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गुरू भक्ति योग

(Guru Bhakti Yog)

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

सम्पादक

श्री स्वामी सच्चिदानंद

 

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आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।

ताः सर्वाः सफला देवि गुरूसंतोषमात्रतः।।

'हे देवी ! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ... ये सब गुरूदेव के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं।'

(भगवान शंकर)

 

अमानमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः।

असत्वरोऽर्थ जिज्ञासुः अनसूयुः अमोघवाक्।।

'सत्शिष्य मान और मत्सर से रहित, अपने कार्य में दक्ष, ममता रहित, गुरू में दृढ़ प्रीतिवाला, निश्चलचित्त, परमार्थ का जिज्ञासु, ईर्ष्या से रहित और सत्यवादी होता है।'

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अनुक्रम

निवेदन.. 6

आमुख.. 7

गुरूभक्तियोग की महत्ता... 10

प.पू. संत श्री आसारामजी बापूः एक अदभुत विभूति... 12

प्रकरण 1 - गुरूभक्तियोग.. 15

गुरूभक्तियोग के अंश.. 15

गुरूभक्तियोग का हेतु.. 15

गुरूभक्तियोग के सिद्धान्त.... 16

गुरूभक्तियोग एक विज्ञान के रूप में.. 16

गुरूभक्तियोग का फल.. 16

गुरूभक्तियोग की साधना... 17

गुरूभक्तियोग का महत्त्व... 17

इस मार्ग के भयस्थान.. 18

गुरूभक्तियोग के मूल सिद्धान्त.... 18

गुरूभक्तियोग के मुख्य सिद्धान्त.... 19

शाश्वत सुख का मार्ग.. 19

गुरूभक्तियोग की महत्ता... 19

शिष्य को सूचनाएँ.. 20

प्रकरण-2- गुरू और शिष्य.... 22

गुरू की महत्ता... 22

गुरू के प्रति भक्तिभावना... 22

गुरू की सेवा... 22

शिष्यवृत्ति के सिद्धान्त.... 23

गुरू का ध्यान.. 24

सुख की विजय.. 25

गुरूकृपा की आवश्यकता... 25

शान्ति और शक्ति का मार्ग.. 26

ध्यान के लिए प्राथमिक तैयारियाँ... 26

प्रकरणः 3 - गुरूभक्ति का विकास.. 28

पवित्रता ही पूर्वतैयारी.. 28

योग की साधना... 28

गुरू का स्पर्श.. 28

मन को संयम में रखने की रीति... 29

आध्यात्मिक मार्ग में प्रगति... 30

परिवर्तन.. 31

गुरू के प्रति आध्यात्मिक अभिगम.. 32

दुराग्रही शिष्य.... 33

गुरू की आवश्यकता... 33

शिष्य के कर्त्तव्य.... 34

गुरूभक्ति और गुरूसेवा... 34

आज्ञापालन का मूल्य.... 35

गुरू को अर्घ्य.... 35

प्रकरणः 4 - गुरूभक्ति की शिक्षा... 37

भक्ति के नियम.. 37

गुरूसेवा का योग.. 37

गुरू की कृपा... 39

गुरू का ध्यान करना चाहिए.. 39

गुरूः एक महान पथप्रदर्शक.. 40

महापुरूषों का मार्ग.. 41

गुरू से हमारा सम्बन्ध.... 41

गुरूकृपा की अनिवार्यता... 42

गुरू कृपा से प्राप्त होने वाली प्रसन्नता... 42

पूर्व अभ्यास की आवश्यकता... 43

प्रकरणः 5 - गुरू की महत्ता... 45

गुरू ही एक मात्र आश्रय.. 45

साधना का रहस्य.... 46

गुरूभक्ति के लिये योग्यता... 46

गुरू के प्रकाश का अनुसरण करो.. 47

शिष्यत्व की कुंजी है ब्रह्मचर्य और गुरूसेवा।. 48

गुरू द्वारा ब्रह्म का ज्ञान.. 48

गुरू ही ईश्वर. 49

प्रकरणः 6 - गुरूभक्ति का अभ्यास.. 51

अनुकूल होने का सिद्धान्त.... 51

शिष्यत्व के मूल तत्त्व... 51

गुरू को आत्मसमर्पण.. 52

विवेक के घटक.. 52

सम्पूर्ण शरणागति... 53

गुरू की प्रतिष्ठा... 53

विद्वता से नम्रता बढ़कर है. 54

श्रद्धा का अर्थ.. 54

आज्ञापालन का प्रकार. 54

आध्यात्मिक नीति-रीति... 55

मिलन की शक्ति.... 55

गुरू की सेवा... 56

प्रकरणः 7 - साधक के सच्चे पथप्रदर्शक.. 57

शिष्यत्व के मूल सिद्धान्त.... 57

गुरू सम्बन्धी धर्म.. 58

प्रकृति के तीन गुण.. 58

कामवासना का बिल्कुल त्याग.. 58

गुरू माने साक्षात् देवता... 59

गुरू कृपा से ईश्वर-साक्षात्कार. 60

शास्त्रों में गुरू की प्रशंसा... 60

गुरू का महान प्रेम.. 62

गुरू के साथ तादात्म्य...... 62

शिष्य को मार्गदर्शन.. 63

आत्म-साक्षात्कार का रहस्य.... 64

प्रकरणः 8 - गुरूभक्ति का विवरण.. 65

आध्यात्मिक शिक्षा का अर्थ.. 65

गुरू शिष्य का सम्बन्ध.... 65

उच्चतर ज्ञान का मूल.. 66

आचरण के सिद्धान्त.... 66

योग्य गुरू की खोज.. 67

गुरू के पदचिह्नों पर. 68

गुरू के चरणों में.. 69

गुरू की पूजा... 69

रहस्य-विद्या का दान.. 70

आत्मविजय का शस्त्र... 71

प्रकरणः 9 - गुरूभक्ति की नींव.. 72

श्रद्धा का महत्त्व... 72

भक्ति के स्वरूप.. 72

कृपा का कार्य.. 73

आध्यात्मिक मार्ग और जीवन.. 74

शिष्य की भावना... 75

ईश्वर-साक्षात्कार का सबसे सरल मार्ग.. 76

विश्वप्रेम का विकास.. 76

गुरू के साथ तादात्म्य...... 77

सब वरदान देने वाले.. 77

आध्यात्मिक प्रवृत्ति की आवश्यकता... 78

गुरू का उन्नतिकारक सान्निध्य.... 80

जगहितकारी गुरू.. 80

नैतिक पूर्णता की आवश्यकता... 81

प्रकरणः 10 -गुरूभक्ति का संविधान.. 83

योग्य व्यवहार के नियम.. 83

जीवन के जंजाल से परे. 83

शिष्यों के प्रकार. 84

गुरू के आश्रय में... 85

गुरूभक्ति के लाभ.. 87

सच्चे सुख का मूल.. 88

भक्ति का अर्थ.. 88

गुरू और दीक्षा... 91

मंत्रदीक्षा के लिए नियम.. 92

जप के नियम.. 94

मनुष्य के चार विभाग.. 96

'गुरूकृपा हि केवलं......' 97

 

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निवेदन

गुरू की आवश्यकता, गुरू के प्रति शिष्य की भक्ति कैसी होनी चाहिए एवं गुरू के मार्गदर्शन के द्वारा साधक शिष्य किस प्रकार आत्म-साक्षात्कार कर सकता है, इस विषय में पूज्य श्री स्वामी शिवानन्दजी महाराज ने अपनी कई पुस्तकों में लिखा है। श्री गुरूदेव के अग्रगण्य शिष्य एवं उनके निजी रहस्यमंत्री श्री स्वामी सच्चिदानंदजी ने सोचा कि स्वामी जी महाराज की पुस्तकों में से गुरू एवं गुरूभक्ति के विषय में जो जो लिखा गया है वह सब संकलित करके अलग पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना अत्यंत आवश्यक है। अतः उन्होंने यह 'गुरूभक्तियोग' पुस्तक का सम्पादन किया।

आध्यात्मिक मार्ग में विचरने वाले साधकों के लिए यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है, इतना ही नहीं, एक आशीर्वाद के समान है।

सदगुरूदेव के कृपा-प्रसादरूप यह पुस्तक आपको अमरत्व, परम सुख और शान्ति प्रदान करे यही अभ्यर्थना......

अनुक्रम

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आमुख

स्वामी शिवानन्द

कर्म और कर्त्ता, पदार्थ और व्यक्ति के सम्बन्ध से ज्ञान होता है। वह एक प्रक्रिया है, चेतना नहीं है। बाह्य पदार्थ और आन्तरिक स्थिति की प्रतिक्रिया के द्वारा ही सब प्रक्रिया प्रकट होती है। मनुष्य में ज्ञान का उदभव यह ऐसी ही प्रतिक्रिया के द्वारा घटित एक रहस्यमय प्रक्रिया है। मूलतः ज्ञान सार्वत्रिक है और उसके लिए कोई प्रक्रिया आवश्यक नहीं है। परन्तु ज्ञान का उदय माने भावातीत चेतना नहीं अपितु सम्बन्धित व्यक्ति में ज्ञान का उदय है। सर्वोच्च ज्ञान को स्वरूपज्ञान-. अपने सत्य अस्तित्व के बोध विषयक ज्ञान कहा जाता है। जीव में इस स्वरूपज्ञान का उदय मन की वृत्तियों के द्वारा अभिव्यक्ति की सापेक्ष प्रक्रिया से होता है। इस प्रकार उदय की प्रक्रिया के दौरान ज्ञान वृत्तिज्ञान के रूप में होता और वृत्तिज्ञान निश्चित रूप से चेतना की देश एवं काल से बद्ध अवस्था है।

मानसशास्त्र जिसे ज्ञान कहता है वह वृत्तिज्ञान है। उसकी प्रबलता, व्यापकता और गहनता अलग-अलग हो सकती है। वृत्तिज्ञान बाह्य कर्म और कर्त्ता, पदार्थ और व्यक्ति के सम्बन्ध के सिवाय उत्पन्न नहीं हो सकता। इस विश्व में कोई भी घटना दो घटना या स्थितियों के संयोग से ही घटित हो सकती है और तभी वृत्तिज्ञान उत्पन्न हो सकता है। आध्यात्मिक ज्ञान के क्रमशः आविष्कार के लिए आध्यात्मिक मार्ग का साधक कर्त्ता या व्यक्ति के रूप में माना जा सकता है। अब दूसरी वस्तु या व्यक्ति कर्म के रूप में आवश्यक है।

जब ऐच्छिक अनुशासन और एकाग्रता के द्वारा अपने मन की निर्मलता बढ़ती है तब भावातीत चेतना के प्रतिबिम्ब के रूप में ज्ञान का आविष्कार होता है। ज्ञान के आविष्कार की मात्रा का फर्क मन की निर्मलता के फर्क के कारण होता है। किसी भी प्रकार के ज्ञान के उदभव के लिए बाह्य साधन, कर्म या क्रिया आवश्यक है। अतः साधक में ज्ञान का आविर्भाव करने के लिए गुरू की आवश्यकता होती है। परस्पर प्रभावित करने की सार्वत्रिक प्रक्रिया के लिए एक दूसरे के पूरक दो भाग के रूप में गुरू-शिष्य हैं। शिष्य में ज्ञान का उदय शिष्य की पात्रता और गुरू की चेतनाशक्ति पर अवलम्बित है। शिष्य की मानसिक स्थिति अगर गुरू की चेतना के आगमन के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में तैयार नहीं होती तो ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं हो सकता। इस ब्रह्माण्ड मे कोई भी घटना घटित होने के लिए यह पूर्वशर्त है। जब तक सार्वत्रिक प्रक्रिया के एक दूसरे के पूरक ऐसे दो भाग या दो अवस्थाएँ इकट्ठी नहीं होती तब तक कहीं भी, कोई भी घटना घटित नहीं हो सकती।

'आत्म-निरीक्षण के द्वारा ज्ञान का उदय स्वतः हो सकता है और इसलिए बाह्य गुरू की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है.....' यह मत सर्वस्वीकृत नहीं बन सकता। इतिहास बताता है कि ज्ञान की हर एक शाखा में शिक्षण की प्रक्रिया के लिए शिक्षक की सघन प्रवृत्ति अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी भी व्यक्ति में, किसी भी सहायता के सिवाय, सहज रीति से ज्ञान का उदय संभव होता तो स्कूल, कॉलेज एवं यूनिवर्सिटिंयों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। जो लोग 'शिक्षक की सहायता के बिना ही, स्वतंत्र रीति से कोई व्यक्ति कुशल बन सकता है......' ऐसे गलत मार्ग पर ले जाने वाले मत का प्रचार प्रसार करते हैं वे लोग स्वयं तो किसी शिक्षक के द्वारा ही शिक्षित होते हैं। हाँ, ज्ञान के उदय के लिए शिष्य या विद्यार्थी के प्रयास का महत्त्व कम नहीं है। शिक्षक के उपदेश जितना ही उसका भी महत्त्व है।

इस ब्रह्माण्ड में कर्त्ता एवं कर्म सत्य के एक ही स्तर पर स्थित हैं, क्योंकि इसके सिवाय उनके बीच पारस्परिक आदान-प्रदान संभव नहीं हो सकता। अलग स्तर पर स्थित चेतना शक्ति के बीच प्रतिक्रिया नहीं हो सकती। हालांकि शिष्य जिस स्तर पर होता है उस स्तर को माध्यम बनाकर गुरू अपनी उच्च चेतना को शिष्य पर केन्द्रित कर सकते हैं। इससे शिष्य के मन का योग्य रूपांतर हो सकता है। गुरू की चेतना के इस कार्य को शक्ति संचार कहा जाता है। इस प्रक्रिया में गुरू की शक्ति शिष्य में प्रविष्ट होती है। ऐसे उदाहरण भी मिल जाते हैं कि शिष्य के बदले में गुरू ने स्वयं ही साधना की हो और उच्च चेतना की प्रत्यक्ष सहायता के द्वारा शिष्य के मन की शुद्धि करके उसका ऊर्ध्वीकरण किया हो।

दोषदृष्टिवाले लोग कहते हैं.... "अन्तरात्मा की सलाह लेकर सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा हम पहचान सकते है अतः बाह्य गुरू की आवश्यकता नहीं है।"

किन्तु यह बात ध्यान में रहे कि जब तक साधक शुचि और इच्छा-वासनारहितता के शिखर पर नहीं पहुँच जाता तब तक योग्य निर्णय करने में अन्तरात्मा उसे सहायरूप नहीं बन सकती।

पाशवी अन्तरात्मा किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं दे सकती। मनुष्य के विवेक और बौद्धिक मत पर उसके अव्यक्त और अज्ञात मन का गहरा प्रभाव पड़ता है। प्रायः सभी मनुष्यों की बुद्धि सुषुप्त इच्छाओं तथा वासनाओं का एक साधन बन जाती है। मनुष्य की अन्तरात्मा उसके अभिगम, झुकाव, रूचि, शिक्षा, आदत, वृत्तियाँ और अपने समाज के अनुरूप बात ही कहती है। अफ्रीका के जंगली आदिवासी, सुशिक्षित युरोपियन और सदाचार की नींव पर सुविकसित बने हुए योगी की अन्तरात्मा की आवाजें भिन्न-भिन्न होती हैं। बचपन से अलग-अलग ढंग से बड़े हुए दस अलग-अलग व्यक्तियों की दस अलग-अलग अन्तरात्मा होती हैं। विरोचन ने स्वयं ही मनन किया, अपनी अन्तरात्मा का मार्गदर्शन लिया एवं मैं कौन हूँ ? इस समस्या का आत्मनिरीक्षण किया और निश्चय किया कि यह देह ही मूलभूत तत्त्व है।

याद रखना चाहिए कि मनुष्य की अन्तरात्मा पाशवी वृत्तियों, भावनाओं तथा प्राकृत वासनाओं की जाल में फँसी हुई हैं। मनुष्य के मन की वृत्ति विषय और अहं की ओर ही जायगी, आध्यात्मिक मार्ग में नहीं मुड़ेगी। आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च भूमिका में स्थित गुरू में शिष्य अगर अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण समर्पण कर दे तो साधना-मार्ग के ऐसे भयस्थानों से बच सकता है। ऐसा साधक संसार से परे दिव्य प्रकाश को प्राप्त कर सकता है। मनुष्य की बुद्धि एवं अन्तरात्मा को जिस प्रकार निर्मित किया जाता है, अभ्यस्त किया जाता है उसी प्रकार वे कार्य करते हैं। सामान्यतः वे दृश्यमान मायाजगत तथा विषय वस्तु की आकांक्षा एवं अहं की आकांक्षा पूर्ण करने के लिए कार्यरत रहते हैं। सजग प्रयत्न के बिना आध्यात्मिक ज्ञान के उच्च सत्य को प्राप्त करने के लिए कार्यरत नहीं होते।

'गुरू की आवश्यकता नहीं है और हरएक को अपनी विवेक-बुद्धि तथा अन्तरात्मा का अनुसरण करना चाहिए.....' ऐसे मत का प्रचार प्रसार करने वाले भूल जाते हैं कि ऐसे मत का प्रचार करके वे स्वयं गुरू की तरह प्रस्तुत हो रहे हैं। 'किसी भी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है' ऐसा सिखाने वालों को उनके शिष्य मानपान और भक्तिभाव अर्पित करते हैं। भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को बोध दिया कि 'तुम स्वयं ही तार्किक विश्लेषण करके मेरे सिद्धान्त की योग्यता-अयोग्यता और सत्यता की जाँच करो। बुद्ध कहते हैं इसलिए सिद्धान्त को सत्य मानकर स्वीकार कर लो ऐसा नहीं।' किसी भी भगवान की पूजा करना, ऐसा उन्होंने सिखाया लेकिन इसका परिणाम यह आया कि महान गुरू एवं भगवान के रूप में उनकी पूजा शुरू हो गई। इस प्रकार स्वयं ही चिन्तन करना चाहिए और गुरू की आवश्यकता नहीं है' इस मत की शिक्षा से स्वाभाविक ही सीखनेवाले के लिए गुरू की आवश्यकता का इन्कार नहीं हो सकता। मनुष्य के अनुभव कर्त्ता कर्म के परस्पर सम्बन्ध की प्रक्रिया पर आधारित है।

पश्चिम में कुछ लोग मानते हैं कि गुरू पर शिष्य का अवलंबन एक मानसिक बन्धन है। मानस-चिकित्सा के मुताबिक ऐसे बन्धन से मुक्त होना जरूरी है। यहाँ स्पष्टता करना अत्यन्त आवश्यक है कि मानस-चिकित्सा वाले मानसिक परावलम्बन से गुरू-शिष्य का सम्बन्ध बिल्कुल भिन्न है। गुरू की उच्च चेतना के आश्रय में शिष्य अपना व्यक्तित्व समर्पित करता है। गुरू की उच्च चेतना शिष्य की चेतना को आवृत्त कर लेती है और उसका ऊर्ध्वीकरण करती है । तदुपरांत, गुरू-शिष्य के व्यक्तिगत सम्बंध एवं शिष्य का गुरू पर अवलम्बन केवल प्रारंभ में ही होता है। बाद में तो वह परब्रह्म की शरणागति बन जाती है। गुरू सनातन शक्ति के प्रतीक बनते हैं। किसी दर्दी के मानस-चिकित्सक के प्रति परावलम्बन का सम्बन्ध तोड़ना अनिवार्य है, क्योंकि यह सम्बन्ध दर्दी का मानसिक तनाव कम करने के लिए अस्थायी सम्बन्ध है। जब चिकित्सा पूरी हो जाती है तब यह परावलम्बन तोड़ दिया जाता है और दर्दी पूर्व की भाँति अलग और स्वतंत्र हो जाता है। किन्तु गुरू-शिष्य के सम्बन्ध में, प्रारंभ में या अन्त में, कभी भी अनिच्छनीय परावलम्बन नहीं होता। यह तो केवल पराशक्ति पर ही अवलम्बन होता है। गुरू को देह स्वरूप में यह एक व्यक्ति के स्वरूप में नहीं माना जाता है। गुरू पर अवलम्बन शिष्य के पक्ष में देखा जाय तो आत्मशुद्धि की निरंतर प्रक्रिया है जिसके द्वारा शिष्य ईश्वरीय परम तत्त्व का अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।

कुछ लोग उदाहरण देते हैं कि प्राचीन समय में भी याज्ञवल्क्य ने अपने गुरू वैशंपायन से अलग होकर, किसी भी अन्य गुरू की सहाय के बिना ही, स्वतंत्र रीति से आध्यात्मिक विकास किया था। परन्तु याज्ञवाल्क्य गुरू से अलग हो गये इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गुरू के वफादार नहीं थे। गुरू ने क्रोधित होकर कहा था कि उन्होंने दी हुई विद्या लौटाकर आश्रम छोड़कर चले जाओ। फलतः याज्ञवल्क्य मुनि में मानव-गुरू के प्रति अश्रद्धा का प्रादुर्भाव हुआ लेकिन उन्होंने गुरू की खोज करना छोड़ नहीं दिया। उन्होंने गुरू की आवश्यकता का अस्वीकार नहीं किया है और आध्यात्मिक मार्ग में स्वतंत्र रीति से आगे बढ़ा जा सकता है ऐसा भी नहीं माना है। उन्होंने उच्चतर गुरू सूर्यनारायण का आश्रय लिया। जब उन्होंने फिर से ज्ञान प्राप्त किया तब सूर्य की कृपा प्राप्त करने के लिए याज्ञवल्क्य मुनि के दृढ़ संकल्प बल एवं हिम्मत पर प्रसन्न होकर पुराने गुरू ने अपने अन्य शिष्यों को ज्ञान प्रदान करने के लिए प्रार्थना की तब याज्ञवल्क्य मुनि ने अन्य शिष्यों को भी ज्ञान प्रदान किया ।

प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के द्वारा अभिव्यक्त ईश्वर ही सर्वोच्च गुरू है। हमारे इर्दगिर्द जो विश्व है वह हमारे जीवन में बोध देने वाला शिक्षक है। हम अगर प्रकृति की लीला के प्रति सजग रहें तो हमारे समक्ष होने वाली हरएक घटना में गहन रहस्य एवं बोधपाठ मिल जाता है। यह विश्व ईश्वर का साकार स्वरूप है। उसकी लीला गूढ़ और रहस्यमय है। वह लीला आन्तर एवं बाह्य, व्यक्तिलक्षी एवं वस्तुलक्षी, हर प्रकार के जीवन के अनुभवों को समाविष्ट कर लेती है। उसको जानने से, समझने से हमारे अनुभव, भावना एवं समझ का योग्य विकास होता है। परब्रह्म के प्रति हमारे विकास के लिए परिवर्तन संभव बनता है।

अगर हम प्रकृति की उत्क्रान्ति की प्रक्रिया के साथ व्यक्तिगत विकास को नहीं जोड़ेंगे तो केवल याँत्रिक विकास होगा। उसमें व्यक्ति अनिवार्यतः घसीटा जाता है। उस पर किसी व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता। किन्तु विकास जब परम चेतना के अंश स्वरूप होता है और व्यक्ति की अपनी चेतना में घुलमिल जाता है तब योग की प्रक्रिया घटित होती है। व्यक्ति की चेतना अपने अस्तित्व को आत्मा के साथ पहचानकर, अपने आत्मा में वैश्विक उत्क्रान्ति का अनुभव करे- यह प्रक्रिया योग है। अन्य दृष्टि से देखें तो, ब्रह्माण्ड की लीला का लघु स्वरूप में अपनी आत्मा में अनुभव करना योग  है। जब यह स्थिति प्राप्त होती है तब व्यक्ति ईश्वरेच्छा की सम्पूर्णतः शरण हो जाता है। अथवा पराशक्ति के नियम उसको इतने तादृश बन जाते हैं कि प्रकृति की घटनाओं एवं मनुष्य की इच्छाओं के बीच संघर्षों का पूर्णतः लोप हो जाता है। उस व्यक्ति की अभिलाषाएँ दैवी इच्छा या प्रकृति की घटनाओं से अभिन्न बन जाती हैं।

गुरू की यह सर्वोच्च विभावना है और हर साधक को यह प्राप्त करना है। व्यक्तिगत गुरू का स्वीकार करना यानी साधक की परब्रह्म में विलीन होने की तैयारी और उस दिशा में एक सोपान। गुरू की विभावना के विकास के तथा साधक की गुरू के प्रति शरणागति के विभिन्न सोपान हैं। फिर भी साधना के किसी भी सोपान पर गुरू की आवश्यकता का इन्कार नहीं हो सकता, क्योंकि आत्म-साक्षात्कार के लिए तड़पते हुए साधक को होने वाली परब्रह्म की अनुभूति का नाम गुरू है।

अनुक्रम

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गुरूभक्तियोग की महत्ता

ब्रह्मलीन स्वामी शिवानन्दजी

जिस प्रकार शीघ्र ईश्वरदर्शन के लिए कलियुग-साधना के रूप में कीर्तन-साधना है उसी प्रकार इस संशय, नास्तिकता, अभिमान और अहंकार के युग में योग की एक नई पद्धति यहाँ प्रस्तुत है-.गुरूभक्तियोग। यह योग अदभुत है। इसकी शक्ति असीम है। इसका प्रभाव अमोघ है। इसकी महत्ता अवर्णनीय है। इस युग के लिए उपयोगी इस विशेष योग-पद्धति के द्वारा आप इस हाड़-चाम के पार्थिव देह में रहते हुए ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी जीवन में आप उन्हें अपने साथ विचरण करते हुए निहार सकते हैं।

साधना का बड़ा दुश्मन रजोगुणी अहंकार है। अभिमान को निर्मूल करने के लिए एवं विषमय अहंकार को पिघलाने के लिए गुरूभक्तियोग उत्तम और सबसे अधिक सचोट साधनमार्ग है। जिस प्रकार किसी रोग के विषाणु निर्मूल करने के लिए कोई विशेष प्रकार की जन्तुनाशक दवाई आवश्यक है उसी प्रकार अविद्या और अहंकार के नाश के लिए गुरूभक्तियोग सबसे अधिक प्रभावशाली, अमूल्य और निश्चित प्रकार का उपचार है। वह सबसे अधिक प्रभावशाली 'मायानाशक' और 'अहंकार नाशक' है। गुरूभक्तियोग की भावना में जो सदभागी शिष्य निष्ठापूर्वक सराबोर होते हैं उन पर माया और अहंकार के रोग का कोई असर नहीं होता। इस योग का आश्रय लेने वाला व्यक्ति सचमुच भाग्यशाली है। क्योंकि वह योग के अन्य प्रकारों में भी सर्वोच्च सफलता हासिल करेगा। उसको कर्म, भक्ति, ध्यान और ज्ञानयोग के फल पूर्णतः प्राप्त होंगे।

इस योग में संलग्न होने के लिए तीन गुणों की आवश्यकता हैः निष्ठा, श्रद्धा और आज्ञापालन। पूर्णता के ध्येय में सन्निष्ठ रहो। संशयी और ढीले ढाले मत रहना। अपने स्वीकृत गुरू में सम्पूर्ण श्रद्धा रखो। अपने मन में संशय की छाया को भी फटकने मत देना। एक बार गुरू में सम्पूर्ण श्रद्धा दृढ़ कर लेने के बाद आप समझने लगेंगे कि उनका उपदेश आपकी श्रेष्ठ भलाई के लिए ही होता है। अतः उनके शब्द का अन्तःकरणपूर्वक पालन करो। उनके उपदेश का अक्षरशः अनुसरण करो। आप हृदयपूर्वक इस प्रकार करेंगे तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आप पूर्णता को प्राप्त करेंगे ही। मैं पुनः दृढ़तापूर्वक विश्वास दिलाता हूँ।

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प.पू. संत श्री आसारामजी बापूः एक अदभुत विभूति

ध्यान और योग के अनुभव कैसे प्राप्त किये जाएँ? पूजा पाठ, जप-तप ध्यान करने पर भी जीवन में व्याप्त अतृप्ति का कैसे निवारण करें? ईश्वर में कैसे मन लगायें? अपने अंदर ही निहित आत्मानंद के खजाने को कैसे खोलें? व्यावहारिक जीवन में परेशान करने वाले भय, चिन्ता, निराशा, हताशा, आदि को जीवन से दूर कैसे भगायें? निश्चिंतता, निर्भयता, निरन्तर प्रसन्नता प्राप्त करके जीवन को आनन्द से कैसे महकायें? अपने प्राचीन शास्त्रों में वर्णित आनन्द-स्वरूप ईश्वर के अस्तित्व की झाँकी हम अपने हृदय में कैसे पायें? क्या आज भी यह सब सम्भव है?

हाँ, सम्भव है, अवश्यमेव। मानव को चिंतित बनाने वाले इन प्रश्नों का समाधान साधना के निश्चित परिणामों के द्वारा कराके पिपासु साधकों के जीवन को ईश्वराभिमुख करके उन्हें मधुरता प्रदान करने वाले ऋषि-महर्षि और संत-महापुरूष आज भी समाज में मौजूद है। 'बहुरत्ना वसुन्धरा।' इन संत महापुरूषों की सुगंधित हारमाला में पूज्य संत श्री आसारामजी बापू एक पूर्ण विकसित सुमधुर पुष्प हैं।

अहमदाबाद शहर में, किन्तु शहरी वातावरण से दूर साबरमती नदी की मनमोहक प्राकृतिक गोद में त्वरित गति से विकसित हुए उनके पावन आश्रम के अध्यात्मपोषक वातावरण में आज हजारों साधक जाकर भक्तियोग, नादानुसंधानयोग, ज्ञानयोग एवं कुण्डलिनी योग की शक्तिपात वर्षा का लाभ उठाकर अपने व्यक्तिगत पारमार्थिक जीवन को अधिकाधिक उन्नत एवं आनन्दमय बना रहे हैं। चित्त में समता का प्रसाद पाकर वे व्यावहारिक जीवन-नौका को बड़े ही उत्साह से खे-खेकर निहाल होते जाते हैं।

प्राचीन ऋषि कुलों का स्मरण कराने वाले इस पावन आश्रम में कुण्डलिनी योग की सच्ची अनुभूति कराके आत्मिक प्रेमसागर में डुबकी लगवाने वाले, मानव समुदाय को ईश्वरीय आनन्द में सराबोर करने वाले, तप्त हृदयवाले हजारो संसारयात्रियों के आश्रयदाता, वट-वृक्षतुल्य, प्रेमपूर्ण हृदयवाले, अगमनिगम के औलिया, परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू ने  सहज सान्निध्य एवं सत्संग मात्र लोगो को वेदान्त के अमृत-रस का स्वाद चखा रहे हैं।

संत श्री के नाम को सुनकर, उनकी पुस्तकें पढ़कर अनेक सज्जन उनके दर्शन और मुलाकात के लिए कुतूहलवश एक बार उनके आश्रम में आते है, फिर तो वे नियमित आने वाले साधक बनकर योग और वेदान्त के रसिक बन जाते हैं। वे अपने जीवन-प्रवाह को अमृतमय आनन्द-सिन्धु की तरफ बहते हुए देखकर हृदय में गदगदित हो जाते हैं, आनन्द में सराबोर हो जाते हैं।

एक अजब योगी

आश्रम में जाकर पूज्यश्री के दर्शन और आध्यात्मिक तेज से उद्दीप्त नयनामृत से सिक्त एक सुप्रसिद्ध लेखक, वक्ता, तंत्री सज्जन ने लिखा हैः

"कोई मुझसे पूछे की अहमदाबाद के आसपास कौन सच्चा योगी है ? मैं तुरन्त संत श्री आसारामजी बापू का नाम दूँगा। साबरतट स्थित एक भव्य एवं विशाल आश्रम में विराजमान इन दिव्यात्मा महापुरूष का दर्शन करना, वास्तव में जीवन की एक उपलब्धि है। उनके निकट में पहुँचना, निश्चित ही अहोभाग्य की सीमा पर पहुँचना है।

योगियों की खोज में मैं काफी भटका हूँ, पर्वत और गुफाओं के चक्कर काटने में कभी पीछे मुड़कर देखा तक नहीं। परन्तु प्रभुत्वशाली व्यक्ति के महाधनी ऐसे संत श्री आसारामजी बापू से मिलते ही मेरे अन्तर में प्रतीति सी हो गई कि यहाँ तो शुद्धतम सुवर्ण ही सुवर्ण है।

प्रेम और प्रज्ञा के सागर

संत श्री की आँखों में ऐसा दिव्य तेज जगमगाया करता है कि उनके अन्दर की गहरी अतल दिव्यता में डूब जाने की कामना करने वाला क्षणभर में ही उसमें डूब जाता है। मानो, उन आँखों में प्रेम और प्रकाश का असीम सागर हिलौरें ले रहा है।

वे सरल भी इतने कि छोटे-छोटे बालकों की तरह व्यवहार करने लगें। उनमें ज्ञान भी ऐसा अदभुत कि विकट पहेली को पलभर में सुलझा कर रख दें। उनकी वाणी की बुनकार ऐसी कि सजगता के तट पर सोनेवाले को क्षणभर में जगाकर ज्ञान-सागर की मस्ती में लीन कर दें।

अनेक शक्तियों के स्वामी

अन्यत्र कहीं देखी न गई हो ऐसी योगसिद्धि मैंने अनेक बार उनमें देखी है। अनेक दरिद्रों को उन्होंने सुख और समृद्धि के सागर में सैर करने वाले बना दिये हैं। उनके चुम्बकीय शक्ति-सम्पन्न पावन सान्निध्य में असंख्य साधकों द्वारा स्वानुभूत चमत्कारों और दिव्य अनुभवों का आलेखन करने लगूँ तो एक विराट भागवत कथा तैयार हो जाय। आगत व्यक्ति के मन को जान लेने की शक्ति तो उनमें इतनी तीव्रता से सक्रिय रहती है मानो समस्त नभमण्डल को वे अपने हाथों में लेकर देख रहे हों।

ऐसे परम सिद्ध पुरूष के सान्निध्य में, उनकी प्रेरक पावन अमृतवाणी में से आपकी जीवन-समस्याओं का सांगोपांग हल आपको अवश्य मिल जायगा।

साबरतट पर स्थित चैतन्य लोक तुल्य संत श्री आसारामजी आश्रम में प्रविष्ट होते ही एक अदभुत शान्ति की अनुभूति होने लगती है। प्रत्येक रविवार और बुधवार को दोपहर 11 बजे से और हररोज शाम 6 बजे से एवं ध्यानयोग शिविरों के दौरान आश्रम में ज्ञानगंगा उमड़ती रहती है। आध्यात्मिक अनुभूतियों के उपवन लहलहाते हैं। आश्रम का सम्पूर्ण वातावरण मानो एक चैतन्य विद्युत्तेज से छलछलाता है। परम चैतन्य मानो स्वयं ही मूर्त्त स्वरूप धारण कर प्रेम और प्रकाश का सागर लहराते है। विद्यार्थियों के लिए आयोजित योग शिविरों में अनेक विद्यार्थियों एवं अध्यापकों ने अपने जीवन विकास का अनोखा पथ पा लिया है।

पूज्य बापूजी का विद्युन्मय व्यक्तित्व, अन्तस्तल की गहराई में से उमड़ती हुई वाणी की गंगधारा और आश्रम के समग्र वातावरण में फैलती हुई दिव्यता का आस्वाद एक बार भी जिस किसी को मिल जाता है वह कदापि उसे भूल नहीं सकता। जो अपने उर के आँगन में अमृत ग्रहण करने के लिए तत्पर हो, उसे अमृत का आस्वाद अवश्य मिल जाता है।

ब्रह्मनिष्ठ, योगसिद्ध, माधुर्य के महासिन्धु समान संत श्री आसाराम जी बापू का सान्निध्य- सेवन करने वाले का और अमृतवर्षा को संग्रहित करने वाले का अल्प पुरूषार्थ भी व्यर्थ नहीं जायेगा ऐसा अनेकों का अनुभव बोल रहा है।

गुरूतत्त्व

जिस प्रकार पिता या पितामह की सेवा करने से पुत्र या पौत्र खुश होता है इसी प्रकार गुरू की सेवा करने से मंत्र प्रसन्न होता है। गुरू, मंत्र एवं इष्टदेव में कोई भेद नहीं मानना। गुरू ही ईश्वर हैं। उनको केवल मानव ही नहीं मानना। जिस स्थान में गुरू निवास कर रहे हैं वह स्थान कैलास हैं। जिस घर में वे रहते हैं वह काशी या वाराणसी है। उनके पावन चरणों का पानी गंगाजी स्वयं हैं। उनके पावन मुख से उच्चारित मंत्र रक्षणकर्त्ता ब्रह्मा स्वयं ही हैं।

गुरू की मूर्ति ध्यान का मूल है। गुरू के चरणकमल पूजा का मूल है। गुरू का वचन मोक्ष का मूल है।

गुरू तीर्थस्थान हैं। गुरू अग्नि हैं। गुरू सूर्य हैं। गुरू समस्त जगत हैं। समस्त विश्व के तीर्थधाम गुरू के चरणकमलों में बस रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पार्वती, इन्द्र आदि सब देव और सब पवित्र नदियाँ शाश्वत काल से गुरू की देह में स्थित हैं। केवल शिव ही गुरू हैं।

गुरू और इष्टदेव में कोई भेद नहीं है। जो साधना एवं योग के विभिन्न प्रकार सिखाते है वे शिक्षागुरू हैं। सबमें सर्वोच्च गुरू वे हैं जिनसे इष्टदेव का मंत्र श्रवण किया जाता है और सीखा जाता है। उनके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

अगर गुरू प्रसन्न हों तो भगवान प्रसन्न होते हैं। गुरू नाराज हों तो भगवान नाराज होते हैं। गुरू इष्टदेवता के पितामह हैं।

जो मन, वचन, कर्म से पवित्र हैं, इन्द्रियों पर जिनका संयम है, जिनको शास्त्रों का ज्ञान है, जो सत्यव्रती एवं प्रशांत हैं, जिनको ईश्वर-साक्षात्कार हुआ है वे गुरू हैं।

बुरे चरित्रवाला व्यक्ति गुरू नहीं हो सकता। शक्तिशाली शिष्यों को कभी शक्तिशाली गुरूओं की कमी नहीं रहती। शिष्य को गुरू में जितनी श्रद्धा होती है उतने फल की उसे प्राप्ति होती है। किसी आदमी के पास अगर यूनिवर्सिटी की उपाधियाँ हों तो इससे वह गुरू की कसौटी करने की योग्यतावाला नहीं बन जाता। गुरू के आध्यात्मिक ज्ञान की कसौटी करना यह किसी भी मनुष्य के लिए मूर्खता एवं उद्दण्डता की पराकाष्ठा है। ऐसा व्यक्ति दुनियावी ज्ञान के मिथ्याभिमान से अन्ध बना हुआ है।

अनुक्रम

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प्रकरण 1 - गुरूभक्तियोग

गुरूभक्तियोग के अंश

  1. गुरूभक्तियोग माना सदगुरू को सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना।
  2. गुरूभक्तियोग के आठ महत्त्वपूर्ण अंग इस प्रकार हैं- (अ) गुरू भक्तियोगके अभ्यास के लिए सच्चे हृदय की स्थिर महेच्छा। (ब) सदगुरू के विचार, वाणी और कार्यों में सम्पूर्ण श्रद्धा। (क) गुरू के नाम का उच्चारण और गुरू को नम्रतापूर्वक साष्टांग प्रणाम। (ड) सम्पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ गुरू के आदेशों का पालन। (प) फलप्राप्ति की अपेक्षा बिना सदगुरू की सेवा। (फ) भक्तिभावपूर्वक हररोज सदगुरू के चरणकमलों की पूजा। (भ) सदगुरू के दैवी कार्य के लिए आत्म-समर्पण.... तन, मन, धन समर्पण। (म) गुरू की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए एवं उनका पवित्र उपदेश सुनकर उसका आचरण करने के लिए सदगुरू के पवित्र चरणों का ध्यान।
  3. गुरूभक्तियोग योग का एक स्वतंत्र प्रकार है।
  4. मुमुक्षु जब तक गुरूभक्तियोग का अभ्यास नहीं करता। तब तक ईश्वर के साथ एकरूपता होने के लिए आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश करना उसके लिए सम्भव नहीं है।
  5. जो व्यक्ति गुरूभक्तियोग की फिलाँसफी समझता है वही गुरू को बिनशरती आत्म-समर्पण कर सकता है।
  6. जीवन के परम ध्येय अर्थात् आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति गुरूभक्तियोग के अभ्यास द्वारा ही हो सकती है।
  7. गुरूभक्ति का योग सच्चा एवं सुरक्षित योग है, जिसका अभ्यास करने में किसी भी प्रकार का भय नहीं है।
  8. आज्ञाकारी बनकर गुरू के आदेशों का पालन करना, उनके उपदेशों को जीवन में उतारना, यही गुरूभक्तियोग का सार है।

गुरूभक्तियोग का हेतु

  1. मनुष्य को पदार्थ एवं प्रकृति के बन्धनों से मुक्ति दिलाना और गुरू को सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करके स्व के अबाध्य स्वतंत्र स्वभाव का भान कराना यह गुरूभक्तियोग का हेतु है।
  2. जो व्यक्ति गुरूभक्तियोग का अभ्यास करता है वह बिना किसी विपत्ति से अहंभाव को निर्मूल कर सकता है, संसार के मलिन जल को बहुत सरलता से पार कर जाता है और अमरत्व एवं शाश्वत सुख प्राप्त करता है।
  3. गुरूभक्तियोग मन को शान्त और निश्चल बनाने वाला है।
  4. गुरूभक्तियोग दिव्य सुख के द्वार खोलने की अमोघ कुँजी है।
  5. गुरूभक्तियोग के द्वारा सदगुरू की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य है।

गुरूभक्तियोग के सिद्धान्त

  1. नम्रतापूर्वक पूज्यश्री सदगुरू के पदारविन्द के पास जाओ। सदगुरू के जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम करो। सदगुरू के चरणकमल की शरण में जाओ। सदगुरू के पावन चरणों की पूजा करो। सदगुरू के पावन चरणों का ध्यान करो। सदगुरू के पावन चरणों में मूल्यवान अर्घ्य अर्पण करो। सदगुरू के यशःकारी चरणों की सेवा में जीवन अर्पण करो। सदगुरू के दैवी चरणों की धूलि बन जाओ। ऐसा गुरूभक्त हठयोगी, लययोगी और राजयोगियों से ज्यादा सरलतापूर्वक एवं सलामत रीति से सत्य स्वरूप का साक्षात्कार करके धन्य हो जाता है।
  2. सदगुरू के दैवी पावन चरणों में आत्मसमर्पण करने वाले को निश्चिन्तता, निर्भयता और आनन्द सहजता से प्राप्त होते है। वह लाभान्वित हो जाता है।
  3. आपको गुरूभक्तियोग के मार्ग द्वारा सच्चे हृदय से, तत्परतापूर्वक प्रयास करना चाहिए।
  4. गुरू के प्रति भक्ति इस योग का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।
  5. पवित्र शास्त्रों के विशेषज्ञ ब्रह्मनिष्ठ गुरू के विचार, वाणी और कार्यों में सम्पूर्ण श्रद्धा गुरूभक्तियोग का सार है।

गुरूभक्तियोग एक विज्ञान के रूप में

 

  1. इस युग में आचरण किया जा सके ऐसा, सबसे ऊँचा और सबसे सरल योग गुरूभक्तियोग है।
  2. गुरूभक्तियोग की फिलासफी में सबसे बड़ी बात गुरू को परमेश्वर के साथ एकरूप मानना है।
  3. गुरूभक्तियोग की फिलासफी का व्यावहारिक स्वरूप यह है कि गुरू को अपने इष्टदेवता से अभिन्न मानें।
  4. गुरूभक्तियोग ऐसी फिलाँसफी नहीं है जो पत्र-व्यवहार या व्याख्यानों के द्वारा सिखाई जा सके। इसमें तो शिष्य को कई वर्ष तक गुरू के पास रहकर शिस्त एवं संयमपूर्ण जीवन बिताना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए एवं गहरा ध्यान करना चाहिए।
  5. गुरूभक्तियोग सर्वोत्तम विज्ञान है।

गुरूभक्तियोग का फल

  1. गुरूभक्तियोग अमरत्व, परम सुख, मुक्ति, सम्पूर्णता, शाश्वत आनन्द और चिरंतन शान्ति प्रदान करता है।
  2. गुरूभक्तियोग का अभ्यास सांसारिक पदार्थों के प्रति निःस्पृहता और वैराग्य प्रेरित करता है तथा तृष्णा का छेदन करता है एवं कैवल्य मोक्ष देता है।
  3. गुरूभक्तियोग का अभ्यास भावनाओं एवं तृष्णाओं पर विजय पाने में शिष्य को सहायरूप बनता है, प्रलोभनों के साथ टक्कर लेने में तथा मन को क्षुब्ध करने वाले तत्त्वों का नाश करने में सहाय करता है। अन्धकार को पार करके प्रकाश की ओर ले जाने वाली गुरूकृपा करने के लिए शिष्य को योग्य बनाता है।
  4. गुरूभक्तियोग का अभ्यास आपको भय, अज्ञान, निराशा, संशय, रोग, चिन्ता आदि से मुक्त होने के लिए शक्तिमान बनाता है और मोक्ष, परम शान्ति और शाश्वत आनन्द प्रदान करता है।

गुरूभक्तियोग की साधना

  1. गुरूभक्तियोग का अर्थ है व्यक्तिगत भावनाओं, इच्छाओं, समझ-बुद्धि एवं निश्चयात्मक बुद्धि के परिवर्तन द्वारा अहोभाव को अनंत चेतना स्वरूप में परिणत करना।
  2. गुरूभक्तियोग गुरूकृपा के द्वारा प्राप्त सचोट, सुन्दर अनुशासन का मार्ग है।

गुरूभक्तियोग का महत्त्व

  1. कर्मयोग, भक्तियोग, हठयोग, राजयोग आदि सब योगों की नींव गुरूभक्तियोग है।
  2. जो मनुष्य गुरूभक्तियोग के मार्ग से विमुख है वह अज्ञान, अन्धकार एवं मृत्यु की परम्परा को प्राप्त होता है।
  3. गुरूभक्तियोग का अभ्यास जीवन के परम ध्येय की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।
  4. गुरूभक्तियोग का अभ्यास सबके लिए खुल्ला है। सब महात्मा एवं विद्वान पुरूषों ने गुरूभक्तियोग के अभ्यास द्वारा ही महान कार्य किये हैं। जैसे एकनाथ महाराज, पूरणपोड़ा, तोटकाचार्य, एकलव्य, शबरी, सहजोबाई आदि।
  5. गुरूभक्तियोग में सब योग समाविष्ट हो जाते है। गुरूभक्तियोग के आश्रय के बिना अन्य कई योग, जिनका आचरण अति कठिन है, उनका सम्पूर्ण अभ्यास किसी से नहीं हो सकता।
  6. गुरूभक्तियोग में आचार्य की उपासना के द्वारा गुरूकृपा की प्राप्ति को खूब महत्त्व दिया जाता है।
  7. गुरूभक्तियोग वेद एवं उपनिषद के समय जितना प्राचीन है।
  8. गुरूभक्तियोग जीवन के सब दुःख एवं दर्दों को दूर करने का मार्ग दिखाता है।
  9. गुरूभक्तियोग का मार्ग केवल योग्य शिष्य को ही तत्काल फल देनेवाला है।
  10. गुरूभक्तियोग अहंभाव के नाश एवं शाश्वत सुख की प्राप्ति में परिणत होता है।
  11. गुरूभक्तियोग सर्वोत्तम योग है।

इस मार्ग के भयस्थान

  1. गुरू के पावन चरणों में साष्टांग प्रणाम करने में संकोच होना यह गुरूभक्तियोग के अभ्यास में बड़ा अवरोध है।
  2. आत्म-बड़प्पन, आत्म-न्यायीपन, मिथ्याभिमान, आत्मंवचना, दर्प, स्वच्छन्दीपना, दीर्घसूत्रता, हठाग्रह, छिद्रन्वेषी, कुसंग, बेईमानी, अभिमान, विषय-वासना, क्रोध, लोभ, अहंभाव .... ये सब गुरूभक्तियोग के मार्ग में आनेवाले विघ्न हैं।
  3. गुरूभक्तियोग के सतत अभ्यास के द्वारा मन की चंचल प्रकृति का नाश करो।
  4. जब मन की बिखरी हुई शक्ति के किरण एकत्रित होते हैं तब चमत्कारिक कार्य कर सकते हैं।
  5. गुरूभक्तियोग का शास्त्र समाधि एवं आत्म-साक्षात्कार करने हेतु हृदयशुद्धि प्राप्त करने के लिए गुरूसेवा पर खूब जोर देता है।
  6. सच्चा शिष्य गुरूभक्तियोग के अभ्यास में लगा रहता है।
  7. पहले गुरूभक्तियोग की फिलाँसफी समझो, फिर उसका आचरण करो। आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
  8. तमाम दुर्गुणों को निर्मूल करने का एकमात्र असरकारक उपाय है गुरूभक्तियोग का आचरण।

गुरूभक्तियोग के मूल सिद्धान्त

  1. गुरू में अखण्ड श्रद्धा गुरूभक्तियोग रूपी वृक्ष का मूल है।
  2. उत्तरोत्तर वर्धमान भक्तिभावना, नम्रता, आज्ञा-पालन आदि इस वृक्ष की शाखाएँ हैं। सेवा फूल है। गुरू को आत्मसमर्पण करना अमर फल है।
  3. अगर आपको गुरू के जीवनदायक चरणों में दृढ़ श्रद्धा एवं भक्तिभाव हो तो आपको गुरूभक्तियोग के अभ्यास में सफलता अवश्य मिलेगी।
  4. सच्चे हृदयपूर्वक गुरू की शरण में जाना ही गुरूभक्तियोग का सार है।
  5. गुरूभक्तियोग का अभ्यास माने गुरू के प्रति शुद्ध उत्कट प्रेम।
  6. ईमानदारी के सिवाय गुरूभक्तियोग में बिल्कुल प्रगति  नहीं हो सकती।
  7. महान योगी गुरू के आश्रय में उच्च आध्यात्मिक स्पन्नदनोंवाले शान्त स्थान में रहो। फिर उनकी निगरानी में गुरूभक्तियोग का अभ्यास करो। तभी आपको गुरूभक्तियोग में सफलता मिलेगी।
  8. ब्रह्मनिष्ठ गुरू के चरणकमल में बिनशर्ती आत्मसमर्पण करना ही गुरूभक्तियोग का मुख्य सिद्धान्त है।

गुरूभक्तियोग के मुख्य सिद्धान्त

  1. गुरूभक्तियोग की फिलासफी के मुताबिक गुरू एवं ईश्वर एकरूप है। अतः गुरू के प्रति सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना अत्यंत आवश्यक है।
  2. गुरू के प्रति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण करना यह गुरूभक्ति का सर्वोच्च सोपान है।
  3. गुरूभक्तियोग के अभ्यास में गुरूसेवा सर्वस्व है।
  4. गुरूकृपा गुरूभक्तियोग का आखिरी ध्येय है।
  5. मोटी बुद्धि का शिष्य गुरूभक्तियोग के अभ्यास में कोई निश्चित प्रगति नहीं कर सकता।
  6. जो शिष्य गुरूभक्तियोग का अभ्यास करना चाहता है उसके लिए कुसंग शत्रु के समान है।
  7. अगर आपको गुरूभक्तियोग का अभ्यास करना हो तो विषयी जीवन का त्याग करो।

शाश्वत सुख का मार्ग

  1. जो व्यक्ति दुःख को पार करके जीवन में सुख एवं आनन्द प्राप्त करना चाहता है उसे अन्तःकरणपूर्वक गुरूभक्तियोग का अभ्यास करना जरूरी है।
  2. सच्चा एवं शाश्वत सुख तो गुरूसेवायोग का आश्रय लेने से ही मिल सकता है, नाशवान पदार्थों से नहीं।
  3. जन्म-मृत्यु के लगातार चलने वाले चक्कर से छूटने का कोई उपाय नहीं है क्या ? सुख-दुःख, हर्ष-शोक के द्वन्द्वों में से मुक्ति नहीं मिल सकती क्या ? सुन, हे शिष्य ! इसका एक निश्चित उपाय है। नाशवान विषयी पदार्थों में से अपना मन वापस खींच ले और गुरूभक्तियोग का आश्रय ले। इससे तू सुख-दुःख, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु के द्वन्द्वों से पार हो जायेगा।
  4. मनुष्य जब गुरूभक्तियोग का आश्रय लेता है तभी उसका सच्चा जीवन शुरू होता है जो व्यक्ति गुरूभक्तियोग का अभ्यास करता है उसे इस लोक में एवं परलोक में चिरंतन सुख प्राप्त होता है।
  5. गुरूभक्तियोग उसके अभ्यास को चिरायु एवं शाश्वत सुख प्रदान करता है।
  6. मन ही इस संसार एवं उसकी प्रक्रिया का मूल है। मन ही बन्धन और मोक्ष, सुख और दुःख का मूल है। इस मन को केवल गुरूभक्तियोग के द्वारा ही संयम में रखा जा सकता है।
  7. गुरूभक्तियोग अमरत्व, शाश्वत सुख, मुक्ति, पूर्णता, अखूट आनन्द और चिरंतन शान्ति देनेवाला है।

गुरूभक्तियोग की महत्ता

  1. परम शान्ति का राजमार्ग गुरूभक्तियोग के अभ्यास से शुरू होता है।
  2. जो जो सिद्धियाँ संन्यास, त्याग, अन्य योग, दान एवं शुभ कार्य आदि से प्राप्त की जा सकती हैं वे सब सिद्धियाँ गुरूभक्तियोग के अभ्यास के शीघ्र प्राप्त हो सकती हैं।
  3. गुरूभक्तियोग एक शुद्ध विज्ञान है, जो निम्न प्रकृति को वश में लाकर परम सुख प्राप्त करने की पद्धति हमें सिखाता है।
  4. कुछ लोग मानते हैं कि गुरूसेवायोग निम्न कोटि का योग है। आध्यात्मिक रहस्य के बारे में यह उनकी बड़ी गलतफहमी है।
  5. गुरूभक्तियोग, गुरूसेवायोग, गुरूशरणयोग आदि समानार्थी शब्द हैं। उनमें कोई अर्थभेद नहीं है।
  6. गुरूभक्तियोग सब योगों का राजा है।
  7. गुरूभक्तियोग ईश्वरज्ञान के लिए सबसे सरल, सबसे निश्चित, सबसे शीघ्रगामी, सबसे सस्ता भयरहित मार्ग है। आप सब इसी जन्म में गुरूभक्तियोग के द्वारा ईश्वरज्ञान प्राप्त करो यही शुभ कामना !

शिष्य को सूचनाएँ

  1. गुरूभक्तियोग का आश्रय लेकर आप अपनी खोयी हुई दिव्यता को पुनः प्राप्त करो, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु आदि सब द्वन्द्वों से पार हो जाओ।
  2. जंगली बाघ, शेर या हाथी को पालना बहुत सरल है, पानी या आग के ऊपर चलना बहुत सरल है लेकिन जब तक मनुष्य को गुरूभक्तियोग के अभ्यास के लिए हृदय की तमन्ना नहीं जागती तब तक सदगुरू के चरणकमलों की शरण में जाना बहुत मुश्किल है।
  3. गुरूभक्तियोग माने गुरू की सेवा के द्वारा मन और उसके विकारों पर नियंत्रण एवं पुनःसंस्करण।
  4. गुरू को सम्पूर्ण बिनशर्ती शरणागति करना गुरूभक्ति प्राप्त करने के लिए निश्चित मार्ग है।
  5. गुरूभक्तियोग की नींव गुरू के ऊपर अखण्ड श्रद्धा में निहित है।
  6. अगर आपको सचमुच ईश्वर की आवश्यकता हो तो सांसारिक सुखभोगों से दूर रहो और गुरूभक्तियोग का आश्रय लो।
  7. किसी भी प्रकार की रूकावट के बिना गुरूभक्तियोग का अभ्यास जारी रखो।
  8. गुरूभक्तियोग का अभ्यास ही मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में निर्भय एवं सदा सुखी बना सकता है।
  9. गुरूभक्तियोग के द्वारा अपने भीतर ही अमर आत्मा की खोज करो।
  10. गुरूभक्तियोग को जीवन का एकमात्र हेतु, उद्देश्य एवं सच्चे रस का विषय बनाओ। इससे आपको परम सुख की प्राप्ति होगी।
  11. गुरूभक्तियोग ज्ञानप्राप्ति में सहायक है।
  12. गुरूभक्तियोग का मुख्य हेतु तुफानी इन्द्रियों पर एवं भटकते हुए मन पर नियंत्रण पाना है।
  13. गुरूभक्तियोग हिन्दू संस्कृति की एक प्राचीन शाखा है जो मनुष्य को शाश्वत सुख के मार्ग में ले जाती है और ईश्वर के साथ सुखद समन्वय करा देती है।
  14. गुरूभक्तियोग आध्यात्मिक और मानसिक आत्म-विकास का शास्त्र है।
  15. गुरूभक्तियोग का हेतु मनुष्य को विषयों के बन्धन से मुक्त करके उसे शाश्वत सुख और दैवी शक्ति की मूल स्थिति की पुनः प्राप्ति कराने का है।
  16. गुरूभक्तियोग मनुष्य को दुःख, जरा और व्याधि से मुक्त करता है, उसे चिरायु बनाता है, शाश्वत सुख प्रदान करता है।
  17. गुरूभक्तियोग में शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक- हर प्रकार के अनुशासन का समावेश हो जाता है। इससे मनुष्य आत्पप्रभुत्व पा सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है।
  18. गुरूभक्तियोग मन की शक्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए विज्ञान एवं कला है।

अनुक्रम

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प्रकरण-2- गुरू और शिष्य

गुरू की महत्ता

  1. जो आँखें गुरू के चरणकमलों का सौन्दर्य नहीं देख सकतीं वे आँखें सचमुच अन्ध हैं।
  2. जो कान गुरू की लीला की महिमा नहीं सुनते वे कान सचमुच बहरे हैं।
  3. गुरू रहित जीवन मृत्यु के समान है।
  4. गुरू कृपा की सम्पत्ति जैसा और कोई खजाना नहीं है।
  5. भवसागर को पार करने के लिए गुरू के सत्संग जैसी और कोई सुरक्षित नौका नहीं है।
  6. आध्यात्मिक गुरू जैसा और कोई मित्र नहीं है।
  7. गुरू के चरणकमल जैसा और कोई आश्रय नहीं है।
  8. सदैव गुरू की रट लगाओ।

गुरू के प्रति भक्तिभावना

  1. श्रद्धा, भक्ति और तत्परता के फूलों से गुरू की पूजा करो।
  2. आत्म-साक्षात्कार के मन्दिर में गुरू का सत्संग प्रथम स्तम्भ है।
  3. ईश्वरकृपा गुरू का स्वरूप धारण करती है।
  4. गुरू के दर्शन करना ईश्वर के दर्शन करने के बराबर है।
  5. जिसने सदगुरू के दर्शन नहीं किये वह मनुष्य अन्धा ही है।
  6. धर्म केवल एक ही है और वह है गुरू के प्रति भक्ति एवं  प्रेम का धर्म।
  7. जब आपको दुनयावी अपेक्षा नहीं रहती तब गुरू के प्रति भक्तिभाव जागता है।
  8. आत्मवेत्ता गुरू के संग के प्रभाव से आपका जीवनसंग्राम सरल बन जायेगा।
  9. गुरू का आश्रय लो और सत्य का अनुसरण करो।
  10. अपने गुरू की कृपा में श्रद्धा रखो और अपने कर्त्तव्य का पालन करो।
  11. गुरू की आज्ञा का अतिक्रमण माने खुद ही अपनी कब्र खोदने के बराबर है।
  12. सदगुरू शिष्य पर सतत आशीर्वाद बरसाते हैं। आत्मसाक्षात्कारी गुरू जगदगुरू हैं, परम गुरू हैं।
  13. जगदगुरू का हृदय सौन्दर्य का धाम है।

गुरू की सेवा

  1. जीवन का ध्येय गुरू की सेवा करने का बनाओ।
  2. जीवन का हरएक कटु अनुभव गुरू के प्रति आपकी श्रद्धा की कसौटी है।
  3. शिष्य कार्य की गिनती करता है जबकि गुरू उसके पीछे निहित हेतु और इरादे की तुलना करते हैं।
  4. गुरू के कार्य को सन्देहपूर्वक देखना सबसे बड़ा पाप है।
  5. गुरू के समक्ष अपना दम्भपूर्ण दिखावा करने की कभी कोशिश मत करना।
  6. शिष्य के लिए तो गुरूआज्ञापालन जीवन का कानून है।
  7. आपके दिव्य गुरू की सेवा करने का कोई भी मौका चुकना नहीं।
  8. जब आप अपने दिव्य गुरू की सेवा करो तब एकनिष्ठ और वफादार रहना।
  9. गुरू पर प्रेम रखना, आज्ञापालन करना यानी गुरू की सेवा करना।
  10. गुरू की आज्ञा का पालन करना उनके सम्मान करने से भी बढ़कर है।
  11. गुरू आज्ञा का पालन त्याग से भी बढ़कर है।
  12. हर किसी परिस्थिति में अपने गुरू को तमाम प्रकार से अनुकूल हो जाओ।
  13. अपने गुरू की उपस्थिति में अधिक बातचीत मत करो।
  14. गुरू के प्रति शुद्ध प्रेम यह गुरू आज्ञापालन का सच्चा स्वरूप है।
  15. अपनी उत्तमोत्तम वस्तु प्रथम अपने गुरू को समर्पित करो। इससे आसक्ति सहज में मिटेगी।
  16. शिष्य ईर्ष्या, डाह एवं अभिमान रहित, निःस्पृह और गुरू के प्रति दृढ़ भक्तिभाववाला होना चाहिए। वह धैर्यवान और सत्य को जानने के लिए निश्चयवाला होना चाहिए।
  17. शिष्य को अपने गुरू के दोष नहीं देखना चाहिए।
  18. शिष्य को गुरू के समक्ष अनावश्यक एवं अयोग्य प्रलाप नहीं करना चाहिए।
  19. गुरू के द्वारा जो सदज्ञान प्राप्त होता है वह माया अथवा अध्यास का नाश करता है।
  20. एक ही ईश्वर अनेक रूप में माया के कारण दिखता है ऐसा जिसको गुरूकृपा से ज्ञान होता है वह सत्य को जानता है और वेदों को समझता है।
  21. गुरूसेवा और पूजा के द्वारा प्राप्त निरन्तर भक्ति से तीक्ष्ण धार वाले ज्ञान के कुल्हाड़े से तू धीरे-धीरे, पर दृढ़तापूर्वक इस संसार रूपी वृक्ष को काट दे।
  22. गुरू जीवन-नौका के कर्णधार और ईश्वर उस नौका को चलाने वाला अनुकूल पवन है।
  23. जब मनुष्य को संसार के प्रति घृणा उपजती है, उसे वैराग्य आता है और गुरू के दिये हुए उपदेश का चिन्तन करने के लिए शक्तिमान होता है तब ध्यान में बार-बार अभ्यासके कारण उसके मन की अनिष्ट प्रकृति दूर होती है।
  24. गुरू से भली प्रकार जान लिया जाय तभी मंत्र के द्वारा शुद्धि पैदा होती है।

शिष्यवृत्ति के सिद्धान्त

  1. मनुष्य अनादि काल से अज्ञान के प्रभाव में होने के कारण गुरू के बिना उसे आत्म-साक्षात्कार नहीं हो सकता। जो ब्रह्म को जानता है वही दूसरे को ब्रह्मज्ञान दे सकता है।
  2. सयाने मनुष्य को चाहिए कि वह अपने गुरू को आत्मा-परमात्मारूप जानकर अविरत भक्तिभावपूर्वक उनकी पूजा करे अर्थात् उनके साथ तदाकार बने।
  3. शिष्य को गुरू एवं ईश्वर के प्रति सन्निष्ठ भक्तिभाव होना चाहिए।
  4. शिष्य को आज्ञाकारी बनकर, सावधान मन से एवं निष्ठापूर्वक गुरू की सेवा करनी चाहिए और उनसे भगवद् भक्त के कर्त्तव्य अथवा भगवद् धर्म जानना चाहिए।
  5. शिष्य को ईश्वर के रूप में गुरू की सेवा करना चाहिए। विश्व के नाथ को प्रसन्न करने का एवं उनकी कृपा के योग्य बनने का सुनिश्चित उपाय है।
  6. शिष्य को वैराग्य का अभ्यास करना चाहिए और अपने आध्यात्मिक गुरू का सत्संग करना चाहिए।
  7. शिष्य को प्रथम तो अपने गुरू की कृपा प्राप्त करना चाहिए और उनके बताये हुए मार्ग में चलना चाहिए।
  8. शिष्य को अपनी इन्द्रियों को संयम में रखकर गुरू के आश्रय में रहना चाहिए..... सेवा, साधना एवं शास्त्राभ्यास करना चाहिए।
  9. शिष्य को गुरू के द्वार से जो कुछ अच्छा या बुरा, कम या ज्यादा, सादा या स्वादु खाना मिले वह गुरूभाई को अनुकूल होकर खाना चाहिए।

गुरू का ध्यान

  1. गुरू के चरणकमलों का ध्यान करना यह मोक्ष एवं शाश्वत सुख की प्राप्ति का केवल एक ही मार्ग है।
  2. जो मनुष्य गुरू के चरणकमलों का ध्यान नहीं करते वे आत्मा का घात करने वाले हैं। वे सचमुच जिन्दे शव के समान कंगले मवाली हैं। वे अति दरिद्र लोग हैं। ऐसे निगुरे लोग बाहर से धनवान दिखते हुए भी आध्यात्मिक जगत में अत्यंत दरिद्र हैं।
  3. सयाने सज्जन अपने गुरू के चरणकमल के निरन्तर ध्यान रूपी रसपान से अपने जीवन को रसमय बनाते है और गुरू के ज्ञान  रूपी तलवार को साथ में रखकर मोहमाया के बन्धनों को काट डालते हैं।
  4. गुरू के चरणकमल का ध्यान करना यह शाश्वत सुख के द्वार खोलने के लिए अमोघ चाबी है।
  5. गुरू का ध्यान करना यह आखिरी सत्य की प्राप्ति का केवल एक ही सच्चा राजमार्ग है।
  6. गुरू का ध्यान करने से सब दुःख, दर्द एवं शोक का नाश होता है।
  7. गुरू का ध्यान करने से शोक व दुःख के तमाम कारण नष्ट हो जाते हैं।
  8. गुरू का ध्यान आपके इष्ट देवता के दर्शन कराता है, गुरूत्व में स्थिति कराता है।
  9. गुरू का ध्यान एक प्रकार का वायुयान है, जिसकी सहायता से शिष्य शाश्वत सुख, चिरंतन शान्ति एवं अखूट आनन्द के उच्च लोक में उड़ सकता है।
  10. गुरू का ध्यान दिव्यता की प्राप्ति के लिए राजमार्ग है, जो शिष्य को दिव्य जीवन के ध्येय तक सीधा ले जाता है।
  11. गुरू का ध्यान एक रहस्यमय सीढी है, जो शिष्य को पृथ्वी पर से स्वर्ग में ले जाती है।
  12. गुरू के चरणकमल का ध्यान किये बिना शिष्य के लिए आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
  13. गुरू का नियमित ध्यान करने से आत्मज्ञान के प्रदेश खुल जाते हैं, मन शांत, स्वस्थ एवं स्थिर बनता है और अन्तरात्मा जागृत होती है।

सुख की विजय

  1. शिष्य जब गुरू के चरणकमल का ध्यान करता है तब सब संशय अपने आप नष्ट हो जाते हैं।
  2. शिष्य जब गुरू की सुरक्षा में होता है तब कोई भी वस्तु उसके मन को क्षुभित नहीं कर सकती।