
बच्चे
कच्चे घड़े के
समान होते
हैं। बाल्यावस्था
में ही बच्चे
के अंदर
भक्ति, ध्यान,
संयम के
संस्कार पड़
जायें तो वह
भौतिक उन्नति
के साथ-साथ
मानव-जीवन का
परम लक्षय
ईश्वरप्राप्ति
भी शीघ्र ही
कर सकता है।
बच्चे ने अपना
विद्यार्थी-जीवन
काल सँभाल
लिया तो उसका
भावी जीवन भी सँभल
जाता है
क्योंकि
बाल्यकाल के
संस्कार ही
बच्चे के जीवन
की आधारशिला
हैँ।
कहाँ तो
पूर्वकाल के
भक्त
प्रह्लाद,
बालक ध्रुव,
आरूणी,
एकलव्य, श्रवण
कुमार जैसे
परम गुरूभक्त,
मातृ-पितृभक्त
बालक और कहाँ
आज के अनुशासनहीन,
उद्दण्ड एवं
उच्छृंखल
बच्चे! उनकी
तुलना आज के
नादान बच्चों
से कैसे करें?
प्राचीन
युग के
माता-पिता
अपने बच्चों
को वेद,
उपनिषद एवं
गीता के
कल्याण कारी
श्लोक सिखाकर
उन्हें
सुसंस्कृत
बनाते थे।
वहीं आजकल के
माता-पिता
अपने बच्चों
को गंदी एवं
विनाशकारी फिल्मों
के गीत
सिखलाने में
बड़ा गर्व
महसूस करते
हैं। यही कारण
है कि प्राचीन
युग में
श्रवणकुमार
जैसे
मातृ-पितृभक्त
पैदा हुए जो
अंत समय तक
माता-पिता की
सेवा-शुश्रुषा
करके अपना
जीवन धन्य कर
देते हैं और
आज की संतानें
तो पत्नी आयी
कि बस
माता-पिता से
कह देते हैं कि
तुम-तुम्हारे
हम हमारे। कई
तो ऐसी कुसंतानें
निकल जाती हैं
कि बेचारे
माँ-बाप को ही
धक्का देकर घर
से बाहर निकाल
देती हैं।
प्राचीन
काल की
गुरूकुल
शिक्षा-पद्धति
शिक्षा की एक
सर्वोत्तम
व्यवस्था थी।
गुरूकुल में
बालक निष्काम
सेवापरायण,
विद्वान एवं
आत्मविद्या-सम्पन्न
गुरूओं की
निगरानी में
रहने के
पश्चात् देश व
समाज का गौरव
बढ़ायें, ऐसे
युवक बनकर ही
निकलते थे।
दुर्भाग्य
से आजकल के
विद्यालयों
में तो मैकाले-शिक्षा-प्रणाली
के द्वारा
बालकों को ऐसी
दूषित शिक्षा
दी जा रही है
कि उनमें
संयम-सदाचार
का नितांत
अभाव है।
बेचारे
बेटे-बेटियाँ
इस मैकाले
शिक्षा-पद्धति
से उद्दण्ड होते
जा रहे हैं।
पाश्चात्य
सभ्यता का
अंधानुकरण
करने वाले विद्यार्थियों
को आज उचित
मार्गदर्शन
की बहुत
आवश्यकता है
और इस
आवश्यकता को
आप बाल संस्कार
केन्द्र के
माध्यम से
पूरा कर सकते
हैं।
आप अपने
घर या
अड़ोस-पड़ोस
में बाल
संस्कार
केन्द्र
खोलें।
केन्द्र के
माध्यम से आप
बच्चों में
ऋषि-मुनियों
एवं संतों के
ज्ञान-प्रसाद
को फैलायें,
उन्हें
शारीरिक एवं
मानसिक रूप से
सुदृढ़
बनायें, उनको
स्मरणशक्ति
बढ़ाने,
बुद्धि को
कुशाग्र एवं
तेजस्वी बनाने
की युक्तियाँ
सिखायें।
जप-ध्यान,
त्राटक,
प्राणायाम
आदि बच्चों को
सिखायें ताकि
उनकी सुषुप्त
शक्तियाँ
जगें, वे
औजस्वी-तेजस्वी
बनें और
परीक्षा में
भी अच्छे
अंकों से उत्तीर्ण
हों।
माता-पिता का
आशीर्वाद
प्राप्त करने
व सुखी,
स्वस्थ और
सम्मानित
जीवन जीने की
कला बच्चों को
सिखायें।
जिससे वे
मातृ-पितृभक्त
बनें और बड़े
होकर देश व
समाज की सेवा
कर सकें।
एक-एक बालक
ईश्वर की
अनन्त
शकितयों का पुंज
है। किसी में
बुद्ध छुपा है
तो किसी में
महावीर, किसी
में
विवेकानन्द
छुपा है तो
किसी में
प्रधानमन्त्री
की योग्यता
छुपी है।
आवश्यकता है
केवल उन्हें
सही दिशा देने
की।
हम चाहते
हैं कि बाल
संस्कार
केन्द्र में
बच्चों को ऐसा
तेजस्वी
बनायें कि
देशवासियों
के आँसू
पोंछने के काम
करें ये लाल
और देश को फिर
से विश्वगुरू
के पद पर
पहुँचायें।
प्रस्तावना
बाल
संस्कार सेवा
से जुड़े सभी
साधक भाई-बहनों
के सप्रेम हरि
ॐ !
आपके
हाथों में यह
पुस्तक
सौंपते हुए
हमें अपार
हर्ष का अनुभव
हो रहा है।
आशा है आप भी
इसे पाकर कम
आनंदित नहीं
होंगे
क्योंकि
इसमें बाल
संस्कार
केन्द्र कैसे
चलायें? - इस विषय
में विशेष
मार्गदर्शन
दिया गया है, साथ
ही बच्चों को
सिखाने के
लिये आपको
इसमें हर
सप्ताह नई
विषय-सामग्री
भी मिलेगी।
ताकि बच्चों
की केन्द्र
में नियमित
आने की रूचि
बढ़े और कम
समय में वे
अधिकाधिक सीख
सकें।
बाल
संस्कार
केन्द्र के
शुभारंभ से
लेकर प्रथम 4
माह में क्या
सिखाना है - इसका
पूरा विवरण इस
पुस्तक में
दिया गया है। इस
पुस्तक की
सहायता से नये
केन्द्र
संचालक आसानी
से केन्द्र
चला सकेंगे,
साथ ही जो
साधक पहले से
केन्द्र चला
रहे हैं वे भी
इससे लाभान्वित
होंगे, ऐसा
हमें पूर्ण
विश्ववास है।
हम आशा रखते
हैं कि इस
पुस्तक के
अवलोकन के
पश्चात आप
अपना सुझाव
भेजेंगे ताकि
हम और बेहतर
कर सकें।
- विनीत
श्री
योग वेदांत
समिति, अमदावाद
आश्रम।
अनुक्रम
परम
पूज्य बापू जी का
पावन संदेश
बाल
संस्कार
केन्द्र
की शुरूआत कैसे करें?
बाल
संस्कार
केन्द्र
संचालन
विषय सूचि
सभी
सत्रों
में लेने योग्य विषय
विद्या
की देवी माँ सरस्वती
की वन्दना
बुद्धिशक्ति-मेधाशक्तिवर्धक प्रयोग
श्री
आसारामायण
की कुछ कठिन
पंक्तियों
के अर्थ
बाल संस्कार संबंधी कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी
बाल संस्कार केन्द्र की द्विमासिक रिपोर्ट
पूज्यश्री,
इष्टदेव आदि
के चित्रों के
समक्ष धूप-दीप,
अगरबत्ती आदि
करके वातावरण
को सात्विक
बनायें एवं
फूल-माला आदि
से सजावट कर कार्यक्रम
की शुरूआत
करें।
1.
प्रति
सप्ताह के
पाठयक्रम को
दो सत्रों में
विभाजित किया
गया है। प्रथम
सत्र गुरूवार
एवं द्वितिय
सत्र रविवार
को चलायें।
नोटः किसी
कारणवश यदि इन
दिनों में
सत्र न चला
सकते हों तो
अन्य किसी दिन
चलायें।
2.
गुरूवार के
प्रति सत्र
में श्री
आसारामायण
पाठ (पूरा पाठ
अथवा कुछ
पृष्ठों का
पाठ) अवश्य
करायें।
3.
कीर्तन
करवाते समय
कैसेट चलायें
अथवा बच्चों
के साथ स्वयं
मिलकर गायें।
एक ही कीर्तन
दो से चार
सत्रों तक करायें
जिससे बच्चों
को कंठस्थ हो
जाये।
4.
हर सत्र के
कार्यक्रम के
सभी विषयों का
पहले से ही
अच्छी तरह
अध्ययन किया
करें। खाली
समय में उन
बातों को अपने
बच्चों या
मित्रों का
बतायें तथा उन
पर चर्चा
करें, इससे उस
सत्र के
कार्यक्रम के
सभी विषय आपको
अच्छी तरह याद
हो जायेंगे,
जिससे आप
बच्चों को अच्छी
तरह समझा
पायेंगे।
5.
कार्यक्रम
में बच्चों को
जो-जो बातें
सिखानी हैं,
उनका एक संक्षिप्त
नोट पहले ही
बना लें। इससे
आपको सभी बातें
आसानी से याद
रहेंगी तथा
कोई विषय छूटने
की समस्या भी
नहीं रहेगी।
6.
बच्चों को एक
नोटबुक बनाने
को कहें,
जिसमें वे
गृहकार्य
करेंगे और हर
सप्ताह बतायी
जानेवाली
महत्त्वपूर्ण
बातें
लिखेंगे।
7.
हर सप्ताह
दिये गये
गृहकार्य के
बारे में अगले
सप्ताह
बच्चों से
पूछें।
8.
प्रति सत्र
में सिखाये
जाने वाले
यौगिक प्रयोगों
की विस्तृत
जानकारी हेतु
पढ़े यौगिक
क्रिया पृष्ठ ।
9.
निर्धारित
समय में सभी
विषयों को
पूरा करने का
प्रयास करें।
सूचनाः यह चार
माह का
पाठयक्रम है
जिसकी शुरूआत
वर्ष के किसी
भी माह में कर
सकते हैं। चार
महीनों में
आने वाले
पर्वों एवं
ऋतुओं की
जानकारी बालक-बालिकाओँ
को देने हेतु
आश्रम से
प्रकाशित मासिक
पत्रिका ऋषि
प्रसाद व
मासिक समाचार
पत्र लोक
कल्याण सेतु
एवं
सत्साहित्य
आरोग्यनिधि-भाग
1 व 2 आदि
पुस्तकें
सहायक होंगी।
1.
वार्तालाप।
2.
प्रार्थना,
स्तुति आदि।
3.
ध्यान-जप-मौन-त्राटक।
4.
ज्ञानचर्चा।
5.
कथा-प्रसंग,
साखी, श्लोक,
प्राणवान
पंक्तियाँ,
संकल्प।
6.
भजन, कीर्तन,
बालगीत,
देशभक्ति गीत
आदि।
7.
दिनचर्या।
8.
स्वास्थ्य-सुरक्षा,
ऋतुचर्या व
पर्व महिमा।
9.
हँसते-खेलते
पायें ज्ञानः
ज्ञानवर्धक
खेल, मैदानी
खेल, ज्ञान के
चुटकुले,
पहेलयाँ,
विडियो
सत्संग आदि
तथा
व्यक्तित्व
विकास के
प्रयोग (निबंध,
प्रतियोगिता,
वक्तृत्व
स्पर्धा, चित्रकला
स्पर्धा आदि।)
10.
यौगिक
प्रयोगः
व्यायाम,
योगासन, प्राणायाम,
सूर्यनमस्कार
आदि।
11.
मुद्राज्ञान
व अन्य यौगिक
क्रियाएँ।
12.
श्री
आसारामायण
पाठ व
पूज्यश्री की
जीवनलीला पर
आधारित
कथा-प्रसंग।
13.
प्रश्नोत्तरी।
14.
शशक आसन, आरती
व प्रसाद
वितरण।
टिप्पणीः
बीच-बीच
में कूदना,
हास्य प्रयोग
करवायें और अंत
में गृहपाठ
झलकियाँ आदि
लें।
वार्तालापः
प्रत्येक
सत्र की
शुरूआत
वार्तालाप व
प्रार्थना
स्तुति आदि
विषय से करें।
वार्तालाप उस दिन
सिखायें जाने
वाले किसी
विषय पर
आधारित हो
सकते हैं।
प्रार्थना
स्तुति आदिः
1)
सर्वप्रथम
बच्चों आदि को
पद्मासन अथवा
सुखासन में
बिठायें और
कमर सीधी रखने
को कहें।
2)
7 या 11 बार हरि ॐ का उच्चारण
करायें।
3)
दो बार टंक
विद्या का
प्रयोग
करायें।
भूमध्य
में तिलक अथवा
हाथ की तीसरी
उँगली से घर्षण
करते हुए ॐ गं
गणपतये नमः मंत्र
का जाप
करायें।
फिर
बच्चों को हाथ
जोड़ने को
कहें और
मंत्रोच्चारण
करवायें।
i.
ॐ श्री
सरस्वत्यै
नमः। (ब) ॐ श्री
गुरूभ्यो
नमः।
इसके बाद
गणपति वन्दना,
सरस्वती
वन्दना और गुरू-प्रार्थना
करवायें। हर
सप्ताह
सरस्वती वन्दना
और गुरू
प्रार्थना की
दो-दो
पंक्तियाँ कंठस्थ
करायें एवं
अर्थ भी
बतायें।
वक्रतुण्ड
महाकाय
सूर्यकोटिसमप्रभः।
निर्विघ्नं
कुरू मे देव
सर्वकार्येषु
सर्वदा।।
कोटि
सूर्यों के
समान
महातेजस्वी,
विशालकाय और
टेढ़ी
सूँडवाले
गणपति देव! आप
सदा मेरे सब कार्यों
में विघ्नों
का निवारण
करें।
या
कुन्देन्दुतुषारहारधवला
या
शुभ्रवस्त्रावृता
या
वीणावरदण्डमण्डितकरा
या
श्वेतपद्मासना।
या
ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवेः
सदा वन्दिता
सा मां
पातु सरस्वती
भगवती
निःशेषजाङ्यापहा।।
जो कुंद
के फूल,
चन्द्रमा,
बर्फ और हार
के समान श्वेत
हैं, जो शुभ्र
वस्त्र पहनती
हैं, जिनके
हाथ उत्तम
वीणा से
सुशोभित हैं,
जो श्वेत कमल
के आसन पर
बैठती हैं,
ब्रह्मा,
विष्णु, महेश
आदि देव जिनकी
सदा स्तुति
करते हैं और
जो सब प्रकार
की जड़ता हर
लेती हैं, वे
भगवती सरस्वती
मेरा पालन
करें।
शुक्लां
ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां
जगदव्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां
जाङ्यान्धकारापहाम्।
हस्ते
स्फाटिकमालिकां
च दधतीं
पद्मासने संस्थितां
वन्दे
तां
परमेश्वरीं
भगवतीं
बुद्धिप्रदां
शारदाम्।।
जिनका रूप
श्वेत है, जो
ब्रह्मविचार
का परम तत्त्व
हैं, जो
सम्पूर्ण
संसार में
व्याप रही हैं,
जो हाथों में
वीणा और
पुस्तक धारण किये
रहती हैं, अभय
देती हैं,
मूर्खतारूपी
अंधकार को दूर
करती हैं, हाथ
में स्फटिक
मणि की माला
लिये रहती
हैं, कमल के
आसन पर
विराजमान हैं
और बुद्धि
देने वाली
हैं, उन आद्या
परमेश्वरी भगवती
सरस्वती की
मैं वन्दना
करता हूँ।
गुरूर्बह्मा
गुरूर्विष्णुः
गुरूर्देवो
महेश्वरः।
गुरूर्साक्षात
परब्रह्म
तस्मै श्री
गुरवे नमः।।
गुरू ही
ब्रह्मा हैं,
गुरू ही
विष्णु हैं।
गुरूदेव ही
शिव हैं तथा
गुरूदेव ही
साक्षात साकार
स्वरूप
आदिब्रह्म
हैं। मैं
उन्हीं
गुरूदेव को
नमस्कार करता
हूँ।
ध्यानमूलं
गुरोर्मूर्तिः
पूजामूलं
गुरोः पदम्।
मंत्रमूलं
गुरोर्वाक्यं
मोक्षमूलं
गुरोः कृपाः।।
ध्यान का
आधार गुरू की
मूर्ति है,
पूजा का आधार
गुरू के
श्रीचरण हैं,
गुरूदेव के
श्रीमुख से
निकले हुए वचन
मंत्र के आधार
हैं तथा गुरू
की कृपा ही
मोक्ष का
द्वार है।
अखण्डमण्डलाकारं
व्याप्तं येन
चराचरम्।
तत्पदं
दर्शितं येन
तस्मै
श्रीगुरवे
नमः।।
जो सारे
ब्रह्माण्ड
में, जड़ और
चेतन सब में व्याप्त
है, उन परम
पिता के
श्रीचरणों को
देखकर मैं
उनको नमस्कार
करता हूँ।
त्वमेव
माता च पिता
त्वमेव
त्वमेव
बन्धुश्च सखा
त्वमेव।
त्वमेव
विद्या
द्रविणं
त्वमेव
त्वमेव सर्वं
मम देव देव।।
तुम ही
माता हो, तुम
ही पिता हो,
तुम ही बन्धु
हो, तुम ही सखा
हो, तुम ही
विद्या हो,
तुम ही धन हो।
हे देवताओं के
देव!
सदगुरूदेव!
तुम ही मेरे
सब कुछ हो।
ब्रह्मानन्दं
परमसुखदं
केवलं
ज्ञानमूर्ति
द्वन्द्वातीतं
गगनसदृशं
तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं
नित्यं विमलमचलं
सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं
त्रिगुणरहितं
सदगुरूं तं
नमामि।।
जो
ब्रह्मानन्दस्वरूप
हैं, परम सुख
देने वाले
हैं, जो केवल
ज्ञानस्वरूप
हैं, (सुख-दुःख,
शीत-उष्ण आदि)
द्वंद्वों से
रहित हैं,
आकाश के समान
सूक्ष्म और
सर्वव्यापक
हैं, तत्त्वमसि
आदि
महावाक्यों
के लक्ष्यार्थ
हैं, एक हैं,
नित्य हैं, मल
रहित हैं, अचल
हैं, सर्व
बुद्धियों के
साक्षी हैं,
भावना से परे
हैं, सत्त्व,
रज और तम
तीनों गुणों
से रहित हैं - ऐसे
सदगुरूदेव को
मैं नमस्कार
करता हूँ।
किसी भी
कार्य को
प्रारम्भ
करने से पूर्व
भगवान गणपति
जी, माँ
सरस्वतीजी और
सदगुरूदेव की
प्रार्थना,
ध्यान एवं
निम्न मंत्रोच्चारण
से ईश्वरीय
प्रेरणा-सहायता
मिलती है,
जिससे सफलता
प्राप्त होती
है।
ॐ गं
गणपतये नमः। ॐ श्री
सरस्वत्यै
नमः। ॐ श्री
गुरूभ्यो
नमः।
1.
ध्यान के समय
यथासंभव
पूज्यश्री की
ध्यान की कैसेट
लगायें।
2.
आज्ञाचक्र
पर इष्ट या
सदगुरूदेव का
ध्यान
करायें।
3.
ध्यान सहज
में हो, चेहरे
पर कोई तनाव न
हो।
4.
ध्यान करते
हुए मन शांत
हो रहा है,
ईश्वर में डूब
रहा है,
प्रभुप्रीति
बढ़ रही है,
गुरूभक्ति
बढ़ रही है,
जीवन विकास के
पथ पर आगे बढ़
रहा है, योग्यता
खिल रही है
आदि
पंक्तियों का
धीरे-धीरे
उच्चारण करते
हुए बच्चों की
रूचि ध्यान के
प्रति
बढ़ायें।
नोटः जब
ध्यान की
कैसेट चल रही
हो तब मौन
रहें।
5.
ध्यान के समय
नेत्र
अर्धोन्मीलित
(आधे खुले, आधे
बंद) हों।
6.
कभी-कभी किसी
वैदिक मंत्र (ॐ नमो
भगवते
वासुदेवाय आदि) का
धीरे-धीरे
उच्चारण
करवायें। फिर
क्रमशः होठों
में, कंठ में,
हृदय में
मौनपूर्वक जप
करते हुए शांत
होने को कहें।
7.
ध्यान करते
समय बच्चे
पद्मासन अथवा
सुखासन में
बैठें।
8.
कभी-कभी
ध्यान के पहले
निम्न तरह का
शुभ संकल्प
करा सकते हैं-
1.
मैं
शांतस्वरूप,
आनंदस्वरूप,
सुखस्वरूप
आत्मा हूँ।
रोग, शोक,
चिंता, भय, दुःख,
दर्द तो शरीर
को होते हैं,
मैं तो
प्रेमस्वरूप
आत्मा हूँ।
2.
मैं अजर हूँ....
अमर हूँ... मेरा
जन्म नहीं....
मेरी मृत्यु
नहीं... मैं यह
शरीर नहीं....
मैं
निर्लिप्त आत्मा
हूँ... ॐ.... ॐ.....
3.
मैं शरीर
नहीं हूँ। इन
सब कीट-पतंग
आदि प्राणियों
में मेरा ही
आत्मा विलास
कर रहा है।
उनके रूप में
मैं ही विलास
कर रहा हूँ।
1.
तिलक
प्रयोगः बच्चों
से दाहिने हाथ
की अनामिका
उँगली (छोटी उँगली
के पास वाली)
द्वारा
भ्रूमध्य में
हलका सा दबाव
देते हुए ॐ गं
गणपतये नमः। मंत्र
का उच्चारण
करवायें।
2.
श्वासोच्छ्वास
की गिनतीः श्वासों
की गति सामान्य
रखें और
नासाग्र (नाक
के अग्रभाग
पर) दृष्टि
रखें। श्वास
अंदर जाये तो ॐ बाहर
आये (1) गिनती,
अंदर जाये
विद्या बाहर
आये 2, अंदर
जाये आनंद
बाहर आये 3, ऐसी
मानसिक गिनती
करें। 20 से 108 तक
गिनती करवा
सकते हैं। यदि
गिनती बीच में
भूल जायें तो
पुनः शुरू
करें।
4.
कूदनाः (व्यायाम
क्रमांक-1)
5.
प्रश्नोत्तरीः
कार्यक्रम
के बीच-बीच
में अथवा अंत
में प्रश्नोत्तरी
करें।
प्रश्नोत्तरी
उस दिन बताये
गये विषय पर
अथवा पूर्व
में सिखाये
गये विषय पर
आधारित हो।
6.
झलकियाँ: अगले
कार्यक्रम के
विषय के
संदर्भ में
बच्चों को
संक्षेप में
परिचय दें।
7.
शशकासनः कार्यक्रम
के अंत में,
आरती से पहले
बच्चों को
शशकासन कि
स्थिति में
कुछ समय
बिठाये रखें।
8.
आरती व
प्रसाद
वितरण।
सप्ताह
के दोनों
सत्रों में सिखाये
जाने वाले
विषय
1.
यौगिक
प्रयोगः
i.
व्यायामः कूदना।
ii.
योगासनः ताड़ासन।
iii.
प्राणायामः
भ्रामरी।
iv.
मुद्राज्ञानः
ज्ञानमुद्रा।
2.
कीर्तनः
नारायण
कीर्तन
नोटः इनके
साथ सभी
सत्रों में
लेने योग्य
आवश्यक विषय
भी लें
बाल
संस्कार
केन्द्र के
शुभारंभ पर
किसी बच्चे के
माता-पिता
अथवा अन्य
किसी
आमंत्रित व्यक्ति
द्वारा दीपक
प्रज्वलित
करवायें।
बाल
संस्कार
केन्द्र का
परिचयः केन्द्र
में बच्चों के
साथ अपनत्व
जगायें। बच्चों
से उनका नाम
पूछें और
लक्ष्य पूछें
तथा बाल
संस्कार
केन्द्र की
महिमा बतायें,
फिर आश्रम-परिचय
देते हुए
निम्न प्रश्न
पूछें-
1.
क्या आप अपनी
स्मरणशक्ति
में
चमत्कारिक
परिवर्तन
लाना चाहते
हैं?
2.
क्या आप
अच्छे अंकों
से उत्तीर्ण
होना चाहते हैं?
3.
क्या आप अपने
मन को प्रसन्न
व शरीर को
चुस्त, शक्तिशाली
और तंदरुस्त
बनाना चाहते
हैं?
4.
क्या आप
हँसते-खेलते
ज्ञान प्राप्त
कर जीवन में
महान बनना
चाहते हैं?
आपके
भीतर अनंत
शक्तितयाँ
छुपी हुई हैं।
यदि आप उनका
सदुपयोग करने
की कला सीख
लें तो अवश्य
महान बन सकते
हैं। यह कला
आपको परम
पूज्य संत श्री
आसारामजी
बापू की
कृपा-प्रसादी
बाल संस्कार
केन्द्र में
सीखने को
मिलेगी। बाल
संस्कार
केन्द्र में
आपको
माता-पिता का
आज्ञापालन
जैसे उच्च
संस्कार,
बाल-कथाएँ,
देशभक्तों व
संत
महापूरूषों
के दिव्य जीवन
चरित्र जानने को
मिलेंगे। खेल,
कहानी,
चुटकुले आदि
के द्वारा
हँसते-खेलते
आपको
ज्ञानप्रद
बातें सिखायी जायेंगी।
एक वर्ष पूरा
होने पर आपको
प्रमाणपत्र
भी दिया
जायेगा।
1.
भगवान
गणपतिः विघ्नहर्ता
हैं, कोई भी
शुभ कार्य
करने से पहले
भगवान गणपति
की स्तुति
करने से उस
कार्य में
सफलता मिलती
है।
2.
माँ
सरस्वतीः माँ
सरस्वती
विद्या की
देवी हैं।
उनकी उपासना
करने कुशाग्र
बुद्धि की
प्राप्ति
होती है व
पढ़ाई में
सफलता मिलती
है।
3.
4.
सदगुरूदेवः
सदगुरू
के बिना कोई
भवसागर से
नहीं तर सकता,
चाहे वह
ब्रह्मा जी और
शंकरजी के
समान ही क्यों
न हो! सदगुरू
हमें वह ज्ञान
देते हैं,
जिससे हम जन्म
मरण के दुःखों
से सदा के लिए
छूट जाते हैं
और परम सुख,
परम शाँति
प्राप्त कर
लेते हैं।
·
श्री
आसारामायण
पाठ (प्रथम
कार्यक्रम
में पूरा पाठ
अवश्य करायें)
शास्त्रों
में आता है कि
जिसने
माता-पिता तथा
गुरू का आदर
कर लिया उसके
द्वारा
संपूर्ण
लोकों का आदर
हो गया और जिसने
इनका अनादर कर
दिया उसके
संपूर्ण शुभ
कर्म निष्फल
हो गये। वे
बड़े ही
भाग्यशाली
हैं, जिन्होंने
माता-पिता और
गुरू की सेवा
के महत्त्व को
समझा तथा उनकी
सेवा में अपना
जीवन सफल किया।
ऐसा ही एक
भाग्यशाली
सपूत था - पुण्डलिक।
पुण्डलिक
अपनी
युवावस्था
में
तीर्थयात्रा करने
के लिए निकला।
यात्रा
करते-करते
काशी पहुँचा।
काशी में भगवान
विश्वनाथ के
दर्शन करने के
बाद उसने
लोगों से
पूछाः क्या
यहाँ कोई
पहुँचे हुए
महात्मा हैं,
जिनके दर्शन
करने से हृदय
को शांति मिले
और ज्ञान
प्राप्त हो?
लोगों ने
कहाः हाँ हैं।
गंगापर
कुक्कुर मुनि का
आश्रम है। वे
पहुँचे हुए
आत्मज्ञान
संत हैं। वे
सदा परोपकार
में लगे रहते
हैं। वे इतनी उँची
कमाई के धनी
हैं कि
साक्षात माँ
गंगा, माँ
यमुना और माँ
सरस्वती उनके
आश्रम में
रसोईघर की
सेवा के लिए
प्रस्तुत हो
जाती हैं। पुण्डलिक
के मन में
कुक्कुर मुनि
से मिलने की जिज्ञासा
तीव्र हो उठी।
पता
पूछते-पूछते
वह पहुँच गया
कुक्कुर मुनि
के आश्रम में।
मुनि के देखकर
पुण्डलिक ने
मन ही मन
प्रणाम किया
और सत्संग वचन
सुने। इसके
पश्चात
पुण्डलिक
मौका पाकर
एकांत में
मुनि से मिलने
गया। मुनि ने
पूछाः वत्स!
तुम कहाँ से आ
रहे हो?
पुण्डलिकः
मैं पंढरपुर
(महाराष्ट्र)
से आया हूँ।
तुम्हारे
माता-पिता
जीवित हैं?
हाँ हैं।
तुम्हारे
गुरू हैं?
हाँ,
हमारे गुरू
ब्रह्मज्ञानी
हैं।
कुक्कुर
मुनि रूष्ट
होकर बोलेः
पुण्डलिक! तू बड़ा
मूर्ख है।
माता-पिता
विद्यमान हैं,
ब्रह्मज्ञानी
गुरू हैं फिर
भी तीर्थ करने
के लिए भटक
रहा है? अरे
पुण्डलिक!
मैंने जो कथा
सुनी थी उससे
तो मेरा जीवन
बदल गया। मैं
तुझे वही कथा
सुनाता हूँ।
तू ध्यान से
सुन।
एक बार
भगवान शंकर के
यहाँ उनके
दोनों पुत्रों
में होड़ लगी
कि, कौन बड़ा?
निर्णय
लेने के लिए
दोनों गय़े
शिव-पार्वती
के पास।
शिव-पार्वती
ने कहाः जो
संपूर्ण
पृथ्वी की
परिक्रमा करके
पहले
पहुँचेगा, उसी
का बड़प्पन
माना जाएगा।
कार्तिकेय
तुरन्त अपने
वाहन मयूर पर
निकल गये
पृथ्वी की
परिक्रमा
करने। गणपति
जी चुपके-से
एकांत में चले
गये। थोड़ी
देर शांत होकर
उपाय खोजा तो
झट से उन्हें
उपाय मिल गया।
जो ध्यान करते
हैं, शांत
बैठते हैं
उन्हें अंतर्यामी
परमात्मा
सत्प्रेरणा
देते हैं। अतः
किसी कठिनाई
के समय घबराना
नहीं चाहिए बल्कि
भगवान का
ध्यान करके
थोड़ी देर
शांत बैठो तो
आपको जल्द ही
उस समस्या का
समाधान मिल जायेगा।
फिर गणपति
जी आये
शिव-पार्वती
के पास।
माता-पिता का
हाथ पकड़ कर
दोनों को ऊँचे
आसन पर बिठाया,
पत्र-पुष्प से
उनके
श्रीचरणों की
पूजा की और
प्रदक्षिणा
करने लगे। एक
चक्कर पूरा
हुआ तो प्रणाम
किया.... दूसरा
चक्कर लगाकर
प्रणाम किया....
इस प्रकार
माता-पिता की
सात प्रदक्षिणा
कर ली।
शिव-पार्वती
ने पूछाः
वत्स! ये
प्रदक्षिणाएँ
क्यों की?
गणपतिजीः सर्वतीर्थमयी
माता...
सर्वदेवमयो
पिता... सारी
पृथ्वी की
प्रदक्षिणा
करने से जो
पुण्य होता
है, वही पुण्य
माता की
प्रदक्षिणा
करने से हो
जाता है, यह
शास्त्रवचन
है। पिता का
पूजन करने से
सब देवताओं का
पूजन हो जाता
है। पिता
देवस्वरूप
हैं। अतः आपकी
परिक्रमा
करके मैंने
संपूर्ण
पृथ्वी की सात
परिक्रमाएँ
कर लीं हैं। तब
से गणपति जी
प्रथम पूज्य
हो गये।
शिव-पुराण
में आता हैः
जो पुत्र
माता-पिता की पूजा
करके उनकी
प्रदक्षिणा
करता है, उसे
पृथ्वी-परिक्रमाजनित
फल सुलभ हो
जाता है। जो
माता-पिता को
घर पर छोड़ कर
तीर्थयात्रा
के लिए जाता
है, वह
माता-पिता की
हत्या से
मिलने वाले
पाप का भागी
होता है
क्योंकि
पुत्र के लिए
माता-पिता के
चरण-सरोज ही
महान तीर्थ
हैं। अन्य
तीर्थ तो दूर
जाने पर
प्राप्त होते
हैं परंतु धर्म
का साधनभूत यह
तीर्थ तो पास
में ही सुलभ है।
पुत्र के लिए
(माता-पिता) और
स्त्री के लिए
(पति) सुंदर
तीर्थ घर में
ही विद्यमान
हैं।
(शिव
पुराण, रूद्र
सं.. कु खं.. - 20)
पुण्डलिक
मैंने यह कथा
सुनी और अपने
माता-पिता की
आज्ञा का पालन
किया। यदि
मेरे
माता-पिता में
कभी कोई कमी
दिखती थी तो
मैं उस कमी को
अपने जीवन में
नहीं लाता था
और अपनी
श्रद्धा को भी
कम नहीं होने
देता था। मेरे
माता-पिता
प्रसन्न हुए।
उनका
आशीर्वाद मुझ
पर बरसा। फिर
मुझ पर मेरे
गुरूदेव की
कृपा बरसी
इसीलिए मेरी
ब्रह्मज्ञा
में स्थिति
हुई और मुझे
योग में भी
सफलता मिली।
माता-पिता की
सेवा के कारण
मेरा हृदय
भक्तिभाव से
भरा है। मुझे
किसी अन्य इष्टदेव
की भक्ति करने
की कोई मेहनत
नहीं करनी
पड़ी।
मातृदेवो
भव। पितृदेवो
भव।
आचार्यदवो
भव।
मंदिर में
तो पत्थर की
मूर्ति में
भगवान की कामना
की जाती है
जबकि
माता-पिता तथा
गुरूदेव में
तो सचमुच
परमात्मदेव
हैं, ऐसा मानकर
मैंने उनकी
प्रसन्नता
प्राप्त की।
फिर तो मुझे न
वर्षों तक तप
करना पड़ा, न
ही अन्य विधि-विधानों
की कोई मेहनत
करनी पड़ी।
तुझे भी पता
है कि यहाँ के
रसोईघर में
स्वयं
गंगा-यमुना-सरस्वती
आती हैं।
तीर्थ भी
ब्रह्मज्ञानी
के द्वार पर
पावन होने के
लिए आते हैं।
ऐसा
ब्रह्मज्ञान
माता-पिता की
सेवा और
ब्रह्मज्ञानी
गुरू की कृपा
से मुझे मिला
है।
पुण्डलिक
तेरे
माता-पिता
जीवित हैं और
तू तीर्थों
में भटक रहा
है?
पुण्डलिक
को अपनी गल्ती
का एहसास हुआ।
उसने कुक्कुर
मुनि को
प्रणाम किया और
पंढरपुर आकर
माता-पिता की
सेवा में लग
गया।
माता-पिता
की सेवा ही
उसने प्रभु की
सेवा मान ली।
माता-पिता के
प्रति उसकी
सेवानिष्ठा
देखकर भगवान
नारायण बड़े
प्रसन्न हुए
और स्वयं उसके
समक्ष प्रकट
हुए।
पुण्डलिक उस
समय माता-पिता
की सेवा में
व्यस्त था।
उसने भगवान को
बैठने के लिए
एक ईंट दी।
अभी भी
पंढरपुर में
पुण्डलिक की
दी हुई ईंट पर
भगवान विष्णु
खड़े हैं और
पुण्डलिक की
मातृ-पितृभक्ति
की खबर दे रहा
है पंढरपुर
तीर्थ।
यह भी
देखा गया है
कि जिन्होंने
अपने माता-पिता
तथा
ब्रह्मज्ञानी
गुरू को रिझा
लिया है, वे भगवान
के तुल्य पूजे
जाते हैं।
उनको रिझाने
के लिए पूरी
दुनिया
लालायित रहती
है। वे
मातृ-पितृभक्ति
से और गुरूभक्ति
से इतने महान
हो जाते हैं।
कार्यक्रम
में बाल
संस्कार
केन्द्र के
बच्चों ने भगवान
गणेष जी के
जीवन पर एक
लघु नाटक
प्रस्तुत
किया। नाटक
में दिखाया
गया कि किस
प्रकार गणेष
जी
मातृ-पितृभक्ति
एवं
बुद्धिमत्ता
के कारण समस्त
देवताओं में
प्रथम पूज्य
बन गये।
इस नाटक
का एक-एक
दृश्य मेरे
भाँजे के
बालमानस में
बैठ गया।
दूसरे दिन वह
सुबह जल्दी
उठा तथा मेरी
बहन व जीजाजी
के साथ में
बिठाकर उनकी
प्रदक्षिणा
करने लगा।
उसके
माता-पिता
उसकी इस
क्रिया को
देखकर हैरान
रह गये। जब
उन्होंने अपने
पुत्र गणेष से
पूछा कि यह
क्या कर रहे
हो? तब उसने बाल
संस्कार
केन्द्र में
आयोजित नाटक
का विवरण
सुनाते हुए
कहा कि मुझे
भी गणेषजी की
भाँति
बुद्धिमान और
महान बनना है।
गत एक वर्ष से
सुबह
माता-पिता की
प्रदक्षिणा करके
ही अपनी
दिनचर्या
प्रारंभ करना
उसका पक्का
नियम बन गया
है। यदि बचपन
से ही बालकों
को अच्छे
संस्कार दिये
जायें तो वे
निश्चय ही
भारतीय
संस्कृति के
उन्नायक एवं
रक्षक बन सकते
हैं।
- अशोक
भट्ट, सांताकृज
(पश्चिम)
मुंबई।
बच्चों
को प्रतिदिन
माता-पिता को
प्रणाम करने
को कहें और
उनके
माता-पिता को
कैसा लगा इस
बारे में
बच्चे अगले
सप्ताह
बतायें।
बच्चों को गृहपाठ
के लिए एक
नोटबुक बनाने
को कहें,
जिसमें वे हर
कार्यक्रम
में दिया गया
गृहपाठ
करेंगे।
सदगुरू
का अर्थ मात्र
शिक्षक या
आचार्य नहीं है।
शिक्षक तो
केवल ऐहिक
ज्ञान देते
हैं लेकिन
सदगुरू तो
निजस्वरूप का
ज्ञान देते
हैं, जिस
ज्ञान की
प्राप्ति के
बाद व्यक्ति
सुख-दुःख के
प्रभाव से सदा
के लिए छूट
जाता है और
उसे परमानंद
की प्राप्ति
होती है।
जब भगवान
श्रीराम,
भगवान
श्रीकृष्ण
आदि अवतार
पृथ्वी पर
आये, तब वे
मुनि वसिष्ठ
जी तथा सांदीपनि
ऋषि जैसे
संतों की शरण
में गये।
राम
कृष्ण से कौन
बड़ा, तिन्ह
ने भी गुरू कीन्ह।
तीन
लोक के हैं
धनी, गुरू आगे
अधीन।।
परम पूज्य
बापू जी का
जन्म सिंध
प्रांत के नवाबशाह
जिले में
सिंधु नदी के
तट पर बसे
बेराणी नामक
गाँव में नगर
सेठ श्री
थाऊमलजी
सिरुमलानी के
घर दिनांक 17
अप्रैल 1941 के
दिन हुआ। उनकी
पूजनीया माता
का नाम
महँगीबा था।
नामकरण
संस्कार के दौरान
उनका नाम
आसुमल रखा
गया। आसुमल
बचपन से ही
ध्यान-भजन में
तल्लीन रहते
थे। वे लौकिक
विद्या में भी
बड़े तेजस्वी
थे परन्तु
उन्होंने लौकिक
विद्या से
अधिक
ध्यान-भजन,
साधना और ईश्वरप्राप्ति
को ही महत्त्व
दिया। वे सदा
प्रसन्नमुख
रहते थे,
इसलिए शिक्षक
उन्हें हँसमुखभाई
कहकर बुलाते
थे। उन्होंने
युवावस्था
में जंगलों,
गुफाओं में
कठोर तपस्या
की। नैनीताल
में उन्हें
परम पूज्य संत
श्री लीलाशाह
जी बापू के
दर्शन हुए।
स्वामी श्री
लीलाशाहजी
बापू को
सदगुरू मान के
आसुमल उनके
आश्रम में
रहकर सेवा और
साधना करने
लगे। अंततः
सदगुरू की
कृपा से
उन्हें
साक्षात्कार
हुआ और वे आसुमल
में से संत
श्री
आसारामजी
बापू बने,
जिनको सदगुरू
के रूप में
पाकर आज
करोड़ों लोग
अपना जीवन
धन्य बना रहे
हैं।
बच्चों को
गोलाकार में
बिठायें। अब
उनको एक गेद
देते हुए
बतायें कि
बालक अपने
बगलवाले को तुरंत
गेंद दे दे।
मधुर कीर्तन
अथवा कीर्तन
की कोई अन्य
कैसेट
चलायें।
बच्चों के
साथ-साथ ताली
बजाकर कीर्तन
भी करें।
बीच-बीच में
कैसेट बंद
करें, कैसेट
बंद होने पर
जिसके हाथ में
गेंद होगी वह
बच्चा बाहर (आऊट)
हो जाएगा। अंत
में तीन
बच्चों को
विजेता घोषित
करें।
इस
सत्र में
सिखाये गये
विषयों पर
आधारित प्रश्न
पूछें जैसे-
1.
भगवान
गणेषजी के
बड़े भाई का
क्या नाम था?
2.
भगवान
गणेषजी ने
माता-पिता की
कितनी प्रदक्षिणाएँ
कीं?
3.
भगवान
गणेषजी सभी
देवताओं के
प्रथम पूजनीय
कैसे बने?
4.
हास्य
प्रयोग के लाभ
बताओ?
5.
कौन सा
प्राणायाम
करने से
स्मरणशक्ति
बढ़ती है?
सप्ताह
के दोनों
सत्रों में
सिखाये जाने
वाले विषय
i.
पैरों की
उँगलियों के
व्यायाम
ii.
योगाभ्यासः
1.
ताड़ासन
2.
प्राणायामः भ्रामरी
3.
मुद्राज्ञानः ज्ञानमुद्रा।
नोटः इनके
साथ सभी
सत्रों में
लेने योग्य
आवश्यक विषय भी लें।
चुटकुलाः
लड़काः
पिता जी ! मुझे
कालेज जाने के
लिए कार ला दो
न!
पिता
जीः तुम्हारा
कालेज तो घर
से बहुत नजदीक
है। भगवान ने
तुम्हें पैर
क्यों दिये
हैं?
लड़काः
एक पैर ब्रेक
पर रखने के
लिए और दूसरा
एक्सेलरेटर
दबाने के लिए।
सीखः
परिस्थितिवश
अगर माता-पिता
आपकी किसी
वस्तु की माँग
पूरी न कर
सकें तो उस
वस्तु के लिए
हठ न करें।
माता-पिता को
कभी उलटकर
उत्तर न दें।
अभिवादनशीलस्य
नित्यं
वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि
तस्य
वर्धन्ते
आयुर्विद्या
यशो बलम्।।
भावार्थः
नित्य
बड़ों की सेवा
और प्रणाम
करने वाले पुरुष
की आयु,
विद्या, यश और
बल - ये चारों
बढ़ते हैं।
(मनुसमृतिः
2.121)
बच्चों
को यह श्लोक
कण्ठस्थ
करायें और
अर्थ बतायें।
पहला
और दूसरा
अंतरा (मुख का
निवाला दे
अरे! ....... बात यह
भूलना नहीं।।)
का अर्थ बता
कर उन्हें
कंठस्थ
करायें।
जीवन
विकास और सर्व
सफलताओं की
कुंजी है एक
सही दिन
चर्या। सही
दिनचर्या द्वारा
समय का
सदुपयोग करके
तन को
तंदरुस्त, मन
को प्रसन्न
एवं बुद्धि को
कुशाग्र
बनाकर बुद्धि
को
बुद्धिदाता
ईश्वर की ओर
लगा सकते हैं।
v
सूर्योदय से
पूर्व
ब्रह्ममुहूर्त
में उठें।
v
शौच, स्नान
आदि के बाद
ध्यान,
प्राणायाम,
जप, सदग्रन्थों
एवं
शास्त्रों का
पठन करना चाहिए।
v
सूर्य को
अर्घ्य देना,
योगासन व
व्यायाम करना चाहिए।
v
भोजन के पहले
भगवान को
प्रार्थना
करनी चाहिए।
भोजन
स्वास्थ्यकारक,
सुपाच्य व
सात्त्विक करें।
v
अच्छा संग,
खेलकूद व
अध्ययन
(स्कूली
पढ़ाई) करनी
चाहिए।
v
रात्रि को
भोजन के बाद
थोड़ा टहलें।
v
सोने से
पूर्व
सदकगुरूदेव,
इष्टदेव का
ध्यान करें,
सत्संग की
पुस्तक पढ़ें
अथवा कैसेट
सुनें। पूर्व
अथवा दक्षिण की
सिर रखकर
श्वासोच्छ्वास
की गिनती करते
हुए सीधा (पीठ
के बल) सोयें।
फिर जैसी
आवश्यकता होगी
स्वाभाविक
करवट ले ली
जाएगी।
साहसी
बालक
एक लड़का
काशी में
हरिश्चन्द्र
हाईस्कूल में
पढ़ता था।
उसका गाँव
काशी से आठ
मील दूर था। वह
रोजाना वहाँ
से पैदल चलकर
आता, बीच में
गंगा नदी बहती
है उसे पार
करता और
विद्यालय
पहुँचता।
गंगा को
पार कराने के
लिए नाववाले
उस जमाने में
दो पैसे लेते
थे। आने जाने
के महीने के
करीब 2 रूपये,
आजकल के हिसाब
से पाँच-पचीस
रूपये हो
जायेंगे। अपने
माँ-बाप पर
अतिरिक्त
बोझा न पड़े
इसलिए उसने
तैरना सीख
लिया। गर्मी
हो, बारिश हो
कि ठंडी हो वह
हर रोज गंगा
पार करके
स्कूल में
जाता।
एक बार
पौष मास की
ठंडी में वह
लड़का सुबह
स्कूल
पहुँचने के
लिए गंगा में
कूदा।
तैरते-तैरते
मझधार में
आया। एक नाव
में कुछ यात्री
नदी पार कर
रहे थे।
उन्होंने
देखा कि छोटा-सा
लड़का अभी डूब
मरेगा। वे नाव
को उसके पास
ले गये और हाथ
पकड़कर उसे
नाव में खींच
लिया। लड़के
के मुँह पर
घबराहट या
चिंता का कोई
चिह्न नहीं
था। सब लोग
दंग रह गये कि
इतना छोटा और
इतना साहसी!
वे बोलेः तू
अभी डूब मरता
तो? ऐसा साहस
नहीं करना
चाहिए।
तब लड़का
बोलाः साहस तो
होना ही
चाहिए। जीवन में
विघ्न-बाधाएँ
आयेंगी,
उन्हें
कुचलने के लिए
साहस तो चाहिए
ही। अगर अभी
से साहस न
जुटाया तो
जीवन में
बड़े-बड़े
कार्य कैसे कर
पाऊँगा?
प्राणवान
पंक्तियाँ - यहाँ पर
कहानी रोककर
साहस-सदगुण की
चर्चा करते
हुए बच्चों को
निम्न
प्राणवान
पंक्तियाँ पक्की
करवायें-
जहाजों
को डूबा दे
उसे तूफान
कहते हैं।
तूफानों
से जो टक्कर
ले, उसे
इन्सान कहते
हैं।।
लोगों ने पूछाः
इस समय तैरने
क्यों आया? दोपहर
को नहाने आता।
लड़का
बोलाः मैं नदी
में नहाने के
लिए नहीं आया
हूँ, मैं तो
स्कूल जा रहा
हूँ।
फिर नाव
में बैठकर
जाता?
आने-जाने
के रोज के चार
पैसे लगते
हैं। मेरे गरीब
माँ-बाप पर
मुझे बोझ नहीं
बनना है। मुझे
तो अपने पैरों
पर खड़े होना
है। मेरा खर्च
बढ़ेगा तो
मेरे माँ-बाप
की चिंता
बढ़ेगी, उन्हे
घर चलाना
मुश्किल हो जाएगा।
वही साहसी
लड़का आगे
चलकर भारत का
प्रधानमंत्री
बना।
बच्चों से
पूछें कि क्या
आप जानते हैं
कि वह साहसी
बालक कौन था?
वे थे - श्री
लाल बहादुर
शास्त्री।
v साहसः जैसे -
लाल बहादुर
शास्त्री
बचपन से ही
साहसी थे तो
जीवन में
मुश्किलों के
सिर पर पैर
रखकर आगे
बढ़ते गये और
अंततः
प्रधानमंत्री
पद पर पहुँच
गये।
v आत्मनिर्भरताः
माता-पिता
का व्यर्थ का
खर्चा न
बढ़ाकर आत्मनिर्भर
बनना चाहिए,
जैसे लाल
बहादुर
शास्त्री थे।
v पुरूषार्थः
विद्यार्थी
को
पुरूषार्थी
बनना चाहिए।
पुरूषार्थी
बालक ही जीवन
में महान बनता
है।
v राष्ट्रभक्ति
व
मातृ-पितृभक्तिः
जो
व्यक्ति अपने
माता-पिता और
सदगुरू की
सेवा करता है,
वही राष्ट्र
की सेवा कर
सकता है।
v संकल्पः
बच्चों
से संकल्प
करवायें कि हम
भी अपने जीवन में
इन सदगुणों को
अपनायेंगे। ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
(ग) भजनः
कदम अपने आगे
बढ़ाता चला जा
पहला
अंतरा बच्चों
को याद करायें
और उनके साथ-साथ
गायें।
(क) तुलसी
सेवनः जहाँ
तुलसी के पौधे
अधिक मात्रा
में होते हैं वहाँ
की हवा शुद्ध
और पवित्र
होती है। सुबह
उठकर अच्छी तरह
कुल्ला करके
तुलसी के
पाँच-सात
पत्ते चबा-चबाकर
खायें। फिर एक
गिलास पानी
पियें।
लाभः
1.
स्मरणशक्ति
का विकास होता
है।
2.
पेट की कृमि
की शिकायत
नहीं होती।
3.
सर्दी-खाँसी
जल्दी नहीं
होती ।
सावधानीः
तुलसी
और दूध के
सेवन के बीच
एक घंटे का
अंतर होना
चाहिए।
टिप्पणीः
रविवार,
द्वादशी,
पूर्णिमा और
अमावस्या को
तुलसी दल
तोड़ना मना
है।
अनुभवः
परम
पूज्य
सदगुरूदेव की
कृपा से मेरे
पुत्र समीर ने
फरवरी में 2004
में 12 वीँ
कक्षा की
बौर्ड की परीक्षा
में 91.05 % अंक
प्राप्त कर
थाने शहर में
प्रथम और
महाराष्ट्र
राज्य की
वरीयता सूची में
15वाँ स्थान
प्राप्त
किया। 10वी
कक्षी की बोर्ड
की परीक्षा
में भी वह
थाने शहर में
प्रथम
व मुबई विभाग
की वरीयता
सूची में तृतिय
स्थान
प्राप्त कर
चुका है।
समीर
पूज्य
गुरूदेव के
बताये अनुसार
रोज सुबह
तुलसी के 5-7 पत्ते
चबाकर पानी
पीता है, 10
प्राणायाम
एवं श्री
आसारामायण
पाठ करता है।
मासिक
पत्रिका ऋषि प्रसाद
हमारे घर में
आती है। यह
उसे भी ज़रूर पढ़ता
है। सफलता की
आकांक्षा
रखने वाले सभी
विद्यार्थियों
को यह पत्रिका
अवश्य देनी
चाहिए।
- सुलभा
तलवेड़कर,
थाने (महा.)
बच्चों
से इस सत्र
में सिखाये
गये विषयों पर
आधारित
प्रश्न
पूछें। जैसे-
1.
लाल बहादुर
शास्त्री ने
तैरना क्यों
सीखा?
2.
जीवन में
साहस क्यो
चाहिए?
3.
कौन सा आसन
करने से लंबाई
बढ़ती है?
4.
हास्य-प्रयोग
के 2 लाभ बताओ?
बच्चे
कापी पर
सप्ताह के सात
दिन लिखें।
जिस दिन तुलसी
के पत्ते खाने
हैं उस के आगे
ॐ लिखें और
जिस दिन नहीं
खाने हैं उसके
आगे × का निशान
लगायें।
सप्ताह
के दोनों
सत्रों में
सिखाये जाने
वाले विषय
यौगिक
प्रयोगः
नोटः
इनके
साथ सभी
सत्रों में
लेने योग्य
आवश्यक विषय
भी लें।
तिलक
भारतीय संस्कृति
का प्रतीक है।
वैज्ञानिक
तथ्यः ललाट पर
दोनों भौहों
के बीच
आज्ञाचक्र
(शिवनेत्र) और
उसी के पीछे
के भाग में दो
महत्त्वपूर्ण
अंतःस्रावी
ग्रंथियाँ
स्थित हैं
(पीनियल ग्रंथि
और पीयूष
ग्रन्थि।
तिलक
लगाने से
दोनों
ग्रंथियों का
पोषण होता है
और
विचारशक्ति
विकसित होती
है। ॐ गं
गणपतये नमः
मंत्र का जप
करके जहाँ
चोटी रखते हैं
वहाँ दायें
हाथ की उंगलियों
से स्पर्श
करें और
संकल्प करें
कि हमारे मस्तक
का यह हिस्सा
विशेष
संवेदनशील हो,
विकसित हो।
इससे
ज्ञानतंतु
सुविकसित हैं,
बुद्धिशक्ति
व संयमशक्ति
का विकास होता
है।
अनुभवः
राजस्थान
के जयपुर जिले
में स्थित
देवीनगर में
गजेन्द्रसिहं
खींची नाम का
एक लड़का रहता
है। वह नियमित
रूप से बाल
संस्कार
केन्द्र में
जाता था।
केन्द्र में
जब उसे तिलक
करने से होने
वाले लाभों के
बारे में पता
चला, तबसे वह नियमित
रूप से स्कूल
में तिलक
लगाकर जाने
लगा।
पश्चिमी
संस्कृति से
प्रभावित
उसकी शिक्षिका
ने उसे तिलक
लगाने से मना
किया परंतु जब
उस बच्चे ने
शिक्षिका को
तिलक लगाने के
फायदे बताये
तब शिक्षिका
ने तिलक लगाने
की मंजूरी दे
दी। तिलक की
महिमा जानकर
अन्य बच्चे भी
तिलक लगाने
लगे।
संकल्पः
हम
भी रोज तिलक
करेंगे।
बच्चों से यह
संकल्प
करायें।
मार्ग
में जब
गुरूजनों के
साथ चलना हो
तो उनके आगे
या बराबर में
न चलें, उनके
पीछे चलें।
ब्राह्ममुहूर्त में जागरण –