान का राग यह होता है कि जीव ब्रह्म हो जाय, सदगुरू का राग यह होता है कि जीव अपने स्वरूप में जाग जाए। जब भगवान के राग में अपना राग मिला दिया, सदगुरू के राग में अपना राग मिला दिया, सदगुरू के राग में अपना राग मिला दिया तो फिर चिन्ता और फरियाद को रहने की जगह ही नहीं मिलती।
जो शिष्य भी है और दुःखी भी है तो मानना चाहिए कि वह अर्ध शिष्य है अथवा निगुरा है। जो शिष्य भी है और चिन्तित भी है तो मानना चाहिए कि उसमें समर्पण का अभाव है। मैं भगवान का, मैं गुरू का तो चिन्ता मेरी कैसे ? चिन्ता भी भगवान की हो गई.... गुरू की हो गई। हम भगवान के हो गये तो बेईज्जती हमारी कैसे ? हम भगवान के हो गये तो 'प्रोब्लम' हमारे कैसे ?
जैसे, आदमी कारखाने का कर्मचारी हो जाता है तो कारखाने को नफा हो चाहे नुक्सान हो, उस आदमी को अपनी तनख्वाह मिल जाती है। ऐसे ही हम जब ईश्वर के हो गये तो हमारा शरीर ईश्वर का साधन हो गया। उसे आजीविका मिलेगी ही। अपना काम होशियारी से, चतुराई से करे लेकिन अपने राग को तृप्त करने के लिए नहीं। जो कुछ करे, अपने राग को ईश्वर में समर्पित करने के लिए। यह बिल्कुल आसान उपाय है राग को मिटाने के लिए।
दूसरा उपाय यह हैः
जो लोग सुखी हैं वे अपना राग नहीं छोड़ सकते। सुखी आदमी परहित में लगेगा तो उसका राग क्षीण होगा। दुःखी आदमी राग की वस्तु को मन से ही छोड़ेगा तो उसका योग होने लगेगा। भक्त भगवान में अपना राग मिलाने लगे तो उसकी भक्ति सफल होने लगेगी। सदगुरू के सिद्धान्तों में अपना राग मिला दे तो शिष्य सदगुरू बन जायगा।
कबीर जी ने कितना सुन्दर कहाः
सदगुरू
मेरा शूरमा
करे शब्द की
चोट।
मारे
गोला प्रेम का
हरे भरम की
कोट।।
जीव का भ्रम है किः "यह मिल जाय तब मैं सुखी होऊँगा। यह परिस्थिति चली जाय तब मैं सुखी होऊँगा। बेटा हो जाय तब सुखी होऊँगा।'' यह सारा का सारा भ्रम है, भ्रांति है। इससे अगर कोई सुखी हो जाता तो संसार में कई लोग आज तक सच्चे सुखी हो जाते। इन चीजों से वास्तव में सुख का कोई सम्बन्ध नहीं है। सच्चे सुख का सम्बन्ध है रागरहित होने से। रात्रि को जितने अंश में तुम्हारा राग दब जाता है उतने तुम निश्चिन्त होते हो, निश्चिन्त सोते हो। सुबह होते ही तुम्हारा राग जगता हैः "यह करना है..... यह पाना है.... यह लेना है.... .वहाँ जाना है....'' तो मस्तिष्क में चिन्ताएँ सवार हो जाती हैं। जब सत्संग, ध्यान, भजन के स्थान में आते हैं, राग की बातों को छोड़ देते हैं तो लगता हैः "आहाहा... बापू ने बड़ा आनन्द दिया..... बड़ी शान्ति दी।' बापू ने आनन्द नहीं दिया, बापू ने शांति नहीं दी। बापू का भी बापू तुम्हारे हृदय में था। रागरहित होकर तुमने उसकी झाँकी कर ली तो आनन्द आ गया, शान्ति मिल गई। वह भीतर वाला बापू तो सदा से तुम्हारे साथ ही बैठा है। राग रहित हो जाओ, सब काम बन जाएँगे। राग छोड़ना एक दिन का काम नहीं है। रोग पुराना है। एक दिन की औषधि से काम नहीं चलेगा। प्रतिदिन औषधि खाओ और प्रति व्यवहार के समय औषधि खाओ तो काम बनेगा। अन्य औषधियाँ तो रिएक्शन करती हैं लेकिन सत्संग विचार की औषधि सारे रिएक्शनों को स्वाहा कर देती है। इसलिए बार-बार सत्संग विचार करो, आत्म-विचार करो।
यह विचार केवल मंदिर में बैठकर ही नहीं किया जाता। यह मंदिर में भी होता है, सत्संग भवन में भी होता है, दुकान पर बैठकर भी होता है, रास्ते चलते-चलते भी होता है। यह विवेक विचाररूपी मित्र ऐसा है जो सदा साथ रहता है, सुरक्षा करता है।
विवेक को जागृत करते जाओ। अविद्या का अन्धकार धीरे-धीरे बिखरता जाएगा। सुबह में सूर्य के उदय होने से पहले ही अन्धकार पलायन होने लगता है ऐसे ही विवेक जागेगा तो दुःख मिटने लगेंगे। सब दुःख मिटाने की यह कुंजी है। अन्यथा तो, राग लेकर बैठे और योग किया, प्राण ऊपर चढ़ा दिये, शरीर को वर्षों तक जीवित रखा, फिर नट की समाधि खुली तो वह राजा से बोलता है कि लाओ, मुझे इनाम में तेज भागने वाली घोड़ी दे दो। रागरहित नहीं हुआ तो क्या लाभ ? योग किया, प्राण चढ़ाकर सहस्रार चक्र में पहुँच गया, हजारों वर्ष की समाधि लगा दी फिर भी ठंठनपाल रह गया। राजा जनक ने राग मिटा दिया तो जीवन्मुक्त होकर राज्य करते है।
राग मिटाने का एक मधुर तरीका यह भी है कि भगवान में राग करते रहो।
तुम बच्चे को कह दो कि सुबह-सुबह अण्डे का चिन्तन मत करना। दूसरे दिन सुबह में उसको अण्डे का चिन्तन आ जायगा। उसे अगर अण्डे के चिन्तन से बचाना है तो उसे अण्डे का चिन्तन मत करो, ऐसा न कहो। उसे कहोः 'सुबह उठकर हाथों को देखना, भगवान नारायण का चिन्तन करना।
कराग्रे
वसति
लक्ष्मीः
करमूले
सरस्वती।
करमध्ये
तु गोविंदः
प्रभाते
करदर्शनम्।।
इस प्रकार सुबह-सुबह में अपने हाथ को देखकर भगवान नारायण का स्मरण करने से अपना भाग्य खुलता है।'
इस प्रकार बच्चा भगवान का स्मरण करने लग जाएगा और उसका हल्का चिन्तन अपने आप चला जायेगा।
विकारों को पोसने वाली हमारी संवित् को विकारों से हटाने के लिए निर्विकारी नारायण का चिन्तन करने से विकारों को हटाने का परिश्रम नहीं पड़ेगा। विकारों को हटाने के लिए अगर परिश्रम करने लगे और कदाचित सफल हो गये, विकार हट गये तो गर्व हो जाएगा किः "मैंने काम को जीता, मैंने लोभ को जीता, मैंने मोह को छोड़ा, मैं आठ दिन तक मौन मंदिर में रह गया.....।' ऐसा गर्व आने से भी खतरा है। अगर प्रभु में राग कर लेते हैं तो गर्व आने का खतरा नहीं रहेगा।
कबीर जी ने कहा हैः
सब घट
मेरा साँईया
खाली घट न
कोय।
बलिहारी
वा घट की जा घट
परगट होय।।
कबीरा
कुँआ एक है
पनिहारी
अनेक।
न्यारे
न्यारे बर्तनों
में पानी एक
का एक।।
कबीरा
यह जग निर्धना
धनवंता नहीं
कोई।
धनवंता
तेहू जानिये
जा को रामनाम
धन होई।।
जो चैतन्य सबके रोम-रोम में बस रहा है वह राम...... जो चैतन्य सबको आकर्षित कर रहा है वह कृष्ण.... उस चैतन्य में अगर मन लग जाये तो बेड़ा पार है। जहाँ से हमारी संवित उठती है वही सारे विश्व का आधार है। वही तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा तुम्हारे अति निकट है और सदा रहता है। पत्नी का साथ छोड़ना पड़ेगा, पति का साथ छोड़ना पड़ेगा, साहब का साथ छोड़ना पड़ेगा, अरे लाला ! इस शरीर का भी साथ छोड़ना पड़ेगा लेकिन उस अन्तर्यामी साथी का साथ कभी नहीं छोड़ना पड़ेगा। बस, अभी से उसी में आ जाना है, और क्या करना है ? यह कोई बड़ा काम है ? जिसका कभी साथ नहीं छूटता है उसमें राग करना है। जिसका साथ टिकता नहीं है उससे राग हटा देना है।
साथ टिकेगा नहीं उस चीज से अपना राग हटा लेंगे तो तुम स्वतन्त्र हो जाओगे। अगर साथ न टिकने वाली चीजों में राग रहा तो कितना दुःख होगा ! दुःख ही होगा, और क्या होगा ?
हम उसी से सम्बन्ध जोड़ रहे हैं जिससे आखिर तोड़ना है। जिससे सम्बन्ध तोड़ना है उसके साथ तो प्रारब्धवेग से सम्बन्ध होता रहेगा, आता रहेगा, जाता रहेगा..... लेकिन जिससे सम्बन्ध कभी नहीं टूटता उसकी केवल स्मृति रखनी है, सम्बन्ध जोड़ने का परिश्रम भी नहीं करना है। दुनिया के अन्य तमाम सम्बन्धों को जोड़ने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
कलेक्टर की कुर्सी के लिए सम्बन्ध जोड़ना है तो बचपन से पढ़ाई करते-करते.... मजदूरी करते-करते.... परीक्षाओं में पास होते-होते आखिर आई.ए.एस. हो गये। फिर कलेक्टर पद पर नियुक्ति हुई तब कुर्सी से सम्बन्ध जुड़ा। कभी एक जिले में तो कभी दूसरे जिले में बदली होती रही..... आखिर बुढ़ापे में साहब बेचारा देखता ही रह जाता है। जवानी में तो हुकूमत चलाई लेकिन अब छोरे कहना नहीं मानते। इससे तो हे भगवान ! मर जाएँ तो अच्छा।
अरे ! तू मरने के लिए जन्मा था कि मुक्त होने के लिए जन्मा था ?
तुम पैदा हुए थे मुक्त होने के लिए। तुम पैदा हुए थे अमर आत्मेदव को पाने के लिए।
"पढ़ते क्यों हो ?"
"पास होने के लिए।"
"पास क्यों होना है ?!"
"प्रमाणपत्र पाने के लिए।"
"प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?"
"नौकरी के लिए।"
"नौकरी क्यों चाहिए ?"
"पैसे कमाने के लिए।"
"पैसे क्यों चाहते हो ?"
"खाने के लिए।"
"खाने क्यों चाहते हो ?"
"जीने के लिए।"
"जीना क्यों चाहते हो ?"
"................"
कोई जवाब नही। कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः "मरने के लिए।" अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है। मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए। मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है।
राग ही आदमी को बेईमान बना देता है, राग ही धोखेबाज बना देता है, राग ही चिन्तित बना देता है, राग ही कर्मों के बन्धन में ले आता है। रागरहित होते ही तुम्हारी हाजिरी मात्र से जो होना चाहिए वह होने लगेगा, जो नहीं होना चाहिए वह रूक जाएगा। रागरहित पुरूष के निकट हम बैठते हैं तो हमारे लोभ, मोह, काम, अहंकार शान्त होने लगते हैं, प्रेम, आनन्द, उत्साह, ईश्वर-प्राप्ति के भाव जगने लग जाते हैं। उनकी हाजरी मात्र से हमारे हृदय में जो होना चाहिए वह होने लगता है, जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होता।
राग रहित होना माने परम खजाना पाना। रागरहित होना माने ईश्वर होना। रागरहित होना माने ब्रह्म होना।
आजकल तो सब दरिद्र मिलते है। धन तो है लेकिन दिल में शान्ति नहीं है। सत्ता तो है लेकिन भीतर रस नहीं है। धन होते हुए हृदय में शान्ति नहीं है..... वे कंजूस, धन के गुलाम, धन में राग वाले, सत्ता में राग वाले, परिवार में रागवाले सफल दरिद्र हैं। इन चीजों को बटोरकर सुखी हो जाना चाहते हैं वे मूर्ख हैं।
कबीरा
इह जग आयके
बहुत से कीने
मीत।
जिन दिल
बाँधा एक से
वो सोये
निश्चिन्त।।
रागरहित हुए तो एक परमात्मा का साक्षात्कार हो गया, वे निश्चिन्त हो गये। फिर उनकी मृत्यु उनकी मृत्यु नहीं है, उनका जीना उनका जीना नहीं है। उनका हँसना उनका हँसना नहीं है। उनका रोना उनका रोना नहीं है। वे तो रोने से, हँसने से, जीने से, मरने से बहुत परे बैठे हैं।
न तद्
भासते सूर्यो
न शशांको न
पावकः।
यद्
गत्वा न
निर्वतन्ते
तद् धाम परमं
मम।।
'जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते, उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है।'
(भगवद् गीताः 15.6)
रागरहित पुरूष उस परम धाम को प्राप्त हो जाते हैं। बस, इतना ही काम है जो चुटकी बजाते पूरा हो जाय। ऐसा नही कि कुछ करेंगे तब परम धाम में जाने के लिए विमान आयगा। अरे, विमानवाले धाम में तो खतरा है। पुण्य क्षीण होते ही मृत्युलोक में वापस।
क्षीणे
पुण्ये
मर्त्यलोकं
विशन्ति।
परम धाम में तो आवागमन और वायदे की तो बात ही नहीं।
मूंआ
पछीनो वायदो
नकामो को जाणे
छे काल।
आज
अत्यारे अब
घड़ी साधो जोई
लो नगदी रोकड़
माल।।
तुम्हारी संवित् स्फूर्ति है, जाग्रत अवस्था में जाती है, स्वप्न अवस्था में जाती है, कुण्ठित होने पर सुषुप्ति में जाती है, उससे परे जो तुर्यावस्था है, जो जाग्रत को, स्वप्न को, सुषुप्ति को देखती है उस तुर्यावस्था का तुम हररोज अनुभव करते हो। वहीं से तुम्हारी संवित् उठती है।
तुमने जाग्रतावस्था देखी, जाग्रतावस्था बदल गई। सोये तो स्वप्न देखा और स्वप्न चला गया। फिर गहरी नींद में चले गये। नींद भी पूरी हो गई तो फिर जाग्रत में आ गये। इन तीनों अवस्थाओं को देखने वाला, जानने वाला तो कोई है। यह जानने वाली तुर्यावस्था है। तुर्यावस्था में पहुँचे तो रागरहित हो गये।
जानने वाले में हम लोग टिकते नहीं और जो जाना जाता है उसमें भटकने से उबते नहीं। कितने चतुर आदमी हैं हम लोग ! जो जाना जाता है उसमें भटकते हैं जिससे जाना जाता है उसमें टिकते नहीं केवल ये दी ही गलतिया हैं, बाकी सब ठीक है।
बाकी बचा क्या ? सर्वनाश हो गया। जिन लोगों ने आज तक संसार का जो कुछ पकड़ा था, थामा था उनको आखिर मिला क्या ? उन्हीं चीजों को हम पकड़ रहे हैं। उन्हीं शरीरों से पकड़ रहे हैं। आज तक सदा के लिए कोई माई का लाल पकड़ नहीं पाया। दूसरों को फूँक मारकर मौत से उठाने वाले पीर फकीर लोग भी संसार को नहीं पकड़ पाये। अवतारों को भी सब छोड़ना पड़ा तो औरों की क्या बात करें ?
......तो जो छोड़ना है उससे राग छोड़ दो। राग छूटते ही तुम बादशाह हो जाओगे। जो छोड़ना है उससे राग छोड़ दो, भले उस वस्तु को मत छोड़ो। केवल राग छोड़ दो। राग छोड़ते ही वह वस्तु तुम्हारे लिए प्रसाद बन जाएगी। वह वस्तु परहित में लग जाएगी। राग ही तो बाँध रखता है। जीवनभर जो चीज नहीं दी वह मृत्यु आने पर बलात्कार से देनी ही पड़ेगी। जीवनभर जिन चीजों को सँभाला, मरते समय सब छोड़कर जाना ही पड़ेगा। हाँ..... राग साथ में चलेगा और वही राग जीव को छिपकली बना देगा, छछूंदर बना देगा।
जन्म मरण का कारण भगवान नहीं है। जन्म-मरण का कारण पत्नी, पुत्र, परिवार, मित्र या कोई व्यक्ति नहीं है। जन्म-मरण का कारण राग है। इसलिए हे नाथ ! अपने आप पर कृपा करो। रागरहित होने का यत्न करो।
नारायण.... नारायण... नारायण..... नारायण...... नारायण। रागरहित, वीतराग पुरूषों के सान्निध्य से निर्भय सुख मिलता है, निर्विकार सुख मिलता है, निर्द्वन्द्व सुख मिलता है। राग की पूर्ति करने से भयवाला सुख मिलता है, चिन्ता वाला सुख मिलता है। वास्तव में वह सुख नहीं है, हर्ष है। ऐसा कोई भोगी नहीं जो भोग के प्रारम्भ में पराधीनता, भोग के समय शक्तिहीनता और अन्त में जड़ता का अनुभव न करे। भोग पराधीनता, शक्तिहीनता और जड़ता में ले जाता है। योग स्वाधीनता, शक्ति और चेतनता में ले जाता है। दोनों के बीच बड़ा फासला है।
जो लोग भोग में पड़ते हैं और अति भोगी हो जाते हैं वे मृत्यु के बाद वृक्ष आदि जड़ योनियों में चले जाते हैं।
एक बार केवल तीन मिनट के लिए रागरहित अवस्था का साक्षात्कार हो जाए फिर चाहे वह भोग में रहता दिखे चाहे योग में रहता दिखे, चाहे घर में रहता दिखे चाहे हिमालय की कन्दरा में रहता दिखे, लेकिन वह है अपने स्वरूप में। भोग उसे बाँध नहीं सकते। वह चाहे शास्त्र के अनुकूल आचरण करे या शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करके भी विचरे फिर भी कोई प्रत्यवाय नहीं लगता।
सामान्य आदमी क्रोध करता है तो उसका तप नष्ट हो जाता है। उसके संकल्प में बल नहीं रहता। दुर्वासा ऋषि अकारण क्रोध करते थे फिर भी उनकी शक्ति क्षीण नहीं हुई। क्योंकि वे वीतराग महापुरूष थे।
रागरहित अवस्थावाला कैसा होता है ? उसके पीछे-पीछे हरि फिरते है। भगवान श्रीकृष्ण कहते है-
उधो
मोहे संत सदा
अति प्यारे.......
मैं
संतन के पीछे
जाऊँ जहाँ
जहाँ संत
सिधारे।
उधो
मोहे....
जिसके राग का अन्त हो गया है वह संत। राग का अंत होते ही जन्म मरण का अंत हो गया, भय का अंत हो गया, चिन्ता का अंत हो गया, काम का अंत हो गया, क्रोध का अंत हो गया, लोभ का अन्त हो गया, मोह का अंत हो गया, अहंकार का अंत हो गया। पूरा मूल ही कट गया। कितनी सीधी बात है ! फिर भी कठिन लगती है क्योंकि राग को पोसने की आदत पुरानी है।
जो बीड़ी नहीं पीते उनके लिए बीड़ी छोड़ना कोई कठिन नहीं। जो अभी बीड़ी पीने के सिक्खड़ हैं उन्हें छोड़ना कठिन है और जिनको बीड़ी गहरी चली गई है उनको तो बीड़ी छोड़ना असंभव सा है। रोटी नहीं मिलेगी तो चलेगा लेकिन बीड़ी के बिना नहीं चलेगा।
जो जहाँ है वहाँ सुखी होने की कला नहीं सीखता उसके लिए स्वर्ग भी सुखद नहीं होगा। जो जहाँ है वहीं अपनी गहराई में जाने की कला सीख गया है तो वह अगर नर्क में भी जाएगा तो नर्क भी उसके लिए स्वर्ग बन जाएगा, वैकुण्ठ बन जाएगा।
हे मानव ! तू अपनी गहराई में गोता मार। बाह्य परिस्थितियों में आसक्ति मत रख। तू जहाँ है वहीं अपने सुखस्वरूप आत्मा को पा। रागरहित हो जा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
महाकामी, वेश्यागामी बिल्वमंगल अपनी पत्नी होते हुए भी वेश्या के फंदे में बुरी तरह फैल गया था।
सावन का महीना था। रात्रि का समय था। जोरों की वर्षा हो रही थी। यमुना नदी पागल-सी होकर बह रही थी। आँधी-तूफान चल रहा था। वृक्ष गिर रहे थे। घनघोर रात्रि में बिजली चमक रही थी। बिल्वमंगल के दिमाग में काम विकार का कीड़ा कुरेद रहा था।
वह उठा। घर का दरवाजा खोला। अपनी पत्नी का त्याग करके घनघोर अन्धकार में, बरसात में चल पड़ा। बिजली के चमकारे में अपने पगडंडी खोजता हुआ जा रहा था अपनी प्रेयसी चिनतामणि वेश्या के भवन की ओर.... उफनती हुई यमुना नदी के उस पार।
बिल्वमंगल नदी के किनारे पर आया। नाविकों से कहाः
"मुझे उस पार जाना है। नाव ले चलो......।"
नाविकों ने कहाः "पागल हुए हो ? अपनी जान प्यारी नहीं है क्या ? घर पर बीबी-बच्चे हैं कि नहीं ? तुम्हारी चवन्नी के लिए हमें नाव के साथ सागर में नहीं पहुँचना है। रात्रि के बारह बजे हैं। बिल्वमंगल ! तुम्हारी बुद्धि क्यों नष्ट हो गई है ? मूसलधार वर्षा हो रही है। घनघोर अन्धकार है। नदी दोनों किनारों को डुबाती हुई बह रही है। ऐसी परिस्थितियों में तुम्हें नदी के उस पार जाना है ? कुछ होश है कि नहीं ?"
बिल्वमंगल कहता हैः "चिन्तामणि के यहाँ पहुँचूँगा तब मैं होश में आऊँगा। अभी तो मानो बेहोश ही हूँ। तुम मुझे नदी के उस पार ले चलो।"
कोई नाविक जाने के लिए तैयार नहीं था। बिल्वमंगल ने अधिक किराये का प्रलोभन दिया लेकिन व्यर्थ। अपने प्राणों की बाजी लगाने को कोई तैयार नहीं था।
लेकिन बिल्वमंगल....! अपनी प्रेयसी से मिलने के लिए बेचैन था वह। कामातुर बिल्वमंगल बाढ़ में उफनती हुई यमुना में कूद पड़ा। हाथ-पैर चलाते हुए आगे बढ़ा। नदी के प्रवाह से बिल्वमंगल का कामावेग का प्रवाह अधिक बलवान सिद्ध हुआ। प्रेयसी चिन्तामणि के मिलन के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।
बिल्वमंगल हाथ-पैर मारता हुआ, तीव्र गति से बहती हुई यमुना के प्रवाह में डूबता-उतरता आखिर कैसे भी करके सामने किनारे पहुँच गया। शरीर भीगा हुआ था। साँस फूल गई थी। ठंडी के मारे ठिठुर रहा था। तन-बदन परिश्रम से थक चुका था। थोड़ी देर में स्वस्थ होकर बिल्वमंगल चल पड़ा अपनी माशुका के द्वार की ओर। पहुँचते ही द्वार पर दस्तक दी, पुकार लगायी।
चिन्तामणि उसकी दस्तक पहचान गई। दंग रह गई वह वेश्या। 'ऐसी मूसलाधार वर्षा हो रही है..... यमुना नदी बाढ़ से उफन रही है। मध्यरात्रि का घनघोर अन्धकार है फिर भी यह पुरूष आ पहुँचा ! नदी को पार करके ! ऐसी हिम्मत ! ऐसा प्राणबल ! ऐसी शक्ति ! मेरे हाड़-मांस के लिए इतना प्रेम ! यह प्रेम अगर विश्वनियन्ता परमात्मा के लिए होता तो यह पुरूष विश्व की महान् विभूति बन जाता।'
चिन्तामणि के चित्त में प्रभु की पावन प्रेरणा का संचार हुआ। हृदय में बैठे हुए हरि ने चिन्तामणि को सत्प्रेरणा दी।
बिल्वमंगल बार-बार द्वार खटखटाने लगा। चिन्तामणि ने द्वार नहीं खोला। वह किवाड़ के पीछे खड़ी होकर अपने ग्राहक को कहने लगीः
"बिल्वमंगल ! ऐसी जोरों की बारिश में तू बाढ़ के पानी से भरपूर यमुना को पार करके आ गया ?"
"हाँ प्रिये ! कोई नाविक नाव चलाने के लिए तैयार नहीं था तो मैं नदी तैरकर तेरे पास आया हूँ। तू दरवाजा खोल।"
तब चिन्तामणि कहने लगीः "यह दरवाजा अब तेरे लिए नहीं खुलेगा। सदा के लिए बन्द रहेगा। अब तू अपने हृदय के द्वार खोल। अब तू प्रभु के द्वार खटखटा। मेरा द्वार तू कब तक खटखटाता रहेगा ?"
बिल्वमंगल के दिल में धक्का सा लगाः
"अरे चिन्तामणि ! यह तू क्या कह रही है ? तुझे देने के लिए मैं कितना धन लाया हूँ, द्वार खोलकर जरा देख तो सही !"
चिन्तामणि ने दृढ़ स्वर से कह दियाः
"ये द्वार अब तेरे लिए कभी नहीं खुलेंगे। तू प्रभु का द्वार खटखटा। मेरे जैसी वेश्या का द्वार खटखटाने के लिए तू मध्यरात्रि में इतना साहस कर सकता है तो हे बिल्वमंगल ! मेरे हरि का द्वार तू खटखटायेगा तो महान संत हो जाएगा।"
बिल्वमंगल कहता हैः "इन सब बेकार बातों को छोड़ चिन्तामणि ! भगतड़ों की ये बाते तेरे मुँह में नहीं सोहती प्रिये ! मैं तुझसे मिलने के लिए लालायति हो रहा हूँ और तू बातें बनाये जा रही है ! अब मुझे ज्यादा मत तड़पा। जल्दी द्वार खोल। मुझे तेरे दर्शन करने दे। तेरे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता।"
आँखों में आँसू लाकर बिल्वमंगल गिड़गिड़ा रहा है। उधर चिन्तामणि अपने हृदय पर भारी शिला रखकर अपने हृदय को जबरन कठोर बना रही है। बाहर खड़े अपने पर फिदा होने वाले से कहने लगीः
"बिल्वमंगल ! मेरे दर्शन करके क्या करेगा ? इन हाड़-मांस पर मोह करके कितने ही लोग बरबाद हो गये हैं। हे बिल्वमंगल ! तुझे अगर दर्शन ही करने हों तो हरि बैठा है तेरे हृदय में। उसी प्यारे प्रभु के दर्शन कर। तेरा कल्याण हो जाएगा। वह परमात्मा जन्म-जन्म से तेरे साथ है। मेरे दर्शन से तेरा कोई काम नहीं बनेगा। मैं तुझे क्या दर्शन दूँगी ? मैं तो पापिन हूँ.... मैंने अपना जीवन पापकर्म में नष्ट किया और कइयों के घर बरबाद किये। मेरे दर्शन से तेरा उद्धार नहीं होगा। सच्चा दर्शन तो हरि का दर्शन है। तेरा उद्धार तो हरि के दर्शन से होगा।"
मानो, आज चिन्तामणि के मुँह से स्वयं हरि बोल रहे हैं। चिन्तामणि के हृदय का कब्जा मानो प्रभु ने ले लिया है। चिन्तामणि रूपी चिराग के द्वारा हरि स्वयं बिल्वमंगल का पथप्रदर्शन कर रहे हैं।
बिल्वमंगल तीव्र कामावेग में आकर फिर से गिड़गिड़ाने लगाः
"चिन्तामणि ! प्रिय तू दरवाजा खोल। एक बार.... सिर्फ एक बार तेरा दीदार कर लेने दे। मैं अपनी पत्नी को छोड़कर तेरे पास आया हूँ। नाविकों ने मुझे समझाया बुझाया तो उनकी बातों का भी त्याग करके तेरे पास आया हूँ। नदी की बाढ़ में कूदकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर तेरे पास आया हूँ, प्रिये ! मेरा आगमन व्यर्थ मत कर चिन्तामणि ! द्वार खोल।"
चिन्तामणि कहती हैः "तेरे कई आगमन व्यर्थ हुए बिल्वमंगल ! अनेक जन्मों का आवागमन तू व्यर्थ करता चला आ रहा है। मेरे दर्शन से भी तेरा आगमन व्यर्थ ही रहेगा। तेरा आगमन तभी सफल होगा जब तू हरि के दर्शन करेगा, आत्मा के दर्शन करेगा, किसी संत महात्मा के दर्शन करेगा, किसी आत्मज्ञानी महापुरूष के चरणों में अपना सिर झुकायेगा। तभी तेरा आगमन सफल होगा बिल्वमंगल ! अब ये द्वार तुम्हारे लिए नहीं खुलेंगे..... नहीं खुलेंगे..... नहीं खुलेंगे....।"
बिल्वमंगल की आँखों में आँसू हैं..... दिल में बेचैनी है.... बुद्धि में आश्चर्य है... चित्त में स्पन्दन है। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो रहा है। एक बार फिर से वह प्रयास करता हैः "हे कामिनी चिन्तामणि ! आज तुझे क्या हो गया है ? किसने तुझे यह पागलपन सिखाया है ? तू पागल मत बन.... हे प्रिये ! इतनी कठोर मत बन। मेरा दिल तेरे प्यार में तड़प रहा है। अब अधिक तड़पाना छोड़ दे। अब दिल्लगी करना छोड़ दे। मेरे धैर्य की क्यों कसौटी कर रही है ? मेरे जैसा पिपासु प्रेमी तुझे दूसरा कोई नहीं मिलेगा प्रिये ! हे सुंदरी ! अब तो द्वार खोल दे।"
तब चिन्तामणि बोली उठीः "बिल्वमंगल ! मेरे जैसी वेश्या भी तुझे नहीं मिलेगी मेरे भाई !"
"अरे पगली ! तू मुझे क्या कहती है ? मुझे भाई कहकर पुकारती है ?"
"हाँ भैया ! आज से तू मेरा भाई है। मैं तुम्हारी छोटी बहन हूँ। हे भाई ! तेरा कल्याण हो... तेरा उद्धार हो.... भाई ! तुझे भक्ति मिले..... भाई ! तुझे ज्ञान मिले..... भाई ! तुझे प्रभु का प्रेम मिले। मेरे जैसी दुष्ट स्त्री की छाया भी तुझ पर न पड़े। हे मेरे भाई ! मैं तुझे आशीर्वाद देती हूँ।"
उस वेश्या के हृदय से हरि नहीं बोल रहे थे तो और कौन बोल रहा था ? और किसका सामर्थ्य है कि वेश्या के मुख से ऐसे पवित्र वचन बोल सके ?
बिल्वमंगल का हृदय परिवर्तित हो गया। उसके उदगार निकलेः
"हे देवी ! मेरे लिए तेरा यह द्वार नहीं खुलेगा तो और किसी का भी द्वार मैं नहीं खटखटाऊँगा। आज के बाद मैं कभी अपने घर नहीं जाऊँगा..... आज के बाद किसी सम्बन्धी के घर नहीं जाऊँगा.... आज के बाद किसी सेठ के घर नहीं जाऊँगा। जो सबका घर है, जो उसका सम्बन्धी है, जो उसका सेठ है, जो सबका स्वामी है, जो सबका मित्र है, जो सबका बाप है, जो सबकी माँ है, जो सबका बन्धु है, जो सबका सुहृद है, उस हरि का द्वार मैं अब खटखटाऊँगा। अब मैं किसी के द्वार पर खड़ा नहीं रहूँगा।"
बिल्वमंगल चिन्तामणि के द्वार से लौट पड़ा।
घूमता-घामता बिल्वमंगल किसी देवमंदिर में पहुँचा। सूखे बाँस की भाँति बिल्वमंगल ने देवमूर्ति के सामने गिरकर दंडवत् प्रणाम किये। लम्बे समय तक इसी अवस्था में रहकर वह प्रभु से प्रार्थना करने लगा। हृदय में आज तक किये हुए दुश्चरित्र का पश्चाताप है। आँखों से आँसू की धाराएँ बह रही हैं।
पुजारी ने बिल्वमंगल को उठाया। बिल्वमंगल कहने लगाः
"मुझे उठाओ नहीं। काफी जन्मों तक मैं भटका हूँ। अब प्रभु के चरणों में मुझे विश्रान्ति लेने दो। पतितपावन के चरणों में मुझे पाप धोने दो।
मुझे
वेद पुरान
कुरान से क्या
मुझे
प्रभु का अमृत
पिला दे कोई।।
मुझे कोई प्रभु का अमृत पिला दे.... मुझे कोई प्रभु की भक्ति दिला दे.... मुझे कोई प्रभु का प्रेम प्राप्त करा दे.... चिन्तामणि का प्रेम तो मुझे बरबाद कर चुका है। अब प्रभु का प्रेम मुझे आबाद करेगा।"
बिल्वमंगल मंदिर में दंडवत प्रणाम करके पड़ा रहा है। लोग उसे समझाकर उठाते हैं। बिल्वमंगल की आँखों में आँसू हैं। वे मानो कह रहे हैं-
एवो
दी देखाड़
वहाला एवो दी
देखाड़।
देखूं
तारूँ रूप बधे
एवो दी
देखाड।।
"हे प्रभु ! अब मैं तेरा द्वार छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।"
बिल्वमंगल ने प्रभु के द्वार पर पड़े रहते हुए सारा जीवन बिताने का संकल्प किया और वहीं रहने लगा। लोगों ने उसका जीवन देखा, उसकी प्रेमाभक्ति देखी, उसका दृढ़ संकल्प सुना। कुछ समय बीतने पर बिल्वमंगल को मंदिर का पुजारी बनाया गया। पुजारी को खाने पीने की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। ठाकुर जी का चढ़ाया हुआ प्रसाद मिल जाता है।
वैराग्य आने पर घर छोड़ना सरल है। पुजारी बनकर पूजा करना सरल है लेकिन दुष्ट मन को सदा के लिए प्रभु के चरणों में ही रखना कठिन है। जब तक परमात्मा का रस पूरा नहीं मिल जाता तब तक मन कब धोखा दे दे कुछ पता नहीं।
बिल्वमंगल मंदिर में रहता है, देवमूर्तियों की पूजा करता है, मंदिर को संभालने का कर्त्तव्य ठीक से उठा रहा है। साथ ही साथ अपना भक्तिभाव भी बढ़ा रहा है। लोगों में उसका अच्छा नाम हो रहा है।
एक दिन एक नववधू हार-सिंगार करके मंदिर में दर्शन करने आयी। नयी नयी शादी हुई थी। उसने भगवान के दर्शन किये, फूल चढ़ाये, दीपक जलाया, प्रसाद रखा। बिल्वमंगल की नजर उस सुंदर अंगना पर पड़ी। संयोगवश उसकी मुखाकृति चिन्तामणि जैसी थी। उसे देखते ही बिल्वमंगल की सुषुप्त कामवासना जाग उठी। वह भिन्न भिन्न निमित्त बनाकर उस युवती के नजदीक रहने की चेष्टा करने लगाः
"लो, ये फूल अच्छे हैं, प्रभु को चढ़ाओ..... यह प्रभु का चरणामृत है, ग्रहण करो....यह लो भगवान का प्रसाद...." बिल्वमंगल की दृष्टि मानो उस युवती का सौन्दर्य पी रही थी। उसकी आँखों से आँखें मिलाकर मोहित हो रो रहा था। वह युवती समझ गई कि यह पुजारी मुँआ बदमाश है। वह जल्दी से घूँघट खींचकर भागती हुई घर जाने लगी।
काम-विकार ने बिल्वमंगल को अन्धा बना दिया। उसकी पुरानी आदत ने उसे अपने शिकंजे में झपेट लिया। प्रभुमय पवित्र जीवन बिताने का संकल्प हवा हो गया। सारासार का विवेक उसका धुँधला हो गया। वह अपने को वश में नहीं रख पाया। मंदिर छोड़कर वह भी उस युवती के पीछे-पीछे जाने लगा। वह युवती अपने घर पहुँच गई, दरवाजा बन्द कर दिया और पति से कहा कि वह पुजारी मुँआ बदमाश है।
बिल्वमंगल उसके घर पहुँचा। द्वार खटखटाया, नवविवाहित युवक ने द्वार खोले। वह समझदार इन्सान था। पुजारी से बोलाः
"आइये पुजारी जी ! कैसे आना हुआ ?"
बिल्वमंगल ने विनती कीः "आपकी नववधू मंदिर में प्रभु के दर्शन करने आयी थी। मैंने उसके दीदार किये। मेरा चित्त मेरे वश में नहीं हो रहा है। आप कृपा करो। एक बार फिर मुझे उसके दर्शन करा दो। मंदिर मैं जैसा हार-सिंगार करके आयी थी वैसे की वैसी ही फिर से एक बार मेरे सामने खड़ी कर दो, सिर्फ एक ही बार.... केवल एक ही बार मुझे उसके दर्शन कर लेने दो। मुझसे रहा नही जाता। कृपा करो। मेरी इतनी सी प्रार्थना स्वीकार करो। आपका उपकार कभी नहीं भूलूँगा।"
वह युवक समझदार आदमी था। इस कामातुर जीव की दुर्दशा शायद वह समझ रहा है। वह भीतर गया। अपनी पत्नी को समझायाः
"तू वैसा ही सिंगार करके उसके सामने एक बार जा। उसे देख लेने दे तेरा मुखचन्द्र। मैं दूसरे कमरे में बैठता हूँ। वह कुछ अनुचित चेष्टा करने की कोशिश करे तो मुझे आवाज देना। मैं उस पुजारी के बच्चे की धुलाई कर दूँगा।"
पत्नी पति की बात से सहमत हुई। सजधजकर पुजारी के सामने आयी। अपने घूँघट हटाया और बिल्वमंगल के सामने देखने लगी। बिल्वमंगल उस सुहागिनी नववधू को देखते हुए अपने आपसे, अपनी आँखों से कहने लगाः
"हे अन्धी आँखें ! अब देख लो, इस हाड़-मांस के शरीर को जीभर के देख लो। बार-बार वहाँ जाती थी। क्या रखा उस पिंजर में देख लो....।"
फिर बिल्वमंगल ने उस नववधू से कहाः
"बहन ! दो सूए लाओ न....।"
नववधू को कुछ कल्पना नहीं थी। वह तो दो बड़े बड़े सुए लायी। बिल्वमंगल ने दोनों सुओं को दोनों हाथों में पकड़ा। फिर अपनी आँखों से कहने लगाः
"हे मेरी धोखेबाज आँखें ! जहाँ हरि को देखना है, जहाँ प्रभु के दर्शन करने हैं वहाँ संसार को देखती हो ? संसारी हाड़-मांस में सौन्दर्य को निहारती हो ? हे मेरी अन्धी आँखें ! इससे तो तुम न हो तो अच्छा है।"
ऐसा कहते हुए बिल्वमंगल ने दोनों हाथों से अपनी दोनों आँखों में सुए घुसेड़ दिये। दोनों आँखें फूट गईं। रक्त की दो धाराएँ बह चलीं। यह देखकर नववधू एकदम घबड़ा गई। चीख निकल गई उसके मुँह से। पासवाले कमरे में ही बैठा हुआ पति वहाँ आ गया। कल्पनातीत दृश्य देखकर वह हक्का-बक्का सा हो गया। पत्नी से पूछाः
"यह क्या हो गया ?"
पत्नी ने बतायाः "मुझे क्या पता ये ऐसा करेंगे ? उन्होंने मुझसे दो सूए माँगे और मैंने ला दिय। मुझे जरा सा भी ख्याल आता तो मैं क्यों देती ?"
पति ने पत्नी को उलाहना दिया। बिल्वमंगल की आँखों का खून साफ किया, औषधि लगाई और आँखों पर पट्टी बाँध दी। हाथ में लाठी पकड़ा दी।
लाठी टेकते-टेकते बिल्वमंगल जाने लगा। रास्ते में ठोकरें खाते-खाते आगे बढ़ने लगा।
ईश्वर के मार्ग पर चलते-चलते कितनी भी ठोकरें खानी पड़े लेकिन वे सार्थक हैं।
बिल्वमंगल गाँव से बाहर निकल गया। जंगल के रास्ते से जाते वक्त कुएँ जैसे खड्डे में गिर पड़ा। आसपास में कोई मनुष्य नहीं था। बिल्वमंगल प्रभु से प्रार्थना करने लगाः
"हे नाथ ! मुझ अनाथ का अब तेरे सिवा कोई नहीं है। मुझ अन्धे की आँख भी तू है और लाठी भी तू है। जगत में एक ही अन्धा नहीं है, हजारों-हजारों अन्धे हैं, आँखें होते हुए भी अन्धे हैं लेकिन उन्हें पता नहीं है कि हम अन्धे हैं। हे प्रभु ! तूने मुझे जगाया है, मुझे पता चल गया है कि मैं अन्धा हूँ। हे प्रभु ! मैं पहले भी अन्धा था और अब भी अन्धा हूँ। पहले मुझे बाहर की आँखों पर भरोसा था लेकिन अब केवल तेरा भरोसा है। तू मुझे इस कूप से एवं संसाररूपी कूप से नहीं निकालेगा तो और कौन निकालेगा ? तू मेरा हाथ नहीं पकड़ेगा तो हे स्वामी ! और कौन मेरा हाथ पकड़ेगा ? हे मेरे हरि ! तू कृपा कर।"
बिल्वमंगल प्रभु से करूण प्रार्थना कर रहा है। प्रभु को लगा होगा कि यह जीव मेरी शरण में आया है। चाहे करोड़ों पाप किये हों, अरबों पाप किये हों, अरबों पाप किये हों लेकिन जीव जब कहे कि मैं तेरी शरण हूँ तो मुझे उसका हाथ पकड़ना ही पड़ेगा।
भगवान कुएँ के पास प्रकट हुए। बिल्वमंगल को बाहर निकाला। लाठी का आगे का छोर पकड़कर भगवान आगे-आगे चल रहे हैं। दूसरा छोर पकड़कर पीछे-पीछे बिल्वमंगल चल रहा है। चलते-चलते भगवान ने कहाः
"हे सूरदास !"
बिल्वमंगल के हृदय में एहसास हुआ कि यह कोई ग्वाला नहीं है, यह कोई बालक नहीं है लेकिन सबके रूप में जो खेल खेल रहा है वह कन्हैया है।
सूरदास ने अपनी पकड़ी हुई लाठी पर धीरे-धीरे हाथ आगे बढ़ाया। प्रभु समझ गये कि सूरदास की नीयत बिगड़ी है.... वह मुझे पकड़ना चाहता । भक्त मुझे समर्पण से पकड़ना चाहे तो मैं पकड़ा जाने के लिए तैयार हूँ लेकिन चालाकी से पकड़ना चाहे तो मैं कभी पकड़ में नहीं आता।
सूरदास धीरे-धीरे अपना हाथ लाठी के दूसरे छोर तक ले जाते हैं लेकिन भगवान युक्ति से लाठी का दूसरा हिस्सा पकड़कर पहलेवाला छोड़ देते हैं। कैसे भी करके सूरदास को अपना स्पर्श नहीं होने देते। उनको रास्ता बताते हुए आगे-आगे चलते हैं।
सूरदास ने सोचा कि श्यामसुन्दर बड़े होशियार हैं। उन्हें बातों में लगाते हुए सूरदास ने कहाः
"आपका नाम क्या है ?"
"सब नाम मेरे ही हैं।"
"आप कहाँ रहते हैं ?"
"मैं सब जगह रहता हूँ और जो मुझे बुलाता है वहाँ जाता हूँ।"
"आपके बाप कौन हैं ?"
"जो चाहे मेरा बाप बन जाए, कोई हर्ज नहीं है।"
"आपकी माँ कौन हैं ?"
"जिसको मेरी माँ बनना हो, बन जाय, मैं उसका बेटा बनने को तैयार हूँ।"
सूरदास समझ गये कि परमात्मा के सिवाय ऐसा कोई कह नहीं सकता, ऐसा कोई बन नहीं सकता। उन्हें पक्का विश्वास हो गया कि साक्षात परात्पर परब्रह्म, अच्युत, अविनाशी, निर्गुण निराकार परमात्मा सगुण होकर मेरे जैसे सूरदास को मार्ग दिखाने आये है। अब मैं उनका स्पर्श कर लूँ..... उनका हाथ पकड़ लूँ..... उनके चरणों में अपना सिर रगड़ लूँ... अपना भाग्य बदल लूँ।
अभी सूरदास भूल रहे थे। भगवान को पकड़ लेने की नीयत थी। भगवान में मिट जाने की नीयत नहीं बनी, भगवान के द्वारा पकड़ जाने की नीयत नहीं बनी।
सूरदास आगे पूछने लगेः
"आपका गाँव कौन सा है ?"
"सब गाँव मेरे ही हैं और एक भी गाँव मेरा नहीं है। सब नाम मेरे हैं और एक भी नाम मेरा नहीं है। सच्चे हृदय स कोई किसी भी नाम से पुकारता है तो मैं वहाँ जाता हूँ।"
"आपको मक्खन-मिश्री भाते है या रबड़ी-शिखण्ड भाते हैं ?"
"कोई पदार्थ मुझे नहीं भाते क्योंकि कोई गरीब आदमी मुझे पदार्थ न भी दे सके। मक्खन-मिश्री, दूधपाक-पूरी, रबड़ी-शिखण्ड तो केवल अमीर लोग ही दे सकते हैं। गरीब में भी जो गरीब हो, अत्यंत गरीब हो वह भी मुझे खिला सके ऐसी चीज मुझे भाती है। मैं तो प्रेम का भूखा हूँ। कोई मुझे भाजी खिला दे तो भी खा लेता हूँ, केले के छिलके खिला दे तो भी खा लेता हूँ। बाजरे की बाटी खिला दे तो भी खा लेता हूँ और कोई पत्रं पुष्पं चढ़ा दे, तुलसीदल चढ़ा दे तो भी सन्तुष्ट हो जाता हूँ।"
पत्रं
पुष्पं फलं
तोयं यो मे
भक्त्या
प्रयच्छति।
तदहं
भक्त्युपहृतं
अश्नामि
प्रयतात्मनः।।
"जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि, निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।"
(भगवद् गीताः 9.26)
राहबर ने सूरदास को कहाः
"सूरदास ! मैं तुझे क्या बताऊँ ? कोई सच्चे हृदय से मुझे कह दे कि "मैं तेरा हूँ" तो वह मुझे सबसे अधिक भाता है। रूपयों-पैसों के द्वारा मिलने वाले पदार्थ मुझे उतने नहीं भाते। जितना किसी का प्रेमपूर्वक दिया हुआ अपना अहं भाता है। जो मेरा हो जाता है उसका सब कुछ मुझे भाता है।"
सूरदास को यकीन हो गया कि मानो न मानो, ये भगवान के सिवाय और कोई नहीं हैं। 'हे मेरे स्वामी ! हे मेरे प्रभु !..... पुकारते हुए ठाकुरजी का हाथ पकड़ने गये तो भगवान सूरदास की लकड़ी छोड़कर दूर चले गये। तब सूरदास कहते हैं-
"मुझे दुर्बल जानकर अपना हाथ छुड़ाकर भागते है लेकिन मेरे हृदय में से निकल जाओ तो मैं जानूँ कि आप भाग सकते हैं। हे प्रभु ! अपने हृदय से मैं आपको नहीं जाने दूँगा.... नहीं जाने दूँगा।"
भगवान कहते हैं- "अपने हृदय से मत जाने दो लेकिन मुझे अभी बहुत काम है। संसार की भीड़ में से तेरे जैसे कई अन्धों को मुझे बाहर निकालना है इसलिए अब मैं जाता हूँ। तू इतना अन्धा नहीं है लेकिन लोग तो आँखें होते हुए भी अन्धे हैं। जिन पदार्थों को छोड़कर जाना है पदार्थों से चिपक रहे हैं। जिस शरीर को जला देना है उस शरीर को सुखी करने के लिए मजदूरी करते हैं। ऐसे एक-दो लोग अन्धे नहीं है, लाखों-लाखों करोड़ों-करोड़ों लोग अन्धे हैं। अब मुझे संतों के हृदय में जाने दो, संतों के हृदय द्वारा लोगों को उपदेश देने दो कि यह अन्धापन छोड़कर हरि की शरण जाओ, ध्यान की शरण जाओ, विकारों का अन्धापन छोड़कर प्रेमाभक्ति की शरण जाओ, अहंकार का अन्धापन छोड़कर ज्ञान की शरण जाओ। कइयों को यह सन्देश देना है। संतों के हृदय में बैठकर बहुत काम करना है। अतः हे सूरदास ! मैं जाता हूँ। आज के बाद लोग तुम्हें बिल्वमंगल के बदले 'सूरदास' के नाम से पुकारेंगे, तुम्हारे पद जो लोग गायेंगे उनका हृदय पवित्र होगा। तुम्हारी कथा जो सुनेगा उसका हृदय भी पिघलेगा, निष्पाप होगा। उसे भक्ति-मुक्ति की प्राप्ति होगी। जाओ, मेरे आशीर्वाद हैं।