
गुरू
भक्ति योग
(Guru Bhakti Yog)
लेखक
श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती
सम्पादक
श्री स्वामी सच्चिदानंद
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आकल्पजन्मकोटीनां
यज्ञव्रततपः
क्रियाः।
ताः
सर्वाः सफला
देवि
गुरूसंतोषमात्रतः।।
'हे देवी ! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ... ये सब गुरूदेव के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं।'
(भगवान शंकर)
अमानमत्सरो
दक्षो
निर्ममो
दृढ़सौहृदः।
असत्वरोऽर्थ
जिज्ञासुः
अनसूयुः
अमोघवाक्।।
'सत्शिष्य मान और मत्सर से रहित, अपने कार्य में दक्ष, ममता रहित, गुरू में दृढ़ प्रीतिवाला, निश्चलचित्त, परमार्थ का जिज्ञासु, ईर्ष्या से रहित और सत्यवादी होता है।'
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
प.पू. संत
श्री आसारामजी
बापूः एक अदभुत
विभूति
गुरूभक्तियोग
एक विज्ञान के
रूप में
गुरूभक्तियोग
के मुख्य सिद्धान्त
ध्यान के
लिए प्राथमिक तैयारियाँ
प्रकरणः
3 - गुरूभक्ति का
विकास
गुरू के प्रति
आध्यात्मिक अभिगम
प्रकरणः
4 - गुरूभक्ति की
शिक्षा
गुरू कृपा
से प्राप्त होने
वाली प्रसन्नता
शिष्यत्व
की कुंजी है ब्रह्मचर्य
और गुरूसेवा।
प्रकरणः
6 - गुरूभक्ति का
अभ्यास
प्रकरणः
7 - साधक के सच्चे
पथप्रदर्शक
गुरू कृपा
से ईश्वर-साक्षात्कार
प्रकरणः
8 - गुरूभक्ति का
विवरण
ईश्वर-साक्षात्कार
का सबसे सरल मार्ग
आध्यात्मिक
प्रवृत्ति की आवश्यकता
प्रकरणः
10 -गुरूभक्ति का
संविधान
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गुरू की आवश्यकता, गुरू के प्रति शिष्य की भक्ति कैसी होनी चाहिए एवं गुरू के मार्गदर्शन के द्वारा साधक शिष्य किस प्रकार आत्म-साक्षात्कार कर सकता है, इस विषय में पूज्य श्री स्वामी शिवानन्दजी महाराज ने अपनी कई पुस्तकों में लिखा है। श्री गुरूदेव के अग्रगण्य शिष्य एवं उनके निजी रहस्यमंत्री श्री स्वामी सच्चिदानंदजी ने सोचा कि स्वामी जी महाराज की पुस्तकों में से गुरू एवं गुरूभक्ति के विषय में जो जो लिखा गया है वह सब संकलित करके अलग पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना अत्यंत आवश्यक है। अतः उन्होंने यह 'गुरूभक्तियोग' पुस्तक का सम्पादन किया।
आध्यात्मिक मार्ग में विचरने वाले साधकों के लिए यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है, इतना ही नहीं, एक आशीर्वाद के समान है।
सदगुरूदेव के कृपा-प्रसादरूप यह पुस्तक आपको अमरत्व, परम सुख और शान्ति प्रदान करे यही अभ्यर्थना......
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
स्वामी
शिवानन्द
कर्म और कर्त्ता, पदार्थ और व्यक्ति के सम्बन्ध से ज्ञान होता है। वह एक प्रक्रिया है, चेतना नहीं है। बाह्य पदार्थ और आन्तरिक स्थिति की प्रतिक्रिया के द्वारा ही सब प्रक्रिया प्रकट होती है। मनुष्य में ज्ञान का उदभव यह ऐसी ही प्रतिक्रिया के द्वारा घटित एक रहस्यमय प्रक्रिया है। मूलतः ज्ञान सार्वत्रिक है और उसके लिए कोई प्रक्रिया आवश्यक नहीं है। परन्तु ज्ञान का उदय माने भावातीत चेतना नहीं अपितु सम्बन्धित व्यक्ति में ज्ञान का उदय है। सर्वोच्च ज्ञान को स्वरूपज्ञान-. अपने सत्य अस्तित्व के बोध विषयक ज्ञान कहा जाता है। जीव में इस स्वरूपज्ञान का उदय मन की वृत्तियों के द्वारा अभिव्यक्ति की सापेक्ष प्रक्रिया से होता है। इस प्रकार उदय की प्रक्रिया के दौरान ज्ञान वृत्तिज्ञान के रूप में होता और वृत्तिज्ञान निश्चित रूप से चेतना की देश एवं काल से बद्ध अवस्था है।
मानसशास्त्र जिसे ज्ञान कहता है वह वृत्तिज्ञान है। उसकी प्रबलता, व्यापकता और गहनता अलग-अलग हो सकती है। वृत्तिज्ञान बाह्य कर्म और कर्त्ता, पदार्थ और व्यक्ति के सम्बन्ध के सिवाय उत्पन्न नहीं हो सकता। इस विश्व में कोई भी घटना दो घटना या स्थितियों के संयोग से ही घटित हो सकती है और तभी वृत्तिज्ञान उत्पन्न हो सकता है। आध्यात्मिक ज्ञान के क्रमशः आविष्कार के लिए आध्यात्मिक मार्ग का साधक कर्त्ता या व्यक्ति के रूप में माना जा सकता है। अब दूसरी वस्तु या व्यक्ति कर्म के रूप में आवश्यक है।
जब ऐच्छिक अनुशासन और एकाग्रता के द्वारा अपने मन की निर्मलता बढ़ती है तब भावातीत चेतना के प्रतिबिम्ब के रूप में ज्ञान का आविष्कार होता है। ज्ञान के आविष्कार की मात्रा का फर्क मन की निर्मलता के फर्क के कारण होता है। किसी भी प्रकार के ज्ञान के उदभव के लिए बाह्य साधन, कर्म या क्रिया आवश्यक है। अतः साधक में ज्ञान का आविर्भाव करने के लिए गुरू की आवश्यकता होती है। परस्पर प्रभावित करने की सार्वत्रिक प्रक्रिया के लिए एक दूसरे के पूरक दो भाग के रूप में गुरू-शिष्य हैं। शिष्य में ज्ञान का उदय शिष्य की पात्रता और गुरू की चेतनाशक्ति पर अवलम्बित है। शिष्य की मानसिक स्थिति अगर गुरू की चेतना के आगमन के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में तैयार नहीं होती तो ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं हो सकता। इस ब्रह्माण्ड मे कोई भी घटना घटित होने के लिए यह पूर्वशर्त है। जब तक सार्वत्रिक प्रक्रिया के एक दूसरे के पूरक ऐसे दो भाग या दो अवस्थाएँ इकट्ठी नहीं होती तब तक कहीं भी, कोई भी घटना घटित नहीं हो सकती।
'आत्म-निरीक्षण के द्वारा ज्ञान का उदय स्वतः हो सकता है और इसलिए बाह्य गुरू की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है.....' यह मत सर्वस्वीकृत नहीं बन सकता। इतिहास बताता है कि ज्ञान की हर एक शाखा में शिक्षण की प्रक्रिया के लिए शिक्षक की सघन प्रवृत्ति अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी भी व्यक्ति में, किसी भी सहायता के सिवाय, सहज रीति से ज्ञान का उदय संभव होता तो स्कूल, कॉलेज एवं यूनिवर्सिटिंयों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। जो लोग 'शिक्षक की सहायता के बिना ही, स्वतंत्र रीति से कोई व्यक्ति कुशल बन सकता है......' ऐसे गलत मार्ग पर ले जाने वाले मत का प्रचार प्रसार करते हैं वे लोग स्वयं तो किसी शिक्षक के द्वारा ही शिक्षित होते हैं। हाँ, ज्ञान के उदय के लिए शिष्य या विद्यार्थी के प्रयास का महत्त्व कम नहीं है। शिक्षक के उपदेश जितना ही उसका भी महत्त्व है।
इस ब्रह्माण्ड में कर्त्ता एवं कर्म सत्य के एक ही स्तर पर स्थित हैं, क्योंकि इसके सिवाय उनके बीच पारस्परिक आदान-प्रदान संभव नहीं हो सकता। अलग स्तर पर स्थित चेतना शक्ति के बीच प्रतिक्रिया नहीं हो सकती। हालांकि शिष्य जिस स्तर पर होता है उस स्तर को माध्यम बनाकर गुरू अपनी उच्च चेतना को शिष्य पर केन्द्रित कर सकते हैं। इससे शिष्य के मन का योग्य रूपांतर हो सकता है। गुरू की चेतना के इस कार्य को शक्ति संचार कहा जाता है। इस प्रक्रिया में गुरू की शक्ति शिष्य में प्रविष्ट होती है। ऐसे उदाहरण भी मिल जाते हैं कि शिष्य के बदले में गुरू ने स्वयं ही साधना की हो और उच्च चेतना की प्रत्यक्ष सहायता के द्वारा शिष्य के मन की शुद्धि करके उसका ऊर्ध्वीकरण किया हो।
दोषदृष्टिवाले लोग कहते हैं.... "अन्तरात्मा की सलाह लेकर सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा हम पहचान सकते है अतः बाह्य गुरू की आवश्यकता नहीं है।"
किन्तु यह बात ध्यान में रहे कि जब तक साधक शुचि और इच्छा-वासनारहितता के शिखर पर नहीं पहुँच जाता तब तक योग्य निर्णय करने में अन्तरात्मा उसे सहायरूप नहीं बन सकती।
पाशवी अन्तरात्मा किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं दे सकती। मनुष्य के विवेक और बौद्धिक मत पर उसके अव्यक्त और अज्ञात मन का गहरा प्रभाव पड़ता है। प्रायः सभी मनुष्यों की बुद्धि सुषुप्त इच्छाओं तथा वासनाओं का एक साधन बन जाती है। मनुष्य की अन्तरात्मा उसके अभिगम, झुकाव, रूचि, शिक्षा, आदत, वृत्तियाँ और अपने समाज के अनुरूप बात ही कहती है। अफ्रीका के जंगली आदिवासी, सुशिक्षित युरोपियन और सदाचार की नींव पर सुविकसित बने हुए योगी की अन्तरात्मा की आवाजें भिन्न-भिन्न होती हैं। बचपन से अलग-अलग ढंग से बड़े हुए दस अलग-अलग व्यक्तियों की दस अलग-अलग अन्तरात्मा होती हैं। विरोचन ने स्वयं ही मनन किया, अपनी अन्तरात्मा का मार्गदर्शन लिया एवं मैं कौन हूँ ? इस समस्या का आत्मनिरीक्षण किया और निश्चय किया कि यह देह ही मूलभूत तत्त्व है।
याद रखना चाहिए कि मनुष्य की अन्तरात्मा पाशवी वृत्तियों, भावनाओं तथा प्राकृत वासनाओं की जाल में फँसी हुई हैं। मनुष्य के मन की वृत्ति विषय और अहं की ओर ही जायगी, आध्यात्मिक मार्ग में नहीं मुड़ेगी। आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च भूमिका में स्थित गुरू में शिष्य अगर अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण समर्पण कर दे तो साधना-मार्ग के ऐसे भयस्थानों से बच सकता है। ऐसा साधक संसार से परे दिव्य प्रकाश को प्राप्त कर सकता है। मनुष्य की बुद्धि एवं अन्तरात्मा को जिस प्रकार निर्मित किया जाता है, अभ्यस्त किया जाता है उसी प्रकार वे कार्य करते हैं। सामान्यतः वे दृश्यमान मायाजगत तथा विषय वस्तु की आकांक्षा एवं अहं की आकांक्षा पूर्ण करने के लिए कार्यरत रहते हैं। सजग प्रयत्न के बिना आध्यात्मिक ज्ञान के उच्च सत्य को प्राप्त करने के लिए कार्यरत नहीं होते।
'गुरू की आवश्यकता नहीं है और हरएक को अपनी विवेक-बुद्धि तथा अन्तरात्मा का अनुसरण करना चाहिए.....' ऐसे मत का प्रचार प्रसार करने वाले भूल जाते हैं कि ऐसे मत का प्रचार करके वे स्वयं गुरू की तरह प्रस्तुत हो रहे हैं। 'किसी भी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है' ऐसा सिखाने वालों को उनके शिष्य मानपान और भक्तिभाव अर्पित करते हैं। भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को बोध दिया कि 'तुम स्वयं ही तार्किक विश्लेषण करके मेरे सिद्धान्त की योग्यता-अयोग्यता और सत्यता की जाँच करो। बुद्ध कहते हैं इसलिए सिद्धान्त को सत्य मानकर स्वीकार कर लो ऐसा नहीं।' किसी भी भगवान की पूजा करना, ऐसा उन्होंने सिखाया लेकिन इसका परिणाम यह आया कि महान गुरू एवं भगवान के रूप में उनकी पूजा शुरू हो गई। इस प्रकार स्वयं ही चिन्तन करना चाहिए और गुरू की आवश्यकता नहीं है' इस मत की शिक्षा से स्वाभाविक ही सीखनेवाले के लिए गुरू की आवश्यकता का इन्कार नहीं हो सकता। मनुष्य के अनुभव कर्त्ता कर्म के परस्पर सम्बन्ध की प्रक्रिया पर आधारित है।
पश्चिम में कुछ लोग मानते हैं कि गुरू पर शिष्य का अवलंबन एक मानसिक बन्धन है। मानस-चिकित्सा के मुताबिक ऐसे बन्धन से मुक्त होना जरूरी है। यहाँ स्पष्टता करना अत्यन्त आवश्यक है कि मानस-चिकित्सा वाले मानसिक परावलम्बन से गुरू-शिष्य का सम्बन्ध बिल्कुल भिन्न है। गुरू की उच्च चेतना के आश्रय में शिष्य अपना व्यक्तित्व समर्पित करता है। गुरू की उच्च चेतना शिष्य की चेतना को आवृत्त कर लेती है और उसका ऊर्ध्वीकरण करती है । तदुपरांत, गुरू-शिष्य के व्यक्तिगत सम्बंध एवं शिष्य का गुरू पर अवलम्बन केवल प्रारंभ में ही होता है। बाद में तो वह परब्रह्म की शरणागति बन जाती है। गुरू सनातन शक्ति के प्रतीक बनते हैं। किसी दर्दी के मानस-चिकित्सक के प्रति परावलम्बन का सम्बन्ध तोड़ना अनिवार्य है, क्योंकि यह सम्बन्ध दर्दी का मानसिक तनाव कम करने के लिए अस्थायी सम्बन्ध है। जब चिकित्सा पूरी हो जाती है तब यह परावलम्बन तोड़ दिया जाता है और दर्दी पूर्व की भाँति अलग और स्वतंत्र हो जाता है। किन्तु गुरू-शिष्य के सम्बन्ध में, प्रारंभ में या अन्त में, कभी भी अनिच्छनीय परावलम्बन नहीं होता। यह तो केवल पराशक्ति पर ही अवलम्बन होता है। गुरू को देह स्वरूप में यह एक व्यक्ति के स्वरूप में नहीं माना जाता है। गुरू पर अवलम्बन शिष्य के पक्ष में देखा जाय तो आत्मशुद्धि की निरंतर प्रक्रिया है जिसके द्वारा शिष्य ईश्वरीय परम तत्त्व का अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
कुछ लोग उदाहरण देते हैं कि प्राचीन समय में भी याज्ञवल्क्य ने अपने गुरू वैशंपायन से अलग होकर, किसी भी अन्य गुरू की सहाय के बिना ही, स्वतंत्र रीति से आध्यात्मिक विकास किया था। परन्तु याज्ञवाल्क्य गुरू से अलग हो गये इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गुरू के वफादार नहीं थे। गुरू ने क्रोधित होकर कहा था कि उन्होंने दी हुई विद्या लौटाकर आश्रम छोड़कर चले जाओ। फलतः याज्ञवल्क्य मुनि में मानव-गुरू के प्रति अश्रद्धा का प्रादुर्भाव हुआ लेकिन उन्होंने गुरू की खोज करना छोड़ नहीं दिया। उन्होंने गुरू की आवश्यकता का अस्वीकार नहीं किया है और आध्यात्मिक मार्ग में स्वतंत्र रीति से आगे बढ़ा जा सकता है ऐसा भी नहीं माना है। उन्होंने उच्चतर गुरू सूर्यनारायण का आश्रय लिया। जब उन्होंने फिर से ज्ञान प्राप्त किया तब सूर्य की कृपा प्राप्त करने के लिए याज्ञवल्क्य मुनि के दृढ़ संकल्प बल एवं हिम्मत पर प्रसन्न होकर पुराने गुरू ने अपने अन्य शिष्यों को ज्ञान प्रदान करने के लिए प्रार्थना की तब याज्ञवल्क्य मुनि ने अन्य शिष्यों को भी ज्ञान प्रदान किया ।
प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के द्वारा अभिव्यक्त ईश्वर ही सर्वोच्च गुरू है। हमारे इर्दगिर्द जो विश्व है वह हमारे जीवन में बोध देने वाला शिक्षक है। हम अगर प्रकृति की लीला के प्रति सजग रहें तो हमारे समक्ष होने वाली हरएक घटना में गहन रहस्य एवं बोधपाठ मिल जाता है। यह विश्व ईश्वर का साकार स्वरूप है। उसकी लीला गूढ़ और रहस्यमय है। वह लीला आन्तर एवं बाह्य, व्यक्तिलक्षी एवं वस्तुलक्षी, हर प्रकार के जीवन के अनुभवों को समाविष्ट कर लेती है। उसको जानने से, समझने से हमारे अनुभव, भावना एवं समझ का योग्य विकास होता है। परब्रह्म के प्रति हमारे विकास के लिए परिवर्तन संभव बनता है।
अगर हम प्रकृति की उत्क्रान्ति की प्रक्रिया के साथ व्यक्तिगत विकास को नहीं जोड़ेंगे तो केवल याँत्रिक विकास होगा। उसमें व्यक्ति अनिवार्यतः घसीटा जाता है। उस पर किसी व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता। किन्तु विकास जब परम चेतना के अंश स्वरूप होता है और व्यक्ति की अपनी चेतना में घुलमिल जाता है तब योग की प्रक्रिया घटित होती है। व्यक्ति की चेतना अपने अस्तित्व को आत्मा के साथ पहचानकर, अपने आत्मा में वैश्विक उत्क्रान्ति का अनुभव करे- यह प्रक्रिया योग है। अन्य दृष्टि से देखें तो, ब्रह्माण्ड की लीला का लघु स्वरूप में अपनी आत्मा में अनुभव करना योग है। जब यह स्थिति प्राप्त होती है तब व्यक्ति ईश्वरेच्छा की सम्पूर्णतः शरण हो जाता है। अथवा पराशक्ति के नियम उसको इतने तादृश बन जाते हैं कि प्रकृति की घटनाओं एवं मनुष्य की इच्छाओं के बीच संघर्षों का पूर्णतः लोप हो जाता है। उस व्यक्ति की अभिलाषाएँ दैवी इच्छा या प्रकृति की घटनाओं से अभिन्न बन जाती हैं।
गुरू की यह सर्वोच्च विभावना है और हर साधक को यह प्राप्त करना है। व्यक्तिगत गुरू का स्वीकार करना यानी साधक की परब्रह्म में विलीन होने की तैयारी और उस दिशा में एक सोपान। गुरू की विभावना के विकास के तथा साधक की गुरू के प्रति शरणागति के विभिन्न सोपान हैं। फिर भी साधना के किसी भी सोपान पर गुरू की आवश्यकता का इन्कार नहीं हो सकता, क्योंकि आत्म-साक्षात्कार के लिए तड़पते हुए साधक को होने वाली परब्रह्म की अनुभूति का नाम गुरू है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
ब्रह्मलीन
स्वामी
शिवानन्दजी
जिस प्रकार शीघ्र ईश्वरदर्शन के लिए कलियुग-साधना के रूप में कीर्तन-साधना है उसी प्रकार इस संशय, नास्तिकता, अभिमान और अहंकार के युग में योग की एक नई पद्धति यहाँ प्रस्तुत है-.गुरूभक्तियोग। यह योग अदभुत है। इसकी शक्ति असीम है। इसका प्रभाव अमोघ है। इसकी महत्ता अवर्णनीय है। इस युग के लिए उपयोगी इस विशेष योग-पद्धति के द्वारा आप इस हाड़-चाम के पार्थिव देह में रहते हुए ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी जीवन में आप उन्हें अपने साथ विचरण करते हुए निहार सकते हैं।
साधना का बड़ा दुश्मन रजोगुणी अहंकार है। अभिमान को निर्मूल करने के लिए एवं विषमय अहंकार को पिघलाने के लिए गुरूभक्तियोग उत्तम और सबसे अधिक सचोट साधनमार्ग है। जिस प्रकार किसी रोग के विषाणु निर्मूल करने के लिए कोई विशेष प्रकार की जन्तुनाशक दवाई आवश्यक है उसी प्रकार अविद्या और अहंकार के नाश के लिए गुरूभक्तियोग सबसे अधिक प्रभावशाली, अमूल्य और निश्चित प्रकार का उपचार है। वह सबसे अधिक प्रभावशाली 'मायानाशक' और 'अहंकार नाशक' है। गुरूभक्तियोग की भावना में जो सदभागी शिष्य निष्ठापूर्वक सराबोर होते हैं उन पर माया और अहंकार के रोग का कोई असर नहीं होता। इस योग का आश्रय लेने वाला व्यक्ति सचमुच भाग्यशाली है। क्योंकि वह योग के अन्य प्रकारों में भी सर्वोच्च सफलता हासिल करेगा। उसको कर्म, भक्ति, ध्यान और ज्ञानयोग के फल पूर्णतः प्राप्त होंगे।
इस योग में संलग्न होने के लिए तीन गुणों की आवश्यकता हैः निष्ठा, श्रद्धा और आज्ञापालन। पूर्णता के ध्येय में सन्निष्ठ रहो। संशयी और ढीले ढाले मत रहना। अपने स्वीकृत गुरू में सम्पूर्ण श्रद्धा रखो। अपने मन में संशय की छाया को भी फटकने मत देना। एक बार गुरू में सम्पूर्ण श्रद्धा दृढ़ कर लेने के बाद आप समझने लगेंगे कि उनका उपदेश आपकी श्रेष्ठ भलाई के लिए ही होता है। अतः उनके शब्द का अन्तःकरणपूर्वक पालन करो। उनके उपदेश का अक्षरशः अनुसरण करो। आप हृदयपूर्वक इस प्रकार करेंगे तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आप पूर्णता को प्राप्त करेंगे ही। मैं पुनः दृढ़तापूर्वक विश्वास दिलाता हूँ।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
ध्यान और योग के अनुभव कैसे प्राप्त किये जाएँ? पूजा पाठ, जप-तप ध्यान करने पर भी जीवन में व्याप्त अतृप्ति का कैसे निवारण करें? ईश्वर में कैसे मन लगायें? अपने अंदर ही निहित आत्मानंद के खजाने को कैसे खोलें? व्यावहारिक जीवन में परेशान करने वाले भय, चिन्ता, निराशा, हताशा, आदि को जीवन से दूर कैसे भगायें? निश्चिंतता, निर्भयता, निरन्तर प्रसन्नता प्राप्त करके जीवन को आनन्द से कैसे महकायें? अपने प्राचीन शास्त्रों में वर्णित आनन्द-स्वरूप ईश्वर के अस्तित्व की झाँकी हम अपने हृदय में कैसे पायें? क्या आज भी यह सब सम्भव है?
हाँ, सम्भव है, अवश्यमेव। मानव को चिंतित बनाने वाले इन प्रश्नों का समाधान साधना के निश्चित परिणामों के द्वारा कराके पिपासु साधकों के जीवन को ईश्वराभिमुख करके उन्हें मधुरता प्रदान करने वाले ऋषि-महर्षि और संत-महापुरूष आज भी समाज में मौजूद है। 'बहुरत्ना वसुन्धरा।' इन संत महापुरूषों की सुगंधित हारमाला में पूज्य संत श्री आसारामजी बापू एक पूर्ण विकसित सुमधुर पुष्प हैं।
अहमदाबाद शहर में, किन्तु शहरी वातावरण से दूर साबरमती नदी की मनमोहक प्राकृतिक गोद में त्वरित गति से विकसित हुए उनके पावन आश्रम के अध्यात्मपोषक वातावरण में आज हजारों साधक जाकर भक्तियोग, नादानुसंधानयोग, ज्ञानयोग एवं कुण्डलिनी योग की शक्तिपात वर्षा का लाभ उठाकर अपने व्यक्तिगत पारमार्थिक जीवन को अधिकाधिक उन्नत एवं आनन्दमय बना रहे हैं। चित्त में समता का प्रसाद पाकर वे व्यावहारिक जीवन-नौका को बड़े ही उत्साह से खे-खेकर निहाल होते जाते हैं।
प्राचीन ऋषि कुलों का स्मरण कराने वाले इस पावन आश्रम में कुण्डलिनी योग की सच्ची अनुभूति कराके आत्मिक प्रेमसागर में डुबकी लगवाने वाले, मानव समुदाय को ईश्वरीय आनन्द में सराबोर करने वाले, तप्त हृदयवाले हजारो संसारयात्रियों के आश्रयदाता, वट-वृक्षतुल्य, प्रेमपूर्ण हृदयवाले, अगमनिगम के औलिया, परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू ने सहज सान्निध्य एवं सत्संग मात्र लोगो को वेदान्त के अमृत-रस का स्वाद चखा रहे हैं।
संत श्री के नाम को सुनकर, उनकी पुस्तकें पढ़कर अनेक सज्जन उनके दर्शन और मुलाकात के लिए कुतूहलवश एक बार उनके आश्रम में आते है, फिर तो वे नियमित आने वाले साधक बनकर योग और वेदान्त के रसिक बन जाते हैं। वे अपने जीवन-प्रवाह को अमृतमय आनन्द-सिन्धु की तरफ बहते हुए देखकर हृदय में गदगदित हो जाते हैं, आनन्द में सराबोर हो जाते हैं।
एक
अजब योगी
आश्रम में जाकर पूज्यश्री के दर्शन और आध्यात्मिक तेज से उद्दीप्त नयनामृत से सिक्त एक सुप्रसिद्ध लेखक, वक्ता, तंत्री सज्जन ने लिखा हैः
"कोई मुझसे पूछे की अहमदाबाद के आसपास कौन सच्चा योगी है ? मैं तुरन्त संत श्री आसारामजी बापू का नाम दूँगा। साबरतट स्थित एक भव्य एवं विशाल आश्रम में विराजमान इन दिव्यात्मा महापुरूष का दर्शन करना, वास्तव में जीवन की एक उपलब्धि है। उनके निकट में पहुँचना, निश्चित ही अहोभाग्य की सीमा पर पहुँचना है।
योगियों की खोज में मैं काफी भटका हूँ, पर्वत और गुफाओं के चक्कर काटने में कभी पीछे मुड़कर देखा तक नहीं। परन्तु प्रभुत्वशाली व्यक्ति के महाधनी ऐसे संत श्री आसारामजी बापू से मिलते ही मेरे अन्तर में प्रतीति सी हो गई कि यहाँ तो शुद्धतम सुवर्ण ही सुवर्ण है।
प्रेम
और प्रज्ञा के
सागर
संत श्री की आँखों में ऐसा दिव्य तेज जगमगाया करता है कि उनके अन्दर की गहरी अतल दिव्यता में डूब जाने की कामना करने वाला क्षणभर में ही उसमें डूब जाता है। मानो, उन आँखों में प्रेम और प्रकाश का असीम सागर हिलौरें ले रहा है।
वे सरल भी इतने कि छोटे-छोटे बालकों की तरह व्यवहार करने लगें। उनमें ज्ञान भी ऐसा अदभुत कि विकट पहेली को पलभर में सुलझा कर रख दें। उनकी वाणी की बुनकार ऐसी कि सजगता के तट पर सोनेवाले को क्षणभर में जगाकर ज्ञान-सागर की मस्ती में लीन कर दें।
अनेक
शक्तियों के
स्वामी
अन्यत्र कहीं देखी न गई हो ऐसी योगसिद्धि मैंने अनेक बार उनमें देखी है। अनेक दरिद्रों को उन्होंने सुख और समृद्धि के सागर में सैर करने वाले बना दिये हैं। उनके चुम्बकीय शक्ति-सम्पन्न पावन सान्निध्य में असंख्य साधकों द्वारा स्वानुभूत चमत्कारों और दिव्य अनुभवों का आलेखन करने लगूँ तो एक विराट भागवत कथा तैयार हो जाय। आगत व्यक्ति के मन को जान लेने की शक्ति तो उनमें इतनी तीव्रता से सक्रिय रहती है मानो समस्त नभमण्डल को वे अपने हाथों में लेकर देख रहे हों।
ऐसे परम सिद्ध पुरूष के सान्निध्य में, उनकी प्रेरक पावन अमृतवाणी में से आपकी जीवन-समस्याओं का सांगोपांग हल आपको अवश्य मिल जायगा।
साबरतट पर स्थित चैतन्य लोक तुल्य संत श्री आसारामजी आश्रम में प्रविष्ट होते ही एक अदभुत शान्ति की अनुभूति होने लगती है। प्रत्येक रविवार और बुधवार को दोपहर 11 बजे से और हररोज शाम 6 बजे से एवं ध्यानयोग शिविरों के दौरान आश्रम में ज्ञानगंगा उमड़ती रहती है। आध्यात्मिक अनुभूतियों के उपवन लहलहाते हैं। आश्रम का सम्पूर्ण वातावरण मानो एक चैतन्य विद्युत्तेज से छलछलाता है। परम चैतन्य मानो स्वयं ही मूर्त्त स्वरूप धारण कर प्रेम और प्रकाश का सागर लहराते है। विद्यार्थियों के लिए आयोजित योग शिविरों में अनेक विद्यार्थियों एवं अध्यापकों ने अपने जीवन विकास का अनोखा पथ पा लिया है।
पूज्य बापूजी का विद्युन्मय व्यक्तित्व, अन्तस्तल की गहराई में से उमड़ती हुई वाणी की गंगधारा और आश्रम के समग्र वातावरण में फैलती हुई दिव्यता का आस्वाद एक बार भी जिस किसी को मिल जाता है वह कदापि उसे भूल नहीं सकता। जो अपने उर के आँगन में अमृत ग्रहण करने के लिए तत्पर हो, उसे अमृत का आस्वाद अवश्य मिल जाता है।
ब्रह्मनिष्ठ, योगसिद्ध, माधुर्य के महासिन्धु समान संत श्री आसाराम जी बापू का सान्निध्य- सेवन करने वाले का और अमृतवर्षा को संग्रहित करने वाले का अल्प पुरूषार्थ भी व्यर्थ नहीं जायेगा ऐसा अनेकों का अनुभव बोल रहा है।
जिस प्रकार पिता या पितामह की सेवा करने से पुत्र या पौत्र खुश होता है इसी प्रकार गुरू की सेवा करने से मंत्र प्रसन्न होता है। गुरू, मंत्र एवं इष्टदेव में कोई भेद नहीं मानना। गुरू ही ईश्वर हैं। उनको केवल मानव ही नहीं मानना। जिस स्थान में गुरू निवास कर रहे हैं वह स्थान कैलास हैं। जिस घर में वे रहते हैं वह काशी या वाराणसी है। उनके पावन चरणों का पानी गंगाजी स्वयं हैं। उनके पावन मुख से उच्चारित मंत्र रक्षणकर्त्ता ब्रह्मा स्वयं ही हैं।
गुरू की मूर्ति ध्यान का मूल है। गुरू के चरणकमल पूजा का मूल है। गुरू का वचन मोक्ष का मूल है।
गुरू तीर्थस्थान हैं। गुरू अग्नि हैं। गुरू सूर्य हैं। गुरू समस्त जगत हैं। समस्त विश्व के तीर्थधाम गुरू के चरणकमलों में बस रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पार्वती, इन्द्र आदि सब देव और सब पवित्र नदियाँ शाश्वत काल से गुरू की देह में स्थित हैं। केवल शिव ही गुरू हैं।
गुरू और इष्टदेव में कोई भेद नहीं है। जो साधना एवं योग के विभिन्न प्रकार सिखाते है वे शिक्षागुरू हैं। सबमें सर्वोच्च गुरू वे हैं जिनसे इष्टदेव का मंत्र श्रवण किया जाता है और सीखा जाता है। उनके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
अगर गुरू प्रसन्न हों तो भगवान प्रसन्न होते हैं। गुरू नाराज हों तो भगवान नाराज होते हैं। गुरू इष्टदेवता के पितामह हैं।
जो मन, वचन, कर्म से पवित्र हैं, इन्द्रियों पर जिनका संयम है, जिनको शास्त्रों का ज्ञान है, जो सत्यव्रती एवं प्रशांत हैं, जिनको ईश्वर-साक्षात्कार हुआ है वे गुरू हैं।
बुरे चरित्रवाला व्यक्ति गुरू नहीं हो सकता। शक्तिशाली शिष्यों को कभी शक्तिशाली गुरूओं की कमी नहीं रहती। शिष्य को गुरू में जितनी श्रद्धा होती है उतने फल की उसे प्राप्ति होती है। किसी आदमी के पास अगर यूनिवर्सिटी की उपाधियाँ हों तो इससे वह गुरू की कसौटी करने की योग्यतावाला नहीं बन जाता। गुरू के आध्यात्मिक ज्ञान की कसौटी करना यह किसी भी मनुष्य के लिए मूर्खता एवं उद्दण्डता की पराकाष्ठा है। ऐसा व्यक्ति दुनियावी ज्ञान के मिथ्याभिमान से अन्ध बना हुआ है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ