ऐसे महिमावान
श्री सदगुरुदेव के पावन चरणकमलों
का षोड़शोपचार से पूजन करने
से साधक-शिष्य का हृदय शीघ्र
शुद्ध और उन्नत बन जाता है |
मानसपूजा इस प्रकार कर सकते
हैं |
मन ही मन
भावना करो कि हम गुरुदेव के
श्री चरण धो रहे हैं … सर्वतीर्थों
के जल से उनके पादारविन्द को
स्नान करा रहे हैं | खूब आदर
एवं कृतज्ञतापूर्वक उनके श्रीचरणों
में दृष्टि रखकर … श्रीचरणों
को प्यार करते हुए उनको नहला
रहे हैं … उनके तेजोमय ललाट
में शुद्ध चन्दन से तिलक कर
रहे हैं … अक्षत चढ़ा रहे हैं
… अपने हाथों से बनाई हुई गुलाब
के सुन्दर फूलों की सुहावनी
माला अर्पित करके अपने हाथ
पवित्र कर रहे हैं … पाँच कर्मेन्द्रियों
की, पाँच ज्ञानेन्द्रियों की
एवं ग्यारवें मन की चेष्टाएँ
गुरुदेव के श्री चरणों में
अर्पित कर रहे हैं …
शरीर से,
वाणी से, मन से, इन्द्रियों से,
बुद्धि से अथवा प्रकृति के
स्वभाव से जो
जो करते करते हैं वह सब समर्पित
करते हैं | हमारे जो कुछ कर्म
हैं, हे गुरुदेव, वे सब आपके
श्री चरणों में समर्पित हैं
… हमारा कर्त्तापन का भाव, हमारा
भोक्तापन का भाव आपके श्रीचरणों
में समर्पित है |
इस प्रकार
ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा
को, ज्ञान को, आत्मशान्ति को,
हृयद में भरते हुए, उनके अमृत
वचनों पर अडिग बनते हुए अन्तर्मुख
हो जाओ … आनन्दमय बनते जाओ …
इस मंत्र को आषाढ़ मास मे जब उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हो तब अर्थात २५ जुलाई २०१० को रात्रि के समय सुबह ७ से ८ बजे के बीच १०८ बार जप लें |
फिर इसी दिन की रात्रि ११ से १२ बजे के बीच जीभ पर सोने की सलाई से अथवा चांदी की सलाई से, लाल चंदन से ह्रीं लिख दे |
जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जायेगा, उसे विद्या लाभ तथा विद्वत्ता की प्राप्ति होगी |
बच्चे यदि छोटे है तो अभिभावक को चाहिये कि बच्चे को गोद मे लेकर बैठे , और १०८ बार इस मंत्र का जप करे | मंत्र बोलते समय मम के स्थान पर बच्चे के नाम का उच्चारण करे (नीचे उदाहरण देखे) | जप करने के पश्चात सोने की अथवा चांदी की सलाई से, लाल चंदन से बच्चे की जीभ पर ह्रीं लिखे |
उदाहरणः जैसे मेरे पुत्र का नाम राकेश है, और मैं उसके लिये जप करना चाहता हूं | तो मै मंत्र बोलुंगाः "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनि सरस्वति राकेशस्य जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा |"