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'बाल संस्कार केन्द्र'

पाठ्यक्रम

प्रस्तावना

जिस प्रकार की नींव होती है उसी के अनुरूप उस पर खड़े भवन की मजबूती भी होती है। यदि नींव ही कमजोर हो तो उस पर भव्य भवन का निर्माण कैसे हो सकता है ? बच्चे भावी समाज की नींव होते हैं। लेकिन आज के दूषित वातावरण में बच्चों पर ऐसे-ऐसे गलत संस्कार पड़ रहे हैं कि उनका जीवन पतन की ओर जा रहा है। बालकरूपी नींव ही कच्ची हो तो सुदृढ़ नागरिकों से युक्त समाज कहाँ से बनेगा ?

किसी भी परिवार, समाज अथवा राष्ट्र का भविष्य उसके बालकों पर निर्भर होता है। उज्जवल भविष्य के लिए हमें बालकों को सुसंस्कारित करना होगा। बालकों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा देकर हम एक आदर्श राष्ट्र के निर्माण में सहभागी हो सकते हैं।

ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आसारामजी बापू के मार्गदर्शन में हो रही बाल विकास की विभिन्न सेवा-प्रवृत्तियों द्वारा बच्चों को ओजस्वी, तेजस्वी, यशस्वी बनाने हेतु भारतीय संस्कृति की अनमोल कुंजियाँ प्रदान की जा रही हैं। इन्हीं सत्प्रवृत्तियों में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं देश में व्यापक स्तर पर चल रहे 'बाल संस्कार केन्द्र'

इन केन्द्रों में विभिन्न महापुरूषों के जीवन चरित्र पर आधारित प्रसंगों के माध्यम से विद्यार्थियों में ससंस्कारों का सिंचन किया जाता है। उनमें हमारी दिव्य संस्कृति, जीवन जीने की उत्तम कला सिखाने वाले महापुरूषों तथा माता-पिता एवं गुरूजनों के प्रति श्रद्धाभाव जगे, ऐसे कथा-प्रसंग बताये जाते हैं।

बाल संस्कार केन्द्र संचालन निर्देशिका में दी हुई 2 घँटे की कार्यप्रणाली में से पर्व महिमा, ऋतुचर्या, कथा-प्रसंग एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर प्रति सप्ताह विस्तृत पाठ्यक्रम के रूप में यह पुस्तिका प्रस्तुत की जा रही है। देशभर में चल रहे सभी केन्द्रों में एकरूपता व सामंजस्यता स्थापित हो यह इस पुस्तिका के प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य है।

बाल संस्कार केन्द्र संचालक इस बात ध्यान रखें कि जिस माह से वे इस पुस्तक के अनुसार पढ़ाना शुरू करें, उस माह के त्यौहार, जयंतियाँ, ऋतुचर्या कैलेण्डर में देखें। फिर इस पुस्तक की अनुक्रमणिका में उससे सम्बन्धित लेख देखकर उससे सम्बन्धित सत्र से पढ़ाना शुरू करें। पुस्तक में दिया हुआ पहला सत्र जनवरी के प्रथम सप्ताह में पढ़ाने के लिए है।

यह पाठ्यक्रम वर्ष भर में आने वाले व्रत, त्यौहार तथा महापुरूषों की जयंतियों आदि के आधार पर बनाया गया है। केन्द्र संचालकों से निवेदन है कि अन्य वर्षों में व्रत त्यौहार, महापुरूषों की जयंति-तिथियों, तारीखों के अनुसार विषयों को बदल कर पढ़ा सकते हैं।

सत्र 1 से 52 तक का अभिप्रायः वर्ष के 52 सप्ताहों से है। प्रत्येक वर्ष सत्र 1 जनवरी के प्रथम सप्ताह से शुरू होगा।

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अनुक्रमणिका

 

माता-पिता-गुरू की सेवा का महत्त्व... 9

धर्म की वेदी पर बलिदान देने वाले चार अमर शहीद. 11

तिलकः बुद्धिबल एवं सत्त्वबलवर्धक.. 14

मकर-सक्रान्ति..... 14

मातृ-पितृभक्त पुण्डलीक.. 16

सबमें गुरू का ही स्वरूप नजर आता है. 19

शरीर से हिन्दुस्तानी परंतु दिमाग से अंग्रेज.. 19

भारतीय संस्कृति की गरिमा के रक्षकः स्वामी विवेकानंद. 21

स्वभाषा का प्रयोग करें. 22

'हाय-हेलो' से बड़ों का अपमान न करें...... 22

परिश्रम के पुष्प... 24

सत्य के समान कोई धर्म नहीं.. 25

शिवाजी का बुद्धि चातुर्य.. 27

वसंत ऋतुचर्या... 28

परीक्षा में सफलता कैसे पाये ?. 29

मन का प्रभाव तन पर. 31

शिवजी का अनोखा वेशः देता है दिव्य संदेश.. 33

महाशिवरात्रि का पूजन.. 35

यह कैसा मनोरंजन ?. 36

अपने नौ-जवानों को बचाने का प्रयास करें. 39

भेद में अभेद के दर्शन कराता हैः होलिकोत्सव.. 42

व्यक्ति की परख रंगों से.. 44

गामा पहलवान की सफलता का रहस्य.... 46

शक्ति-संचय का महान स्रोतः मौन.. 47

वास्कोडिगामा ने भारत खोजा नहीं अपितु लूटा था... 48

स्वधर्मे निधनं श्रेयः... 48

जरूरत है लगन और दृढ़ता की....... 50

विद्यार्थी छुट्टियाँ कैसे मनायें ?. 53

बाल्यकाल से ही भक्ति का प्रारंभ.. 54

समय की कीमत.. 55

ग्रीष्म ऋतु में आहार-विहार. 56

महापुरूषों के मार्गदर्शन से सँभल जाता है जीवन.. 57

हक की रोटी.. 59

रतनबाई की गुरूभक्ति.... 60

सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक भोजन.. 61

से होता है तदनुसार स्वभाव का निर्माण.. 61

माता सीताजी का आदर्श.. 63

द्रौपदी का अक्ष्यपात्र. 64

सौन्दर्य प्रसाधन हैं सौन्दर्य के शत्रु. 65

मम्मी डैडी कहने से माता-पिता का आदर या हत्या ?. 67

ममी (Mummy) अर्थात् वर्षों पुराना शव.. 67

डैडी बनाम डेड (Dead) अर्थात् मृत व्यक्ति.... 67

गुरू तेग बहादुरः धर्म की रक्षा के लिए किया प्राणों का बलिदान.. 68

देवव्रत की भीष्म प्रतिज्ञा... 71

ज्ञान का आदर. 73

हे विद्यार्थियो ! जिज्ञासु बनो... 74

भगवद् आराधना, नामसंकीर्तन का फल.. 76

मनोनिग्रह की अदभुत साधनाः एकादशी व्रत.. 77

निर्जला एकादशी... 78

डिब्बापैक फलों के रस से बचो... 81

ताजा नाश्ता करना न भूलें.. 81

निद्रा के सामान्य नियम.. 82

वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य-रक्षा के कुछ आवश्यक नियम.. 83

संत निंदा जिसके घर, वह घर नहीं, यम का दर. 84

काशीनरेश की न्यायप्रियता... 86

असीम करूणा के धनीः संत एकनाथ जी महाराज.. 87

सूर्योपासना... 88

रामभक्त लतीफशाह. 90

गुरूभक्त संदीपक.. 91

नेता जी सुभाषचन्द्र बोस की महानता का रहस्य.... 94

भगवान स्वयं अवतार क्यों लेते हैं ?. 95

कितने सुरक्षित हैं क्रीम तथा टेलकम पाउडर ?. 96

सौन्दर्य प्रसाधनों में छिपी हैं कई मूक चीखें.. 96

कैन्सर का खतरा बढ़ा रहे हैं झागवाले शैम्पू.... 98

धर्मांतरण के विरूद्ध किया उग्र आन्दोलन.. 100

पीनियल ग्रन्थि (योग में-आज्ञाचक्र) की क्रियाशीलता का महत्त्व... 101

शुभ संकल्पों का पर्व रक्षाबंधन.. 102

स्मरणशक्ति कैसे बढ़ायें ?. 105

बौद्धिक बल बढ़ायें.. 106

दिमागी ताकत के लिए कुछ उपाय.. 106

प्रेमावतार का प्रागट्य-दिवसः जन्माष्टमी... 107

दयालु बालक शतमन्यु.... 109

अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती ?. 111

आप चाकलेट खा रहे हैं या निर्दोष बछड़ों का मांस ?. 111

असफल विद्यार्थियों को सफल बनाने के नुस्खे..... 112

निराकार हुए साकार जब.... 113

गणपति जी का श्रीविग्रहः मुखिया का आदर्श.. 114

जन्मदिन कैसे मनाएँ ?. 117

मांसाहार छोड़ो... स्वस्थ रहो.. 118

कोलस्टरोल नियंत्रित करने का आयुर्वैदिक उपचार. 119

मांसाहारः गंभीर बीमारियों को बुलावा... 119

मांसाहारी मांस खाता है परंतु मांस उसकी हड्डियों को ही खा जाता है ! 121

अण्डाः रोगों का भण्डार. 121

पौष्टिकता की दृष्टि से शाकाहारी सब्जियों से अण्डे की तुलना... 122

आध्यात्मिक दृष्टि से मानव जीवन पर अण्डा सेवन का दुष्प्रभाव.. 123

अण्डा जहर है. 124

कहीं आप भी सॉफ्टड्रिंक पीकर मांसाहार तो नहीं कर रहे हैं ?. 126

विज्ञापनी फरेब का पर्दाफाश.. 127

आरतीः मानव जीवन को दिव्य बनाने की वैज्ञानिक परम्परा.. 128

आरती को कैसे व कितनी बार घुमायें ?. 128

बालक ध्रुव.. 129

नवरात्रि में गरबा... 130

नवरात्रि में सारस्वत्य मंत्र अनुष्ठान से चमत्कारिक लाभ.. 131

सारस्वत्य मंत्र का चमत्कारः वैज्ञानिक भी चकित.. 132

विजयादशमीः दसों इन्द्रियों पर विजय.. 133

राजकुमारी मल्लिका... 134

छत्रसाल की वीरता... 135

अधिकांश टुथपेस्टों में पाया जाने वाला फ्लोराइड कैंसर को आमंत्रण देता है.... 137

पेप्सोडेंट के प्रयोग से सड़ने लगे हैं दाँत.. 137

पर्वों का पुंजः दीपावली... 138

दीपावली का पर्वपंचक.. 140

भारत का कुत्ता भी भक्ति की प्रेरणा देता है. 141

त्राटक साधना... 142

बिन्दु त्राटक.. 142

मूर्ति त्राटक.. 143

दीपज्योति त्राटक.. 143

विद्यार्थियों के लिए विशेष.. 144

गुटखा-पानमसाला खाने वाले सावधान ! 147

गुटखा खाने का शौक कितना महँगा पड़ा ! 148

मौत का दूसरा नामः गुटखा-पान मसाला... 148

महामूर्ख कौन ?. 149

फैशन से बीमारी तक....... 151

सेवा की महिमा... 152

विविध रोगों में आभूषण-चिकित्सा..... 155

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ऊँची एड़ी के सेंडिल.. 156

नानक ! दुःखिया सब संसार..... 156

चाय-काफीः एक मीठा जहर. 158

आयुर्वैदिक चाय.. 158

दीक्षाः जीवन का आवश्यक अंग.. 159

असाध्य बीमारियों में औषध के साथ प्रार्थना और ध्यान भी अत्यन्त आवश्यक है. 160

तेजस्वी जीवन की कुंजीः त्रिकाल-संध्या..... 161

त्रिकाल संध्या से लाभः... 162

मैदे से बनी डबल रोटी (ब्रेड) खाने वाले सावधान ! 163

दंत सुरक्षा... 164

टूथपेस्ट करने वालों के लिए दंतरोग विशेषज्ञों की विशेष सलाह. 164

अन्न का प्रभाव.. 166

भैंस के खून से भी बनते हैं टॉनिक.. 168

फास्ट फूड खाने से रोग भी फास्ट (जल्दी) होते हैं. 168

प्रतिभावान बालक रमण.. 169

जागिये प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में.. 171

दृढ़ संकल्प सफलता का प्रथम सोपान.. 172

सुरक्षाचक्र का चक्रव्यूह. 174

त्यागो लापरवाही को...... 175

क्या है तुम्हारा लक्ष्य ?. 176

श्री अरविन्द की निश्चिन्तता... 178

पूज्य बापू जी की पावन प्रेरणा... 179


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संचालक पाठ्यक्रम

(सत्र 1)

माता-पिता-गुरू की सेवा का महत्त्व

युधिष्ठिर ने पूछाः "भारत ! धर्म का यह मार्ग बहुत बड़ा है तथा इसकी बहुत सी शाखाएँ हैं। इन धर्मों से आप किसको विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं ? सब धर्मों में से आप किसको विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं ? सब धर्मों में कौन-सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोक में भी परम धर्म का फल प्राप्त कर सकूँ ?"

भीष्म जी ने कहाः "राजन ! मुझे तो माता-पिता तथा गुरूजनों की पूजा ही अधिक महत्त्व की वस्तु जान पड़ती है। इस लोक में इस पुण्यकार्य में संलग्न होकर मनुष्य महान यश और श्रेष्ठ लोक पाता है।

तात् युधिष्ठिर ! भलिभाँति पूजित हुए वे माता-पिता और गुरूजन किस काम के लिए आज्ञा दें, उसका पालन करना ही चाहिए।

जो उनकी आज्ञा के पालन में संलग्न है, उसके लिए दूसरे किसी धर्म के आचरण की आवश्यकता नहीं है। जिस कार्य के लिए वे आज्ञा दें, वही धर्म है, ऐसा धर्मात्माओं का निश्चय है।

माता-पिता और गुरूजन ही तीनों लोक हैं, ये ही तीनों आश्रम हैं, ये ही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं।

पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गयी हैं और गुरू आहवनीय अग्नि का स्वरूप हैं। लौकिक अग्नियों की अपेक्षा माता-पिता आदि त्रिविध अग्नियों का गौरव अधिक है।

यदि तुम इन तीनों की सेवा में कोई भूल नहीं करोगे तो तीनों लोकों को जीत लोगे। पिता की सेवा से इस लोक को, माता की सेवा से परलोक को तथा नियमपूर्वक गुरू की सेवा से ब्रह्मलोक को भी लाँघ जाओगे।

भरतनन्दन ! इसलिए तुम त्रिविध लोकस्वरूप इन तीनों के प्रति उत्तम बर्ताव करो। तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा करने से तुम्हें यश और महान फल देने वाले धर्म की प्राप्ति होगी।

इन तीनों की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करना, इनको भोजन कराने के पहले स्वयं भोजन न करना, इन पर कोई दोषारोपण न करना और सदा इनकी सेवा में संलग्न रहना, यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है। नृपश्रेष्ठ ! इनकी सेवा से तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तम लोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे।

जिसने इन तीनों का आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो गये।

शत्रुओं को संताप देने वाले नरेश ! जिसने इन तीनों गुरूजनों का सदा अपमान ही किया है, उसके लिए न तो यह लोक सुखद है और न परलोक। न इस लोक में और न ही परलोक में ही उसका यश प्रकाशित होता है। परलोक में जो अन्य कल्याणमय सुख की प्राप्ति बतायी गयी है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती है।

मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरूजनों को ही समर्पित कर देता था। इससे मेरे उन सभी शुभ कर्मों का पुण्य सौगुना और हजारगुना बढ़ गया है। युधिष्ठिर ! इसी से तीनों लोक मेरी दृष्टि के सामने प्रकाशित हो रहे हैं।

आचार्य यानी शास्त्रों के अनुसार आचरण बताने वाला सदा दस श्रोत्रियों यानी शास्त्रों की कथा करने वाले से बढ़कर है। उपाध्याय यानी विद्यागुरू दस आचार्यों से अधिक महत्त्व रखता है। पिता दस उपाध्यायों से बढ़कर है और माता का महत्त्व दस पिताओं से भी अधिक है। वह अकेली ही अपने गौरव के द्वारा सारी पृथ्वी को भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माता के समान दूसरा कोई गुरू नहीं है।

......परंतु मेरा विश्वास यह है कि ब्रह्मवेत्ता सदगुरू का पद पिता और माता से भी बढ़कर है, क्योंकि माता-पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देते हैं जबकि सदगुरू जीव के चिन्मय वपु को जन्म देते हैं।

भारत ! पिता और माता के द्वारा स्थूल शरीर का जन्म होता है परंतु सदगुरू का उपदेश प्राप्त करके जीव को जो द्वितीय जन्म उपलब्ध होता है, वह दिव्य है, अजर-अमर है।

माता-पिता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं, क्योंकि पुत्र या शिष्य माता-पिता और गुरू के प्रति अपराध करके भी उनकी दृष्टि में दूषित नहीं होते हैं। वे गुरूजन पुत्र या शिष्य पर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते हैं बल्कि सदा उसे धर्म के मार्ग पर ही ले जाने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे माता-पिता आदि गुरूजनों का महत्त्व महर्षियों सहित देवता ही जानते हैं।

जो सत्कर्म और यथार्थ उपदेश के द्वारा पुत्र या शिष्य को कवच की भाँति ढँक लेते हैं, सत्यस्वरूप वेद का उपदेश देते हैं और असत्य की रोक-थाम करते हैं, उन गुरू को ही पिता और माता समझें और उनके उपकार को जानकर कभी उनसे द्रोह न करें।

जो लोग विद्या पढ़कर गुरू का आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रिया द्वारा गुरू की सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भ के बालक की हत्या से भी बढ़कर पाप लगता है। संसार में उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है। जैसे, गुरूओं का कर्त्तव्य है शिष्य को आत्मोन्नति के पथ पर पहुँचाना, उसी तरह शिष्यों का धर्म है गुरूओं का पूजन करना।

अतः जो पुरातन धर्म का फल पाना चाहते हैं, उन्हें चाहिए की वे गुरूओं की पूजा-अर्चना करें और प्रयत्नपूर्वक उन्हें आवश्यक वस्तुएँ समर्पित करें।

मनुष्य जिस कर्म से पिता को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा प्रजापति ब्रह्माजी भी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बर्ताव से वह माता को प्रसन्न कर लेता है, उसी के द्वारा समूची पृथ्वी की भी पूजा हो जाती है।

जिस कर्म से शिष्य गुरू को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न हो जाती है। अतः माता-पिता से भी अधिक पूजनीय गुरू हैं।

गुरूओं के पूजित होने पर पितरों सहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं, इसलिए गुरू परम पूजनीय हैं।

किसी भी बर्ताव के कारण गुरू अपमान के योग्य नहीं होते। इसी तरह माता और पिता भी अनादर के योग्य नहीं हैं। जैसे, गुरू माननीय हैं वैसे ही माता-पिता भी माननीय हैं।

वे तीनों कदापि अपमान के योग्य नहीं है। उनके लिए किये हुए किसी भी कार्य की निन्दा नहीं करनी चाहिए। गुरूजनों के इस सत्कार को देवता और महर्षि भी अपना सत्कार मानते हैं।

गुरू, पिता और माता के प्रति जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्या से भी बढ़कर महान पाप लगता है। संसार में उनसे बढ़कर दूसरा कोई पापाचारी नहीं है।

जो पिता-माता का दत्तक पुत्र है, पाल पोसकर बड़ा कर दिया गया है, वह यदि अपने माता-पिता का भरण-पोषण नहीं करता है तो उसे भ्रूणहत्या से भी बढ़कर पाप लगता है और जगत में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है।

मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्रीहत्यारे और गुरूघाती, इन चारों के पाप का प्रायश्चित हमारे सुनने में नहीं आया है।

इस जगत में पुरूष के द्वारा जो पालनीय हैं, वे सारी बातें यहाँ विस्तार के साथ बतायी गयी हैं। यही कल्याणकारी मार्ग है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्त्तव्य नहीं है। सम्पूर्ण धर्मों का अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है।

(महाभारत शांतिपर्व)

अनुक्रम

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धर्म की वेदी पर बलिदान देने वाले चार अमर शहीद

धर्म की पवित्र यज्ञवेदी में बलिदान देने वालों की परम्परा में गुरू गोविन्द सिंह के चार लाड़लों को, अमर शहीदों को भारत भुला सकता है ? नहीं, कदापि नहीं। अपने पितामह गुरूतेगबहादुर की कुर्बानी और भारत की स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत पिता गुरू गोविन्दसिंह ही उनके आदर्श थे। तभी तो इस नन्हीं सी 8-10 वर्ष की अवस्था में उन्होंने वीरता और धर्मपरायणता का जो प्रदर्शन किया उसे देखकर भारतवासी उनके लिये श्रद्धा से नतमस्तक हो उठते हैं।

गुरू गोविन्दसिंह की बढ़ती हुई शक्ति और शूरता को देखकर औरंगजेब झुंझलाया हुआ था। उसने शाही फरमान निकाला किः "पंजाब के सभी सूबों के हाकिम और सरदार तथा पहाड़ी क्षेत्रों के राजा मिलकर आनन्दपुर को बर्बाद कर डालो और गुरू गोविन्दसिंह को जिन्दा गिरफ्तार करो या उनका सिर काटकर शाही दरबार में हाजिर करो।"

बस, फिर क्या था ? मुगल सेना द्वारा आनंदपुर पर आक्रमण कर दिया गया। आनंदपुर किले में उपस्थित मुट्ठी भऱ सिक्ख सरदारों की सेना ने विशाल मुगल सेना को भी त्रस्त कर दिया। किन्तु धीरे-धीरे किले में रसद-सामान घटने लगा और सिक्ख सेना भूख से व्याकुल हो उठी। आखिरकार अपने साथियों की सलाह से बाध्य हो अनुकूल अवसर पाकर गुरू गोविन्द सिंह ने आधी रात में सपरिवार किला छोड़ दिया।

.....किन्तु न जाने कहाँ से यवनों को इसकी भनक लग गयी और दोनों सेनाओं में हलचल मच गयी। इसी भाग-दौड़ में गुरूगोविन्दसिंह के परिवार वाले अलग-अलग होकर भटक गये। गुरू गोविन्दसिंह की माता अपने दो छोटे-छोटे पौत्रों – जोरावरसिंह तथा फतेह सिंह के साथ दूसरी ओर निकल पड़ीं। उनके साथ रहने वाले रसोइये के विश्वासघात के कारण ये लोग विपक्षियों द्वारा गिरफ्तार किये गये और सरहिंद भेज दिये गये। सरहिंद सूबा के सरदार वजीद खाँ ने गुरू गोविन्दसिंह के हृदय को आघात पहुँचाने के ख्याल से उनके दोनों छोटे बच्चों को मुसलमान बनाने का निश्चय किया।

भरे दरबार में गुरू गोविन्दसिंह के इन दोनों पुत्रों से उसने पूछाः

"ऐ बच्चो ! तुम लोगों को इस्लाम धर्म की गोद में आना मंजूर है या कत्ल होना ?"

दो तीन बार पूछने पर जोरावरसिंह ने जवाब दियाः

"हमें कत्ल होना मंजूर है।"

कैसी दिलेरी है ! कितनी निर्भीकता ! जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते रहते हैं, उस नन्हीं सी सुकुमार अवस्था में भी धर्म के प्रति इन बालकों की कितनी निष्ठा है !"

वजीद खाँ बोलाः "बच्चों ! इस्लाम धर्म में आकर सुख से जीवन व्यतीत करो। अभी तो तुम्हारा फलने-फूलने का समय है। मृत्यु से भी इस्लाम धर्म को बुरा समझते हो ? जरा सोचो ! अपनी जिंदगी व्यर्थ क्यों गँवा रहे हो ?"

गुरू गोविन्दसिंह के लाड़ले वे वीर पुत्र..... मानों गीता के इस ज्ञान को उन्होंने पूरी तरह आत्मसात् कर लिया थाः स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह। मरने से बढ़कर सुख देने वाला दुनिया में कोई काम नहीं। अपने धर्म की मर्यादा पर मिटना तो हमारे कुल की रीति है। हम लोग इस क्षणभंगुर जीवन की परवाह नहीं करते। मर-मिटकर भी धर्म की रक्षा करना ही हमारा अंतिम ध्येय है। चाहे तुम कत्ल करो या तुम्हारी जो इच्छा हो, करो।"

गुरू गोविन्दसिंह के पुत्र महान न छोड़ा धर्म हुए कुर्बान.......

इसी प्रकार फतेहसिंह ने भी बड़ी निर्भीकतापूर्वक धर्म को न त्यागकर मृत्यु का वरण श्रेयस्कर समझा। शाही दरबार आश्चर्यचकित हो उठा किः "इस नन्हीं-सी आयु में भी अपने धर्म के प्रति कितनी अडिगता है ! इन नन्हें-नन्हें सुकुमार बालकों में कितनी निर्भीकता है !" किन्तु अन्यायी शासक को भला यह कैसे सहन होता ? काजियों एवं मुल्लाओं की राय से इन्हें जीते जी दीवार में चिनवाने का फरमान जारी कर दिया गया।

कुछ ही दूरी पर दोनों भाई दीवार में चिने जाने लगे, तब धर्मांध सूबेदार ने कहाः

"ऐ बालकों ! अभी भी चाहो तो तुम्हारे प्राण बच सकते हैं। तुम लोग कलमा पढ़कर मुसलमान धर्म स्वीकार कर लो। मैं तुम्हें नेक सलाह देता हूँ।"

यह सुनकर वीर जोरावरसिंह गरज उठाः

"अरे अत्याचारी नराधम ! तू क्या बकता है ? मुझे तो खुशी है कि पंचम गुरू अर्जुनदेव और दादागुरू तेगबहादुर के आदर्शों को पूरा करने के लिए मैं अपनी कुर्बानी दे रहा हूँ। तेरे जैसे अत्याचारियों से यह धर्म मिटने वाला नहीं, बल्कि हमारे खून से वह सींचा जा रहा है और आत्मा तो अमर है, इसे कौन मार सकता है ?" दीवार शरीर को ढँकती हुई ऊपर बढ़ती जा रही थी। छोटे भाई फतेहसिंह की गर्दन तक दीवार आ गई थी। वह पहले ही आँखों से ओझल हो जाने वाला था। यह देखकर जोरावरसिंह की आँखों में आँसू आ गये। सूबेदार को लगा कि अब मुलजिम मृत्यु से भयभीत हो रहा है। अतः मन ही मन प्रसन्न होकर बोलाः "जोरावर ! अब भी बता दो तुम्हारी क्या इच्छा है ? रोने से क्या होगा ?"

जोरावरसिंहः "मैं बड़ा अभागा हूँ कि अपने छोटे भाई से पहले मैंने जन्म धारण किया, माता का दूध और जन्मभूमि का अन्न-जल ग्रहण किया, धर्म की शिक्षा पाई किन्तु धर्म के निमित्त जीवन-दान देने का सौभाग्य मेरे से पहले मेरे छोटे भाई फतेह को प्राप्त हो रहा है। इसीलिए मुझे आज खेद हो रहा है कि मुझसे पहले मेरा छोटा भाई कुर्बानी दे रहा है।"

लोग दंग रह गये कि कितने साहसी हैं ये बालक ! जो प्रलोभनों और जुल्मियों द्वारा अत्याचार किये जाने पर भी वीरतापूर्वक स्वधर्म में डटे रहे।

उधर गुरू गोविन्दसिंह की पूरी सेना युद्ध में काम आ गई। यह देखकर उनके बड़े पुत्र अजीतसिंह से नहीं रहा गया और वे पिता के पास आकर बोल उठेः

"पिता जी ! जीते जी बन्दी होना कायरता है, भागना बुजदिली है। इससे अच्छा है लड़कर मरना। आप आज्ञा करें, इन यवनों के छक्के छुड़ा दूँ या मृत्यु का आलिंगन करूँ।"

वीर पुत्र अजीतसिंह की बात सुनकर गुरू गोविन्दसिंह का हृदय प्रसन्न हो उठा और वे बोलेः

"शाबाश ! धन्य हो, पत्र ! जाओ, स्वदेश और स्वधर्म के निमित्त अपना कर्त्तव्यपालन करो। हिन्दू धर्म को तुम्हारे जैसे वीर बालकों की कुर्बानी की आवश्यकता है।

पिता की आज्ञा पाकर अत्यंत प्रसन्नता  एवं जोश के साथ अजीतसिंह आठ-दस सिक्खों के साथ युद्ध-स्थल में जा धमका और देखते ही देखते यवन सेना के बड़े-बड़े सरदारों को मौत के घाट उतारते हुए खुद भी शहीद हो गया।

ऐसे वीर बालकों की गाथा से ही भारतीय इतिहास अमर हो रहा है।

अपने बड़े भाइयों को वीरगति प्राप्त करते देखकर उनसे छोटा भाई जुझारसिंह भला कैसे चुप बैठता ? वह भी अपने पिता गुरू गोविन्दसिंह के पास जा पहुँचा और बोलाः

"पिता जी ! बड़े भैया तो वीरगति को प्राप्त हो गये इसलिए मुझे भी भैया का अनुगामी बनने की आज्ञा दीजिए।" गुरू गोविन्दसिंह का हृदय भर आया और उन्होंने जुझार को गले लगा लिया। वे बोलेः "जाओ, बेटा ! तुम भी अमरपद प्राप्त करो, देवता तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं।"

धन्य है पुत्र की वीरता और धन्य है पिता की कुर्बानी ! अपने तीन पुत्रों की मृत्यु के पश्चात् स्वदेश एवं स्वधर्म-पालन के निमित्त अपने चौथे एवं अंतिम पुत्र को भी प्रसन्नता से धर्म एवं स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर चढ़ने के निमित्त स्वीकृति प्रदान कर दी !

वीर जुझारसिंह 'सत् श्री अकाल' कहकर उछल पड़ा। उसका रोम-रोम शत्रु को परास्त करने के लिए फड़काने लगा। स्वयं पिता ने उसे वीरों के वेश से सुसज्जित करके आशीर्वाद दिया और वीर जुझार पिता को प्रणाम करके अपने कुछ सरदार साथियों के साथ निकल पड़ा युद्धभूमि की ओर। जिस ओर जुझार गया उस ओर दुश्मनों का तीव्रता से सफाया होने लगा और ऐसा लगने लगा मानों महाकाल की लपलपाती जिह्वा सेनाओं को चाट रही है। देखते-देखते मैदान साफ हो गया। अंत में शत्रुओं से जूझते वह वीर बालक भी मृत्यु की भेंट चढ़ गया। देखने वाले दुश्मन भी उसकी प्रशंसा किये बिना न रह सके।

अनुक्रम

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सत्र 2

तिलकः बुद्धिबल एवं सत्त्वबलवर्धक

ललाट पर दोनों भौहों के बीच विचारशक्ति का केन्द्र है। योगी इसे आज्ञाचक्र कहते हैं। इसे शिवनेत्र अर्थात् कल्याणकारी विचारों का केन्द्र भी कहा जाता है।

यहाँ किया गया चन्दन अथवा सिन्दूर आदि का तिलक विचारशक्ति एवं आज्ञाशक्ति को विकसित करता है। इसलिए हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ कार्य करते समय ललाट पर तिलक किया जाता है।

पूज्यपाद संत श्री आसाराम बापू को चन्दन का तिलक लगाकर सत्संग करते हुए लाखों-करोड़ों लोगों ने देखा है। वे लोगों को भी तिलक करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। भाव प्रधान, श्रद्धाप्रधान केन्द्रों में जीने वाली महिलाओं की समझ बढ़ाने के उद्देश्य से ऋषियों ने तिलक की परम्परा शुरू की। अधिकांश स्त्रियों का मन स्वाधिष्ठान एवं मणिपुर केन्द्र में ही रहता है। इन केन्द्रों में भय, भाव और कल्पना की अधिकता होती है। वे भावना एवं कल्पनाओं में बह न जायें, उनका शिवनेत्र, विचारशक्ति का केन्द्र विकसित होता हो इस उद्देश्य से ऋषियों ने स्त्रियों के लिए बिन्दी लगाने का विधान रखा है।

गार्गी, शाण्डिली, अनुसूया एवं अन्य कई महान नारियाँ इस हिन्दू धर्म में प्रगट हुई हैं। महान वीरों, महान पुरूषों, महान विचारकों तथा परमात्मा के दर्शन कराने का सामर्थ्य रखने वाले संतों को जन्म देने वाली मातृशक्ति को आज कई मिशनरी स्कूलों में तिलक करने से रोका जाता है। इस तरह का अत्याचार हिन्दुस्तानी कहाँ तक सहते रहेंगे ? मिशनरियों के षडयंत्रों का शिकार कब तक बनते रहेंगे ?

सरकार में घुसे मिशनरियों के दलाल, चमचे और धन लोलुप अखबार वाले जो ग्रीस व रोम की तरह इस भारत देश को तबाह करने पर उतारू हैं, उन धिक्कार के पात्रों को खुले आम सबक सिखाओ।

अनुक्रम

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मकर-सक्रान्ति

जनवरी माह की 12 से 14 तारीख के बीच मकर सक्रान्ति का पर्व आता है। इस समय सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, इसीलिए इसे मकर सक्रान्ति कहते हैं। खगोलशास्त्रियों ने 14 जनवरी को मकर सक्रान्ति का दिवस तय कर लिया है। बाकी तो सूर्य का मकर राशि में प्रवेश कभी 12 से होता है, कभी 13 से तो कभी 14 तारीख से। ऐसा भी कहते हैं कि इस दिन से सूर्य का रथ उत्तर दिशा की ओर चलता है, अतः इसे उत्तरायण  कहते हैं।

हमारे छः महीने बीतते है तब देवताओं की एक रात होती है और छः महीने का एक दिन। मकर सक्रान्ति के दिन देवता लोग भी जागते हैं। हम पर उन देवताओं की कृपा बरसे, इस भाव से भी यह पर्व मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन यज्ञ में दिये गये द्रव्य को ग्रहण करने के लिए वसुंधरा पर देवता अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्मा पुरूष शरीर छोड़कर स्वर्गादिक लोकों में प्रवेश करते हैं, इसलिए यह आलोक का अवसर माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यंत महत्त्व है। इस अवसर पर दिया हुआ दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना होकर प्राप्त होता है।

यह प्राकृतिक उत्सव है, प्रकृति से तालमेल कराने वाला उत्सव है। दक्षिण भारत में तमिल वर्ष की शुरूआत इसी दिन से होती है। वहाँ यह पर्व 'थई पोंगल' के नाम से जाना जाता है। सिंधी लोग इस पर्व को 'तिरमौरी' कहते है। उत्तर भारत में यह पर्व 'मकर सक्रान्ति के नाम से और गुजरात में 'उत्तरायण' नाम से जाना जाता है।

आज का दिवस विशेष पुण्य अर्जित करने का दिवस है। आज के दिन शिवजी ने अपने साधकों पर, ऋषियों पर विशेष कृपा की थी। ऐसा भी माना जाता है आज के दिन भगवान शिव ने विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था। तैत्तीरीय उपनिषद् में आता हैः एकं वा एतद् देवानाहंयत्संवत्सरः। देवों का संवत्सर गिनने का यह एक ही दिन है। विक्रम संवत्सर के पूर्व इसी दिन से संवत्सर की शुरूआत मानी जाती थी, ऐसा भी वर्णन आता है।

मकर सक्रान्ति के दिन किये गये सत्कर्म विशेष फल देते हैं। आज के दिन भगवान शिव को तिल-चावल अर्पण करने का विशेष महत्त्व माना गया है। तिल का उबटन, तिलमिश्रित जल से स्नान, तिलमिश्रित जल का पान, तिल-हवन, तिल-भोजन तथा तिल-दान सभी पापनाशक प्रयोग हैं। इसलिए इस दिन तिल और गुड़ या तिल और चीनी से बने लड्डू खाने तथा दान देने का अपार महत्त्व है। तिल के लड्डू खाने से मधुरता और स्निग्धता प्राप्त होती है तथा शरीर पुष्ट होता है। शीतकाल में इनका सेवन लाभप्रद है। महाराष्ट्र में आज के दिन एक-दूसरे को तिल-गुड़ देकर मधुरता का, सामर्थ्य का, परस्पर आंतरिक प्रेमवृद्धि का और आरोग्यता का संकल्प किया जाता है। वहाँ के लोग परस्पर तिल-गुड़ प्रदान करके कहते हैं- तिळ गुड़ घ्या गोड गोड बोला। अर्थात् तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।

यह तो हुआ लौकिक रूप से संक्रांति मनाना किंतु मकर सक्रांति का आध्यात्मिक तात्पर्य है जीवन में सम्यक् क्रान्ति। अपने चित्त को विषय विकारों से हटाकर निर्विकारी नारायण में लगाने का और सम्यक् क्रांति का संकल्प करने का यह दिन है। अपने जीवन को परमात्म-ध्यान, परमात्म-ज्ञान और परमात्म प्राप्ति की ओर ले जाने संकल्प का बढ़िया से बढ़िया जो दिन है, वही संक्रांति का दिन है।

मानव सदा ही सुख का प्यासा रहा है। उसे सम्यक् सुख नहीं मिलता है तो अपने को असम्यक् सुख में खपा-खपा कर कई जन्मों तक जन्मता-मरता रहता है। अतः अपने जीवन में सम्यक् सुख पाने के लिए पुरूषार्थ करना चाहिए। वास्तविक सुख क्या है ? परमात्मा-प्राप्ति। अतः उस परमात्म-प्राप्ति का सुख पाने के लिए कटिबद्ध होने का दिवस ही है सक्रांति। संक्रांति का पर्व हमें सिखाता है कि हमारे जीवन में भी सम्यक् क्रान्ति आ जाये। हमारा जीवन निर्भयता और प्रेम से परिपूर्ण हो जाय। तिल-गुड़ का आदान-प्रदान परस्पर प्रेमवृद्धि का ही तो द्योतक है !

संक्रांति के दिन दान का विशेष महत्त्व है। अतः जितना संभव हो सके, उतना किसी गरीब को अन्नदान करें। तिल के लड्डू भी दान किये जाते हैं। आज के दिन सत्साहित्य के दान का भी सुअवसर प्राप्त किया जा सकता है। तुम यह सब न कर सको तो भी कोई हर्ज नहीं किन्तु हरिनाम का रस तो जरूर पिलाना। अच्छे में अच्छा तो परमात्मा है। उसका नाम लेते लेते यदि अपने अहं को सदगुरू के चरणों में, संतों के चरणों में अर्पित कर दो तो फायदा ही फायदा है।...... और अहंदान से बढ़कर तो कोई दान नहीं है। अगर अपना आपा संतों के चरणों में, सदगुरू के चरणों में दान कर दिया जाय तो फिर चौरासी का चक्कर सदा के लिए मिट जाय।

संक्रान्ति के दिन सूर्य का रथ उत्तर की ओर प्रयाण करता है। उसी तरह तुम भी इस मकर संक्रांति के पर्व पर संकल्प कर लो कि अब हम अपने जीवन को उत्तर की ओर अर्थात् उत्थान की ओर ले जायेंगे। अपने विचारों को उत्थान की तरफ मोड़ंगे। यदि ऐसा कर सको तो आज का दिन तुम्हारे लिए परम मांगलिक दिन हो जायेगा। पहले के जमाने में आज के दिन लोग अपने तुच्छ जीवन को बदलकर महान बनाने का संकल्प करते थे।

हे साधक ! तू भी आज संकल्प कर कि अपने जीवन में सम्यक् क्रान्ति-संक्रांति लाऊँगा। अपनी तुच्छ, गंदी आदतों को कुचल दूँगा और दिव्य जीवन बिताऊँगा। प्रतिदिन प्रार्थना करूँगा, जप ध्यान करूँगा, स्वाध्याय करूँगा और अपने जीवन को महान बनाकर ही रहूँगा। प्राणिमात्र के जो परम हितैषी हैं, उन परमात्मा की लीला में प्रसन्न रहूँगा। चाहे मान हो चाहे अपमान, चाहे सुख मिले चाहे दुःख, किंतु सबके पीछे देने वाले के करूणामय हाथों को ही देखूँगा। प्रत्येक परिस्थिति में सम रहकर अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी और दिव्य बनाने का प्रयास अवश्य करूँगा।

हरि ॐ....ॐ......ॐ......ॐ......

अनुक्रम

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सत्र 3

मातृ-पितृभक्त पुण्डलीक

 

शास्त्रों में आता है कि जिसने माता-पिता तथा गुरू का आदर कर लिया उसके द्वारा संपूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया उसके संपूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो गये। वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने माता-पिता और गुरू की सेवा के महत्त्व को समझा तथा उनकी सेवा में अपना जीवन सफल किया। ऐसा ही एक भाग्यशाली सपूत था - पुण्डलिक।

पुण्डलिक अपनी युवावस्था में तीर्थयात्रा करने के लिए निकला। यात्रा करते-करते काशी पहुँचा। काशी में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद उसने लोगों से पूछाः क्या यहाँ कोई पहुँचे हुए महात्मा हैं, जिनके दर्शन करने से हृदय को शांति मिले और ज्ञान प्राप्त हो?

लोगों ने कहाः हाँ हैं। गंगापर कुक्कुर मुनि का आश्रम है। वे पहुँचे हुए आत्मज्ञान संत हैं। वे सदा परोपकार में लगे रहते हैं। वे इतनी उँची कमाई के धनी हैं कि साक्षात माँ गंगा, माँ यमुना और माँ सरस्वती उनके आश्रम में रसोईघर की सेवा के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं। पुण्डलिक के मन में कुक्कुर मुनि से मिलने की जिज्ञासा तीव्र हो उठी। पता पूछते-पूछते वह पहुँच गया कुक्कुर मुनि के आश्रम में। मुनि के देखकर पुण्डलिक ने मन ही मन प्रणाम किया और सत्संग वचन सुने। इसके पश्चात पुण्डलिक मौका पाकर एकांत में मुनि से मिलने गया। मुनि ने पूछाः वत्स! तुम कहाँ से आ रहे हो?

पुण्डलिकः मैं पंढरपुर (महाराष्ट्र) से आया हूँ।

तुम्हारे माता-पिता जीवित हैं?

हाँ हैं।

तुम्हारे गुरू हैं?

हाँ, हमारे गुरू ब्रह्मज्ञानी हैं।

कुक्कुर मुनि रूष्ट होकर बोलेः पुण्डलिक! तू बड़ा मूर्ख है। माता-पिता विद्यमान हैं, ब्रह्मज्ञानी गुरू हैं फिर भी तीर्थ करने के लिए भटक रहा है? अरे पुण्डलिक! मैंने जो कथा सुनी थी उससे तो मेरा जीवन बदल गया। मैं तुझे वही कथा सुनाता हूँ। तू ध्यान से सुन।

एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा?

निर्णय लेने के लिए दोनों गय़े शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा।

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपति जी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं। अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा।

फिर गणपति जी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया.... दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया.... इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।

शिव-पार्वती ने पूछाः वत्स! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की?

गणपतिजीः सर्वतीर्थमयी माता... सर्वदेवमयो पिता... सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है। पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है। पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं। तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये।

शिव-पुराण में आता हैः

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः। तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत्। तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।

पुत्रस्य च महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम्। अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।।

इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्। पुत्रस्य य स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम्।।

जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता-पिता को घर पर छोड़ कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं।

(शिव पुराण, रूद्र सं.. कु खं.. - 20)

पुण्डलिक मैंने यह कथा सुनी और अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन किया। यदि मेरे माता-पिता में कभी कोई कमी दिखती थी तो मैं उस कमी को अपने जीवन में नहीं लाता था और अपनी श्रद्धा को भी कम नहीं होने देता था। मेरे माता-पिता प्रसन्न हुए। उनका आशीर्वाद मुझ पर बरसा। फिर मुझ पर मेरे गुरूदेव की कृपा बरसी इसीलिए मेरी ब्रह्मज्ञा में स्थिति हुई और मुझे योग में भी सफलता मिली। माता-पिता की सेवा के कारण मेरा हृदय भक्तिभाव से भरा है। मुझे किसी अन्य इष्टदेव की भक्ति करने की कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदवो भव।

मंदिर में तो पत्थर की मूर्ति में भगवान की कामना की जाती है जबकि माता-पिता तथा गुरूदेव में तो सचमुच परमात्मदेव हैं, ऐसा मानकर मैंने उनकी प्रसन्नता प्राप्त की। फिर तो मुझे न वर्षों तक तप करना पड़ा, न ही अन्य विधि-विधानों की कोई मेहनत करनी पड़ी। तुझे भी पता है कि यहाँ के रसोईघर में स्वयं गंगा-यमुना-सरस्वती आती हैं। तीर्थ भी ब्रह्मज्ञानी के द्वार पर पावन होने के लिए आते हैं। ऐसा ब्रह्मज्ञान माता-पिता की सेवा और ब्रह्मज्ञानी गुरू की कृपा से मुझे मिला है।

पुण्डलिक तेरे माता-पिता जीवित हैं और तू तीर्थों में भटक रहा है?

पुण्डलिक को अपनी गल्ती का एहसास हुआ। उसने कुक्कुर मुनि को प्रणाम किया और पंढरपुर आकर माता-पिता की सेवा में लग गया।

माता-पिता की सेवा ही उसने प्रभु की सेवा मान ली। माता-पिता के प्रति उसकी सेवानिष्ठा देखकर भगवान नारायण बड़े प्रसन्न हुए और स्वयं उसके समक्ष प्रकट हुए। पुण्डलिक उस समय माता-पिता की सेवा में व्यस्त था। उसने भगवान को बैठने के लिए एक ईंट दी।

अभी भी पंढरपुर में पुण्डलिक की दी हुई ईंट पर भगवान विष्णु खड़े हैं और पुण्डलिक की मातृ-पितृभक्ति की खबर दे रहा है पंढरपुर तीर्थ।

यह भी देखा गया है कि जिन्होंने अपने माता-पिता तथा ब्रह्मज्ञानी गुरू को रिझा लिया है, वे भगवान के तुल्य पूजे जाते हैं। उनको रिझाने के लिए पूरी दुनिया लालायित रहती है। वे मातृ-पितृभक्ति से और गुरूभक्ति से इतने महान हो जाते हैं।

जो माता-पिता, स्वजन, पति आदि सत्संग या भगवान के रास्ते, ईश्वर के रास्ते जाने से रोकते हैं तो उनकी बात नहीं माननी चाहिए। जैसे, मीरा ने पति की बात ठुकरा दी और प्रह्लाद ने पिता की।

गोस्वामी जी के वचन हैं किः

जाके प्रिय न राम बैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।

भागवत में भी कहा हैः

गुरूर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।

देवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्यान्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्।।

'जो अपने प्रिय सम्बन्धी को भगवद् भक्ति का उपदेश देकर मृत्यु की फाँसी से नहीं छुड़ाता, वह गुरू नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है।'

(श्रीमद् भागवतः 5.5.18)

अनुक्रम

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सबमें गुरू का ही स्वरूप नजर आता है

गुरू गोविन्दसिंह का शिष्य कन्हैया युद्ध के मैदान में पानी की प्याऊ लगाकर सभी सैनिकों को पानी पिलाता था। कभी-कभी मुगलों के सैनिक भी आ जाते थे पानी पीने के लिए।

यह देखकर सिक्खों ने गुरू गोविन्दसिंह से कहाः "गुरूजी ! यह कन्हैया अपने सैनिकों को तो जल पिलाता ही है किन्तु दुश्मन सैनिकों को भी पिलाता है। दुश्मनों को तो तड़पने देना चाहिए न ?"

गुरू गोविन्दसिंह ने कन्हैया को बुलाकर पूछाः "क्यों भाई ! दुश्मनों को भी पानी पिलाता है ? अपनी ही फौज को पानी पिलाना चाहिए न ?"

कन्हैयाः "गुरू जी ! जब से आपकी कृपा हुई है तब से मुझे सबमें आपका ही स्वरूप दिखता है। अपने-पराये सबमें मुझे तो गुरूदेव ही लीला करते नजर आते हैं। मैं अपने गुरूदेव को देखकर कैसे इन्कार करूँ ?"

तब गुरू गोविन्दसिंह ने कहाः "सैनिकों ! कन्हैया ने जितना मुझे समझा है, इतना मुझे किसी ने नहीं समझा। कन्हैया को अपना काम करने दो।"

जिन्हें परमात्मतत्त्व का, गुरूतत्त्व का बोध हो जाता है, उनके चित्त से शत्रुता, घृणा, ग्लानि, भय, शोक, प्रलोभन, लोलुपता, अपना-पराया आदि की सत्यता, ये सब विदा हो जाते हैं।

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सत्र 4

शरीर से हिन्दुस्तानी परंतु दिमाग से अंग्रेज

वर्त्तमान समय में अंग्रेजी भाषा का प्रचलन इस कदर हमारे बीच में फैल गया कि हमारी संस्कृति का दम घुट रहा है और हमें पता ही नहीं कि हमारे बोलने से, खाने पीने से, उठने बैठने से और परस्पर व्यवहार से आज अंग्रजीयत की बू आती है। इसमें अंग्रेजी भाषा तो इस प्रकार छा गई है कि उसके बिना कोई काम ही नहीं होता ! पाश्चात्य शिक्षा पद्धति ने हमको हमारी भारतीय संस्कृति से कोसों दूर लाकर खड़ा कर दिया है। अंग्रेजों के द्वारा लायी गयी इस शिक्षा पद्धति के पीछे हमारा कितना बड़ा पतन छिपा है इसको हमने जानने की कभी कोशिश ही नहीं की।

अंग्रेजों का 1858 में 'इंडियन एजुकेशन एक्ट' बनाने के पीछे लार्ड मैकाले की कितनी घिनौनी योजना थी, उससे हम अपरिचित तो नहीं हैं, फिर भी हमने कभी इस ओर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी। लार्ड मैकाले कहा करता थाः 'यदि इस देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाना चाहते हो तो हिन्दुस्तान की स्वदेशी शिक्षा पद्धति को समाप्त कर उसके स्थान पर अंग्रजी शिक्षा पद्धति लाओ। फिर इस देश में शरीर से तो हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे। जब वे लोग इस देश के विश्वविद्यालय से निकलकर शासन करेंगे तो वह शासन हमारे हित में होगा।' यह थी लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति। परंतु हम समझते हैं कि इसी पद्धति से हम आगे बढ़े हैं लेकिन वास्तव में आगे बढ़ने का दिखावा मात्र करते हुए आज हम इतने पीछे चले गये कि हम कहाँ से चले थे वह स्थान ही भूल गये।

मैकाले का वह घिनौना षडयंत्र आज हम सबके सामने अपनी जड़ें फैला रहा है और हम उसे खाद पानी देते जा रहे हैं। आज विद्यालयों में फैल रही अनैतिकता, अपराधीकरण तथा विद्यार्थियों के मानसिक असंतुलन का कारण यही लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति है जिसने हिन्दुस्तान को काले अंग्रेजों का देश बनाने में लगभग सफलता हासिल कर ली है। आज के हिन्दुस्तान को काले अंग्रेजों का देश बनाने में लगभग सफलता हासिल कर ली है। आज के हिन्दुस्तान को कोई देखे तो यह अनुमान नहीं लगा सकता कि इस देश में कभी श्रीकृष्ण, श्रीराम व युधिष्ठिर जैसे महान राजाओं को जन्म देने वाली गुरूकुल शिक्षा पद्धति रही होगी।

गाँधीजी व स्वामी विवेकानन्द के जीवन को अगर देखें तो मैकाले शिक्षा पद्धति की असलियत साफ नजर आती है। मैकाले पद्धति से ऊँची शिक्षा प्राप्त करके भी जब अपने जीवन को नीरस जाना तो गाँधी जी ने भारतीय शास्त्रों व विवेकानंदजी ने सदगुरू की शरण ली तथा अंग्रेजों की इस पद्धति का जोरदार विरोध किया और अपने पूरे जीवन को अंग्रजियत के खिलाफ संग्राम करने में लगा दिया।